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आख़िर यह कैसी दुश्मनी थी.....!

आख़िर यह कैसी दुश्मनी थी कि जिस घर वालों को पैग़म्बर सलाम करने आते थे उसी घर वालों के सलाम का मदीने वालों ने जवाब देना बंद कर दिया था!आख़िर यह कैसी दुश्मनी थी कि हज़रत ज़हरा स.अ. के मना करने के बावजूद घर कर दरवाज़ा जला कर उनके पहलू पर गिरा दिया!

विलायत पोर्टल :  पैग़म्बर स.अ. की अपनी बेटी हज़रत ज़हरा से मोहब्बत को कौन नहीं जानता!
आयते ततहीर के नाज़िल होने के बाद 6 महीने तक पैग़म्बर स.अ. द्वारा हज़रत ज़हरा स.अ. की चौखट पर सलाम करना किसे याद नहीं!
शहज़ादी के बज़्म में आते ही पैग़म्बर स.अ. द्वारा उन्हें अपनी जगह पर बिठाना किसे नहीं मालूम!
मशहूर हदीस फ़ातिमा मेरा टुकड़ा है जिसने उन्हें तकलीफ़ पहुंचाई उसने मुझे तकलीफ़ पहुंचाई किसने नहीं सुनी!
फ़रिश्तों के उनकी चौखट पर मिसकीन, यतीम और असीर बन कर आने की दास्तान का किसे इल्म नहीं!
जिबरील का आपके घर की चक्की चलाना किसको नहीं पता!
पैग़म्बर स.अ. द्वारा जन्नत की औरतों की सरदार बताए जाने वाली हदीस किसने नहीं सुनी!
जन्नत के जवानों के सरदार की मां होने का शरफ़ आपके अलावा किसी और को नहीं मिलना कौन नहीं जानता!
इतने सारी फ़ज़ीलतें और अज़मतें पढ़ने के बाद दिमाग़ यह बात सोचने पर मजबूर हो जाता है कि आख़िर इस घराने से कैसी दुश्मनी थी जिसके चलते हज़रत ज़हरा स.अ. को अपने बाबा को याद कर के यह मरसिया पढ़ना पड़ा कि ऐ बाबा आपके बाद ऐसी मुसीबत पड़ीं कि अगर रौशन दिन पर पड़तीं तो वह अंधेरी रातों में बदल जाते!
आख़िर यह कैसी दुश्मनी थी कि जिस चौखट पर पैग़म्बर स.अ. सलाम करने आते रहे लोग उस चौखट पर आग और लकड़ियां लेकर उस घर को जलाने जमा हो गए!
आख़िर मदीने वालों की कैसी दुश्मनी थी कि अगर वह अपने बाबा को याद कर के रोतीं तो मदीने वाले इमाम अली अ.स. से शिकायत करने इकट्ठा हो जाते!
आख़िर यह कैसी दुश्मनी थी कि हज़रत ज़हरा स.अ. को अपना हक़ मांगने दरबार जाना पड़ा!
आख़िर यह कैसी दुश्मनी थी हज़रत ज़हरा स.अ. जिसकी तहारत की गवाही क़ुरआन ने दी उसकी गवाही मानने से लोग इंकार कर रहे थे!
आख़िर यह कैसी दुश्मनी थी उन्हीं का हक़ उन्हें देने से मना कर दिया!
आख़िर यह कैसी दुश्मनी थी कि जिस ज़हरा की पाक कोख से दो मासूम इमाम पैदा हुए उसी ज़हरा की कोख में उसके बेटे को मार डाला!
आख़िर यह कैसी दुश्मनी थी कि जिस ज़हरा के सम्मान में पैग़म्बर अपनी जगह से उठ जाते थे उसके शौहर को घर से खींच कर ले जाया गया!
आख़िर यह कैसी दुश्मनी थी कि जिस घर वालों को पैग़म्बर सलाम करने आते थे उसी घर वालों के सलाम का मदीने वालों ने जवाब देना बंद कर दिया था!
आख़िर यह कैसी दुश्मनी थी कि हज़रत ज़हरा स.अ. के मना करने के बावजूद घर कर दरवाज़ा जला कर उनके पहलू पर गिरा दिया!
आख़िर यह कैसी दुश्मनी थी कि जो जन्नत की औरतों की सरदार की पसलियों को तोड़ दिया गया!
आख़िर यह कैसी दुश्मनी थी कि........
हद तो यह है कि आख़िर यह कैसी दुश्मनी थी कि आज तक पैग़म्बर स.अ. की बेटी की क़ब्र वीरान है!
अगर शुमार किया जाए तो इस तरह के सवालों की पूरी किताब तैयार हो सकती है और ऐसा ज़ुल्म करने वालों में से किसी एक के पास भी कोई वजह और कोई दलील नहीं है, तो फिर यही सच है कि पैग़म्बर स.अ. की आल और उनके घराने को अल्लाह की तरफ़ से दी गई फ़ज़ीलतें और अज़मतें और अहलेबैत अ.स. द्वारा हमेशा सच, इंसाफ़ और अदालत का साथ देने और मज़लूमों की मदद करने से इंसानी सूरत में मौजूद शैतानों ने अपने हसद, ईर्ष्या, दुनिया की लालच, अहंकार और भी इसी तरह की सैकड़ों रूहानी बीमारी के चलते अहलेबैत अ.स. से न केवल दुश्मनी की बल्कि उन्हें अपमानित करने की नाकाम कोशिश की और जब अपनी साज़िशों में कामयाब नहीं हो पाए तो उन्हें शहीद कर दिया।


सैयद मोहम्मद मेहदी रिज़वी
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