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जनरल क़ासिम सुलेमानी कौन थे?

यह भी एक अटल सच्चाई है अगर मेजर जनरल क़ासिम सुलेमानी और इंजीनियर अबू मेहदी जैसे जियाले न होते तो आज हमारे सामने कई जन्नतुल बक़ी होती, इसलिए कि कर्बला, नजफ़ और सीरिया में रौज़ों से ISIS की दूरी किलोमीटर नहीं बल्कि केवल मीटर में रह गई थी इसीलिए अगर यह हस्तियां और इन जैसे जियाले न होते तो आज कई जन्नतुल बक़ी की तस्वीर हमारे सामने होतीं।

विलायत पोर्टल :  आप 11 मार्च 1957 को किरमान राज्य के राबर शहर में पैदा हुए, आप अल-हाज क़ासिम, जनरल और शैडो लीडर के नाम से मशहूर थे।
आप की तरबियत शुरू से ही मज़हबी हाथों में रही आप ने तालीम के बाद बहुत जल्द ही अपने देश और इस्लाम की सेवा शुरू कर दी थी, आपने जल विभाग में सेवा करते हुए अपने काम की शुरुआत की और फिर ईरान के इस्लामी इंक़ेलाब के बाद आपने सन् 1980 में क़ुद्स ब्रिगेड को ज्वाइन किया, जनरल क़ासिम सुलेमानी ने किरमान राज्य की 41 ब्रिगेड सारल्लाह का नेतृत्व करते हुए ईरान इराक़ की जंग का हिस्सा बने जिसमें आपके योगदान को देखते हुए आपको ईरानी सेना के दस अहम शख़्सियतों में शुमार किया जाने लगा, सन् 1998 में आपको जनरल अहमद वहीदी की जगह क़ुद्स ब्रिगेड के नेतृत्व की ज़िम्मेदारी सौंपी गई और फिर 24 जनवरी 2011 को आपका प्रोमोशन करते हुए आपको मेजर जनरल की उपाधि दी गई।
ईरान में शाह की हुकूमत के ख़ात्मे के बाद जब इस्लामी हुकूमत की शुरुआत हुई तो आपने ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड को जॉइन किया, उस दौर में सैनिकों की ट्रेनिंग की ख़ास सुविधाएं नहीं थीं उसके बावजूद आपने बहुत तेज़ी से तरक़्क़ी के रास्तों को तय किया, आप ही के बयान के मुताबिक़ आप शुरू में एक सिपाही थे और ईरान के उत्तरी इलाक़े में सेवा कर रहे थे जहां आज़रबैजान में आप कुर्द के अलगाववादी विचार वालों से मुक़ाबला कर रहे थे।
22 सितंबर 1980 को ईरान इराक़ की आठ साल की जंग शुरू हुई, जिसमें आपने किरमान राज्य के जवानों का नेतृत्व करते हुए हिस्सा लिया, इस टुकड़ी में शामिल सभी जवानों की आपने ख़ुद अपने हाथों ट्रेनिंग दी थी।
आपने अपने सटीक फ़ैसलों और निडरता के चलते ईरान और उसके बाहर बहुत से लोगों के दिलों में जगह बनाई, सद्दाम की सेना के क़ब्ज़े से ईरानी ज़मीनों को छुड़ाने में मेजर जनरल क़ासिम सुलेमानी ने अहम भूमिका निभाई है।
उस समय आपकी किरमान राज्य को बहुत ज़रूरत थी क्योंकि यह राज्य अफ़्ग़ानिस्तान के बॉर्डर से मिलता था और चूंकि वहां नशीले पदार्थ की खेती होती है जिसका ईरान में आने का ख़तरा काफ़ी ज़्यादा था और उसी इलाक़े से इन नशे की सामग्रियों को तुर्की और फिर यूरोप स्मगल किया जाता था, लेकिन आपने इस अवैध स्मगलिंग को पूरी तरह से रोकने का सफ़ल प्रयास किया, और इस काम के बाद लोगों की निगाह में आपकी इज़्ज़त और बढ़ गई।
1998 में क़ुद्स ब्रिगेड की कमांड सौंपे जाने के बाद 2007 में ईरानी रिवोल्यूशनरी गार्ड के नेतृत्व के लिए दूसरे कई दूसरे जनरल के साथ नॉमिनेट हुए थे जब जनरल यहया रहीम सफ़वी का कार्यकाल ख़त्म हुआ तो तो 24 जनवरी 2011 को जनरल सुलेमानी को सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह ख़ामेनई के हुक्म से मेजर जनरल का पद दिया गया।
