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हमारा दुश्मन कौन!!

कुछ लोग नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वालों को देश का दुश्मन कह रहे हैं जबकि ऐसा नहीं है, यह विरोध करना तो उनका देश और संविधान से मोहब्बत की दलील है उनका विरोध तो इसलिए है कि वह लोग उस बिल को क़ानून और संविधान की रूह के ख़िलाफ़ समझते हैं,

विलायत पोर्टल :  
देश के घुटन वाले माहौल में हमारा समझना बहुत ज़रूरी है कि हमारा असली दुश्मन कौन है?
अपने पराए की परख दुश्मन और दोस्त के बीच अगर दीवार न खड़ी की जाए तो मामलात उलझते जाते हैं और उसका सीधा फ़ायदा दुश्मन को होता है।
हम ने अपनी पिछली तहरीर में ज़िक्र किया था कि अगर किसी ने क़ौम के साथ ख़्यानत की है और वह किया है जो नहीं करना चाहिए था बल्कि दुश्मन के ख़ैमे को मज़बूत किया है तो उससे बाद में निपटा जा सकता है पहले दुश्मन का मुक़ाबला करना होगा और अगर हम अपनों से ही उलझे रहे तो दुश्मन को इसका फ़ायदा होगा, शक नहीं कि अपने नाम की ख़ातिर क़ौम को बेच देने वाले और क़ौमी फ़ायदे का ख़्याल न रखते हुए निजी फ़ायदे के लिए क़ौम की प्रापर्टी बर्बाद करने वाले इस लायक़ नहीं कि उन पर भरोसा किया जाए लेकिन इस बात में भी कोई शक नहीं कि हमें सबसे पहले दुश्मन से मुक़ाबले को दिमाग़ में रखना चाहिए अपनों से नहीं, जंग के मैदान में जहां दुश्मन हर तरह के अस्लहों से तैयार है हम पर हमले कर रहा है अगर हमारी नज़र अपनी ही किसी सफ़ में अपने ही किसी ऐसे पर पड़ी जिसने कुछ ग़लतियां की हों और हम अपने अस्लहों को उसकी तरफ़ मोड़ दें तो हमारा यह क़दम दोनों की ही बर्बादी की वजह बनेगी।

हमारी फ़िक्र को न मानने वाला हमारा दुश्मन नहीं है

हर फ़िक्र और विचारधारा के विरोध में आमतौर से दो तरह के लोग सामने आते हैं:
1- कुछ लोग उस विचारधारा का खुले तौर पर विरोध करते हैं, और सरेआम उसके विरोध का एलान करते हैं और उसे क़बूल नहीं करते हैं, अगर उसका यह क़बूल न करना केवल इसलिए हो कि उस विचार में कुछ कमी पाई जाती है और उनको वह विचार कुछ दलीलों की बिना पर क़बूल नहीं किया जा सकता तो उनका विरोध करना उसूल के तहत कहा जाता है और उसे उस विचार का मुख़ालिफ़ कहा जाता है।
2- जब यही विरोध बिना किसी दलील और उसूल के दुश्मनी की बिना पर हो तो उसे दुश्मन कहा जाता है।
मौजूदा हालात में कुछ लोग नागरिकता क़ानून के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने वालों को देश का दुश्मन कह रहे हैं जबकि ऐसा नहीं है, यह विरोध करना तो उनका देश और संविधान से मोहब्बत की दलील है उनका विरोध तो इसलिए है कि वह लोग उस बिल को क़ानून और संविधान की रूह के ख़िलाफ़ समझते हैं, इस चीज़ को अगर क़ौमी दायरे में बयान किया जाए तो मामला कुछ इस तरह होगा किसी पार्टी से जान बूझ कर क़ौम को नुक़सान पहुंचाने के लिए अगर कोई जुड़ा हुआ है और उसे केवल अपनी ही फ़िक्र है क़ौम का थोड़ा भी ध्यान नहीं है तो ऐसा शख़्स दुश्मन से मिला हुआ है और उसी का हिस्सा है ऐसे शख़्स के लिए थोड़ी सी भी नर्मी नहीं होनी चाहिए, लेकिन अगर मामला कुछ इस तरह हो कि कोई क़ौम के मामलात सुधारने के लिए किसी ग़लत रास्ते पर चल पड़ा या दुश्मन की साज़िश का शिकार हो गया जबकि ज़्यादातर उसने क़ौम के लिए क़ुर्बानियां दी थीं तो ऐसा शख़्स से न केवल नफ़रत नहीं होनी चाहिए बल्कि वह रहम के लायक़ है और साथ ही कोशिश होनी चाहिए कि उसे दुश्मन के चंगुल से बाहर निकाला जाए।

