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ख़ुदा के लिए.....

अगर तुमसे कोई तुम्हारी पूरी उम्र मांगे तो क्या तुम उसे दे दोगे? कभी नहीं! क्योंकि इस ज़िंदगी पर उसका हक़ है जिसने यह ज़िंदगी दी है।लेकिन हमारी ज़िंदगी और उम्र का एक एक दिन मुकम्मल ग़फ़लत के साथ हमारे हाथों से निकलता जा रहा है, और जब हम पलट कर अपने गुज़रे हुए कल को देखते हैं तो हमें मालूम होता है कि :हम ने इस गुज़रे हुए कल में अल्लाह के लिए और अपनी आख़ेरत के लिए कुछ भी नहीं किया

विलायत पोर्टल :  एक बुज़ुर्ग शख़्स एक अख़रोट की दुकान पर गए और दुकानदार से कहा क्या यह सारे अख़रोट मुझे मुफ़्त (फ़्री) में  दे सकते हो?
दुकानदार ने हैरत से उनकी तरफ़ देखा मगर चुप रहा, थोड़ी देर बाद उस बुज़ुर्ग ने कहा कि मुझे मालूम है कि तुम सारे अख़रोट तो नहीं दे सकते मगर कम से कम एक किलो ही दे दो!!!
इस बार दुकानदार के चेहरे पर आश्चर्य और हैरानी ज़्यादा बढ़ गई, उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि इन बुज़ुर्ग साहब से क्या कहें; वह इन्हें ख़ामोशी से घूरता ही रहा।
आख़िरकार उस बुज़ुर्ग ने कहा इतना नाराज़ मत हो, चलो! एक अख़रोट की इजाज़त तो दे दो! दुकानदार की हैरानी और ख़ामोशी का सिलसिला टूटा और हंसते हुए बोला: ले लीजिए।
बड़े मियां ने अख़रोट उठाया और एक बार फिर दुकानदार की तरफ़ बड़ी विनम्र आंखों से देख कर बोले कि कहो तो एक और ले लूं?
दुकानदार ने मुस्कुराते हुए लेने का इशारा किया।
उस शख़्स ने दूसरा अख़रोट लेने के बाद एक और उठा लिया और इशारे से इजाज़त मांगने लगा, अब दुकानदार आगे बढ़ा और उनके हाथ पर दो चार और अख़रोट रखते हुए चिल्ला कर कहा कि यह लीजिए और अब यहां से तशरीफ़ ले जाइए।
आप या तो हमें बेवक़ूफ़ समझ रहे हैं या ख़ुद को होशियार, क्या पूरी दुकान लूटने का इरादा है? दुकानदार उन पर बड़बड़ाने लगा।
उस बुज़ुर्ग ने सारे अख़रोट वापस रख दिए और मुस्कुराते हुए कहा, नाराज़ क्यों होते हो, अपना ग़ुस्सा थूक दो, मुझे न तुम्हारी दुकान चाहिए और न अख़रोट, मैं तो केवल एक बात समझाना चाहता हूं, कि हमारी "उम्र और ज़िंदगी" का यही हाल है।
दुकानदार ने उस बुज़ुर्ग को कुर्सी पेश करते हुए कहा चचा मैं कुछ समझा नहीं!!!
उन्होंने कहा देखो अगर तुमसे कोई तुम्हारी पूरी उम्र मांगे तो क्या तुम उसे दे दोगे? कभी नहीं! क्योंकि इस ज़िंदगी पर उसका हक़ है जिसने यह ज़िंदगी दी है।
लेकिन हमारी ज़िंदगी और उम्र का एक एक दिन मुकम्मल ग़फ़लत के साथ हमारे हाथों से निकलता जा रहा है, और जब हम पलट कर अपने गुज़रे हुए कल को देखते हैं तो हमें मालूम होता है कि :
हम ने इस गुज़रे हुए कल में अल्लाह के लिए और अपनी आख़ेरत के लिए कुछ भी नहीं किया।।।


 





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