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कामयाबी क्या है?

सबसे बड़ी अच्छाई क्या है?आपने फ़रमाया: अच्छा अख़लाक़, सब्र और विनम्रता सबसे बड़ी नेकी और अच्छाई है।

विलायत पोर्टल :  दुनिया में लगभग हर आदमी कामयाबी की तमन्ना रखता है, और हर कोई एक कामयाब ज़िंदगी गुज़ारना चाहता है, कोई माल और दौलत हासिल करने को कामयाबी समझता है तो किसी के नज़दीक इज़्ज़त और नाम कमाना ही कामयाबी है तो कोई ख़ुश रहने और अच्छी सेहत को कामयाबी समझता है।
कोई सत्ता को कामयाबी की निशानी समझता है, तो कोई अच्छे परिवार को कामयाबी की दलील समझता है, कोई अपना बिजनेस चमकने को कामयाबी कहता है तो कोई मनमाने तरीक़े से ज़िंदगी गुज़ारने को सबसे बड़ी कामयाबी समझता है।
कोई डर, परेशानी और टेंशन से दूर वाली ज़िंदगी को कामयाबी समझता है तो किसी के नज़दीक आत्मसम्मान कामयाबी की बुनियाद है, कोई आर्थिक तंगी न होने को कामयाबी समझता है तो कोई हायर एजुकेशन को ही कामयाबी समझे बैठा है।
कोई अपने मक़सद में कामयाबी को ही आख़िरी कामयाबी समझता है तो कोई जीत को कामयाबी समझता है, कोई दूसरों के होंठों पर मुस्कुराहट बिखेरने को कामयाबी समझता है, इन सारी बातों को ध्यान में रखते हुए अगर यह कहा जाए तो ग़लत नहीं होगा कि हर शख़्स के नज़दीक कामयाबी को देखने का तरीक़ा अलग है और हर इंसान अपनी ख़्वाहिश को पूरा होते हुए देखने को ही कामयाबी समझता है।
अधिकतर लोग ज़्यादा से ज़्यादा माल जमा करने और दौलत बटोरने को कामयाबी और सबसे बड़ी ख़ुशी समझते हैं, आमतौर से कामयाबी के साथ दौलत ख़ुद चली आती है, इंसानी कामयाबियों में और ख़ुशी में दौलत का रोल बहुत अहम है, हालांकि दौलत ख़ुशियों में चार चांद लगाती है लेकिन दौलत कभी ख़ुशी की वजह नहीं बन सकती।
अब चूंकि हर शख़्स के लिए कामयाबी का अपना अलग मेयार है तो ऐसे में कैसे मुमकिन है कि हर शख़्स की मदद की जाए, लेकिन पैग़म्बर स.अ. की एक हदीस ने कामयाबी के सारे सुनहरे उसूलों को एक जगह जमा कर दिया।
रिवायत में है कि अरब के देहात में रहने वाला एक शख़्स एक बार पैग़म्बर स.अ. के पास आकर कहता है कि मैं कुछ पूछना चाहता हूं, आपकी तरफ़ से इजाज़त मिलने पर उसने कुछ सवाल इस तरह किए और उसके हर सवाल का जवाब पैग़म्बर स.अ. ने बेहतरीन अंदाज़ में पेश किए जिस रिवायत को यहां बयान किया जा रहा है:
उसने कहा: मुझे अमीर और दौलतमंद बनना है उसके लिए क्या करूं?
आपने फ़रमाया: क़नाअत से काम लो अमीर बन जाओगे।
उसने कहा: मैं सबसे बड़ा आलिम बनना चाहता हूं, कैसे बनूं?
आपने फ़रमाया: तक़वा अपनाओ आलिम बन जाओगे।
उसने पूछा: मुझे इज़्ज़त वाला बनना है कैसे बन सकता हूं?
आपने फ़रमाया: मख़लूक़ के सामने हाथ फैलाना बंद कर दो इज़्ज़त ख़ुद तुम्हारे पास चल कर आएगी।
उसने पूछा: अच्छा आदमी कैसे बनूं?
आपने फ़रमाया: लोगों को हमेशा फ़ायदा पहुंचाओ।
उसने कहा: आदिल बनना चाहता हूं कैसे बन सकता हूं?
आपने फ़रमाया: जो अपने लिए पसंद करते हो वही दूसरों के लिए पसंद करो।
उसने कहा: सबसे ज़्यादा ताक़त वाला बनना चाहता हूं?
आपने फ़रमाया: केवल अल्लाह पर भरोसा करो।
उसने पूछा: रोज़ी में बरकत चाहता हूं कैसे मुमकिन होगा?
आपने फ़रमाया: हमेशा वूज़ू की हालत में रहो।
उसने पूछा: दुआओं के क़बूल होने का राज़ जानना चाहता हूं?
आपने फ़रमाया: हराम निवाला मुंह तक मत ले जाओ।
उसने कहा: मुकम्मल ईमान हासिल करना चाहता हूं?
आपने फ़रमाया: अच्छे अख़लाक़ और नेक किरदार से अपने वुजूद को सजाए रखो।
उसने पूछा: गुनाहों में कमी का क्या तरीक़ा है?
आपने फ़रमाया: ज़्यादा से ज़्यादा इस्तेग़फ़ार करो।
उसने पूछा: मैं चाहता हूं अल्लाह मुझ पर रहम करे उसके लिए क्या करूं?
आपने फ़रमाया: तुम भी अल्लाह के बंदों रहम करो उनका हमेशा सम्मान करो।
उसने कहा: अपमान से बचना चाहता हूं?
आपने फ़रमाया: ज़िना से हमेशा दूर रहो।
उसने पूछा: किस तरह से अल्लाह की मुकम्मल पैरवी करने वाला बंदा बन सकता हूं?
आपने फ़रमाया: वाजिब को अंजाम देते रहो, कैसे भी हालात हों वाजिब के अंजाम देने में कोताही और कमी न होने पाए।
उसने पूछा: कौन सी चीज़ अल्लाह की नाराज़गी और और उसके ग़ुस्से को कम कर देती है?
आपने जवाब दिया: छिप कर सदक़ा देने और रिश्तेदारों से मिलने जाते रहने से अल्लाह की नाराज़गी ख़त्म हो जाती है।
फिर उसने पूछा: सबसे बड़ी बुराई क्या है?
आपने फ़रमाया: बुरा अख़लाक़ और कंजूसी सबसे बड़ी बुराई है।
फिर आख़िर में वह अरब के देहात में रहने वाला पूछता है कि: सबसे बड़ी अच्छाई क्या है?
आपने फ़रमाया: अच्छा अख़लाक़, सब्र और विनम्रता सबसे बड़ी नेकी और अच्छाई है।

 (कंज़ुल उम्माल, जिल्द 16,पेज 129)
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