आपकी निडरता और आतंकवाद के विरुद्ध डट कर खड़े रहना और दुश्मन के बीच घुस कर उनके मंसूबों को नाकाम करने का हुनर देख कर आयतुल्लाह ख़ामेनई ने आपको "ज़िंदा शहीद" की उपाधि दी।
मौजूदा दौर में जनरल क़ासिम सुलेमानी को मिडिल ईस्ट का सबसे मंझा हुआ सैन्याधिकारी समझा जाता था, और ऐसा होता भी क्यों नहीं क्योंकि आपकी बसीरत, निडरता, बेबाकी, हक़ और इंसाफ़ के लिए आवाज़ उठाने के इरादे और मज़लूम कि मदद करने के जज़्बे ने ISIS जैसे आतंकी संगठन जिसने पूरे मिडिल ईस्ट को टेक ओवर करने का प्लान तैयार कर रखा था उससे न केवल मिडिल ईस्ट को नजात दी बल्कि इराक़, सीरिया और दूसरे कई पड़ोसी देशों से निकाल भगाया।
और यह बात पूरी तरह से साफ़ हो चुकी है कि ISIS और इससे पहले इस तरह के सभी आतंकी संगठनों के पीछे अमेरिका और इजराइल का हाथ रहा है, इन संगठनों के पास से US के बने हथियारों का बरामद होना बताता है कि पूरी दुनिया में दहशत का माहौल और लोगों के दिलों में भय पैदा करने के पीछे इन्हीं साम्राज्यवादी ताक़तों का हाथ है और यही वजह है कि जब अमेरिका ने ख़ुद को ख़ुद की साज़िश में फंसता हुआ देखा तो उसने मेजर जनरल क़ासिम सुलेमानी ही पर आतंकवाद का आरोप लगाया और साथ ही ढ़ेरों पाबंदियां भी लगा दी, और अफ़सोस तो संयुक्त राष्ट्र संघ में बैठे इंसानों के हुक़ूक़ की बात करने के लिए करोड़ों रुपये की फ़ीस वसूल करने वालों पर होता है कि जब फ़िलिस्तीन, यमन, इराक़, सीरिया और दूसरी जगहों पर बे गुनाह लोग मारे जाते हैं तब इनके कान पर जूं तक नहीं रेंगती लेकिन उन्हें भी इंसानियत के लिए ख़ुद को वक़्फ़ कर देने वाले को भी दफ़ा 1747 के आधार पर आतंकवादियों की लिस्ट में शामिल कर दिया।
इन सारे बे बुनियाद आरोप के बावजूद आप ने इंसानियत की सेवा और दुनिया के सामने आतंकवाद का असली चेहरा जो अमेरिका, इजराइल और साम्राज्यवाद है उसे बे नक़ाब करने को अपनी सबसे अहम ज़िम्मेदारी समझी और उसी रास्ते पर चलते रहे।
आपकी इसी लगन और इंसानियत की सेवा और इस्लाम और विलायत की इतआत को देखते हुए आपको मालिके अशतर का लक़ब दिया, कि जिस तरह मालिके अशतर ने ख़ुद को इंसानियत को नीचा करने वालों और मानवता का गला घोंटने वालों से लड़ने में गुज़ार दी उसी तरह आपने भी अपनी पूरी ज़िंदगी उसी रास्ते पर चलते हुए गुज़ारी।
यह भी एक अटल सच्चाई है अगर मेजर जनरल क़ासिम सुलेमानी और इंजीनियर अबू मेहदी जैसे जियाले न होते तो आज हमारे सामने कई जन्नतुल बक़ी होती, इसलिए कि कर्बला, नजफ़ और सीरिया में रौज़ों से ISIS की दूरी किलोमीटर नहीं बल्कि केवल मीटर में रह गई थी इसीलिए अगर यह हस्तियां और इन जैसे जियाले न होते तो आज कई जन्नतुल बक़ी की तस्वीर हमारे सामने होतीं।
इसलिए हम सबकी ज़िम्मेदारी है कि मेजर जनरल क़ासिम सुलेमानी और इंजीनियर अबू मेहदी जैसों के किरदार से ख़ुद भी मालूमात हासिल करें और अपने बच्चों को भी बताएं ताकि हमारे अंदर भी इंसानियत की सेवा, आतंकवाद के विरुद्ध निडरता से खड़े रहने का हौसला, दीन की मदद और इस्लाम की ख़िदमत का जज़्बा पैदा हो सके।

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