दुश्मन को पहचानने की अहम बुनियाद
दुश्मन को पहचानने के पहले क़दम में ज़रूरी है कि इंसान अपनी फ़िक्री हदों को तय करे, अपने मक़सद को तय करे अपने मक़सद और वैल्यूज़ को पहचाने और दोस्त और दुश्मन का मज़बूत मेयार बनाए ताकि उसके मुताबिक़ दोस्त और दुश्मन में फ़र्क़ को पहचान सके और इस सिलसिले में वहम और भ्रम का शिकार न हो इसलिए ऐसी तारीफ़ ज़रूरी है कि जिसमें सब शामिल हो सकें और जो दुश्मन न हो वह उसमें शामिल न हो, उलमा के हिसाब से जामेअ और मानेअ हो।
जब दुश्मन की बात आती है और हम उसकी तारीफ़ और मफ़हूम तलाश करते हैं तो हमें मुश्किल का सामना करना यक़ीनी होता है इसलिए कि: अगर मेयार अगर हमारी दुनिया बन गई या दुनिया की ऐसी चीज़ जिसका हासिल करना हमारी ज़िंदगी का मक़सद हो तो जो भी उसमें रुकावट होगा वह हमारा दुश्मन ठहरेगा, जबकि ज़ाहिर सी बात है कि दुश्मनी का यह मेयार साबित और सही नहीं है और दुनिया के फ़ायदे के साथ यह मेयार भी बदलता रहेगा, ऐसे में मुमकिन है कि दुनिया को हासिल करने के चक्कर में हम आंख बंद कर के लग जाएं और आख़ेरत को भुला दें, और हमारा कोई दोस्त हमारे दुनिया को हासिल करने में रुकावट हो तो वह हमारा दुश्मन बन जाए, जबकि हक़ीक़त में अगर देखा जाए तो वह हमारा दुश्मन नहीं है बल्कि हमारी भलाई चाहने वाला है, अब ऐसे में ज़रूरी है कि पहले हम यह समझें कि हक़ीक़त में दुश्मन कौन होता है ताकि उसी मतलब की रौशनी में हम सही नतीजे तक पहुंच सकें।
दुश्मनी दो तरह की हो सकती है: एक वह जिसके अंदर नफ़रत और दुश्मनी की आग जल रही हो जैसे किसी को क़त्ल कर दिया गया हो और उसके वारिस बदले के इंतज़ार में हों जिसकी तरफ़ क़ुरआन में इशारा किया गया है।
दूसरा वह जिसमें इंसान किसी से नाराज़ है और किसी पर ग़ुस्सा है जैसे जनाब इब्राहीम की हालत बुतों के सिलसिले में थी कि आपने उन्हें दुश्मन कहा है जबकि उनमें जान भी नहीं पाई जाती थे और आपको किसी तरह का नुक़सान भी नहीं पहुंचा सकते थे लेकिन आप उन्हें इसलिए दुश्मन समझते थे कि वह आपको तकलीफ़ दे रहे थे और काफ़िर उन्हें ख़ुदा मानते थे और यह कुफ़्र और शिर्क की निशानी थे।
अब अगर क़ौम का लीडर और रहनुमा किसी जगह पर बुतों की सिफ़त वाला हो, बहरा और गूंगा हो जाए उसे किसी बात से मतलब न हो तो यह शख़्स इस लायक़ है कि इससे दूरी और बेज़ारी की जाए लेकिन हमें यह यक़ीन हो चुका हो कि यह कुफ़्र और शिर्क की अलामत बन चुका हो और वह अब किसी क़ाबिल नहीं है, लेकिन अगर ऐसा नहीं है और विरोध केवल अपने लिए है तो यह सबके लिए नुक़सान पहुंचाने वाले हैं, बहर हाल दुश्मन का मेयार अगर अल्लाह का दीन और उसकी किताब हो तो तो इंसान दुश्मन को पहचानने में कभी ग़लती नहीं करेगा, क्योंकि जहां क़ुरआन ने अलग अलग जगहों पर दुश्मन के सिलसिले में बयान किया है वहीं उन लोगों को भी साफ़ तौर से पहचनवा दिया है जो ख़ुदा, उसके दीन और उसकी किताब के दुश्मन हैं, क़ुरआन और हदीस की रौशनी में किसे दुश्मन कहा गया है और उसका क्यों मुक़ाबला किया जाए?
यह ख़ुद अपने आप में एक अलग विषय है, फ़िलहाल जिस बात की तरफ़ इशारा करना है वह यह है कि हमारे दुश्मन को पहचानने का तरीक़ा काफ़ी कमज़ोर है, दुश्मन हमारे सरों पर चढ़ा आ रहा है और हम उसका कुछ नहीं बिगाड़ पा रहे हैं शायद उसकी वजह यह है कि हमारा दुश्मन बहुत शातिर है, जब भी धूल छंटती है और उसका चेहरा सामने आने ही वाला होता है वह फ़ितनों की ऐसी धूल उड़ाता है कि हम उसे भूल कर अपनों के पीछे पड़ जाते हैं, हम अपनों को की शख़्सियत को कमज़ोर करने में लगे रहते हैं और दुश्मन हम सबको किनारे लगाने में जुटा रहता है।
   
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