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कमज़ोरी या हिकमत

यह हक़ हज़रत ज़हरा स.अ. का था इसलिए अपने हक़ को वापस मांगना उनका हक़ था और न मिलने की सूरत में ऐलान कर देतीं कि जो हुकूमत पैग़म्बर स.अ. के हुक़ूक़ छीन सकती है उस पर उम्मत के हुक़ूक़ के बारे में भरोसा नहीं किया जा सकता।

विलायत पोर्टल : इस्लामी मामलात पर नज़र रखने वाले लोग ज़्यादातर इस हक़ीक़त और सच्चाई को भुला देते हैं कि इस्लाम, हकीम ख़ुदा का हिकमत वाला सिस्टम है, इसके क़ानून और क़ायदे में हर तरह की हिकमत और अदालत का ख़्याल रखा गया है, इसकी बुनियाद ताक़त या पॉवर पर नहीं है, इसलिए यह बिल्कुल मुमकिन है कि उसमें बहुत सारी जगहों पर कमज़ोर रुख़ दिखाई देता हो और उसे हिकमत और मसलेहत की बिना पर अपनाया गया हो, ऐसी सूरत में यह नहीं कहा जा सकता है कि इस्लाम ने कमज़ोरी ज़ाहिर की है, बल्कि हिकमत और कमज़ोरी को बैलेंस कर के यह फ़ैसला किया जाएगा कि उस हिकमत के बावजूद उस अमल के तरीक़े को कमज़ोरी कहा जा सकता है या नहीं।
अगर नहीं कहा जा सकता है तो कहने वाले के दिमाग़ की कमज़ोरी है इस्लाम के उसूलों और उसके क़ानून की कमज़ोरी नहीं है, इस बारे में कुछ मिसालें पेश की जा रही हैं:
** पैग़म्बर स.अ. पहले दिन ख़ानदान के काफ़िरों और मुशरिकों की दावत की और सबने पैग़ाम सुनने से इंकार कर दिया और जादूगर कह कर चल दिए तो हुज़ूर ने दूसरे दिन के लिए फिर दावत दी और क़ौम को दूसरे दिन फिर खिलाया।
ज़ाहिर में यह अमल अजीब दिखाई देता है लेकिन इस अमल की अज़ीम हिकमत यह है कि कुफ़्फ़ार ही के अमल से उनके जादूगर होने के आरोप को नकारा जाए कि अगर मैं सच में जादूगर होता और इनके पेट भरे न होते तो यह दूसरे दिन कभी न आते, या अगर मुझे दीवाना और पागल समझते तो मेरी दावत पर कभी न आते।
** हिजरत में पैग़म्बर स.अ. ने अपना पैतृक वतन छोड़ दिया तो इतिहासकार ने इस पर कमज़ोरी का आरोप लगा दिया, हालांकि अगर ऐसा न होता बाद के मामलात में बेहतर अमल सामने नहीं आता और बाद के सारे मामलात में कुफ़्फ़ार को ज़ालिम क़रार न दिया जाता और न ही मक्का की कामयाबी का रास्ता साफ़ होता, यही वजह है कि हुज़ूर ने सन् 6 हिजरी में उमरे को कैंसिल कर दिया और हुदैबिया में सुलह कर के वापस चले गए ताकि पैग़म्बर स.अ. पर ज़ुल्म का आरोप न लगने पाए।
** हुदैबिया के मौक़े पर पैग़म्बर स.अ. ने सुलह की तो कुछ असहाब को आपकी रिसालत में शक हो गया और उसे आपकी कमज़ोरी की दलील बना दिया।
हालांकि यह सुलह न होती तो इस्लाम पर ज़ुल्म का आरोप लगता, और यह भी साबित न हो पाता कि इस्लाम तलवार का मज़हब है या किरदार का, इमाम अली अ.स. जैसे सावंत के होते हुए सुलह करना और फिर सुलहनामा लिखने के लिए क़लम का उन्हीं के हाथ में dena इस बात की निशानी है कि इस्लाम तलवार की तरह क़लम चलाना भी जानता है और जब क़लम से काम चल सकता है तो तलवार का इस्तेमाल नहीं करता, इस्लाम की बुनियादी कोशिश सुलह है, सुलह मुमकिन न हो फिर मैदान में क़दम रखा जाता है।
** इमाम अली अ.स. ने 25 साल ख़ामोशी और घर बैठ कर ज़िंदगी गुज़ारी तो इसके बारे में भी कमज़ोरी का ख़्याल पैदा हो गया।
हालांकि इमाम अली अ.स. की यह ख़ामोशी उस आरोप का बेहतरीन जवाब था कि अली में हुकूमत की लालच पाई जाती है, और फिर इमाम अली अ.स. को मालूम था कि हर दौर में हक़ीक़ी इस्लाम की हुकूमत नहीं रहेगी इसलिए चाहते थे ईमान वालों के लिए एक मिसाल क़ायम कर दें कि हुकूमत अगर इस्लामी उसूलों से अलग हो तो उसके साथ कैसा बर्ताव करना चाहिए और उसमें रहते हुए कैसे ज़िंदगी गुज़ारना चाहिए।
** फ़िदक के मौक़े पर इमाम अली अ.स. ने हज़रत ज़हरा स.अ. को हुकूमत के दरबार में भेज दिया तो यह बात ताक़त और हिम्मत के ख़िलाफ़ नज़र आई।
हालांकि सबसे पहली बात यह हक़ हज़रत ज़हरा स.अ. का था इसलिए अपने हक़ को वापस मांगना उनका हक़ था और न मिलने की सूरत में ऐलान कर देतीं कि जो हुकूमत पैग़म्बर स.अ. के हुक़ूक़ छीन सकती है उस पर उम्मत के हुक़ूक़ के बारे में भरोसा नहीं किया जा सकता।
और दूसरी बात यह कि अगर इमाम अली अ.स. ख़ुद सामने आ जाते तो उसे इंक़ेलाब की कोशिश क़रार दे कर उनके साथ बुरा सुलूक करने को जायज़ ठहराया जाता, इमाम अली अ.स. ने हज़रत ज़हरा स.अ. द्वारा हक़ का ऐलान कर के हुकूमत को रोने पर मजबूर कर दिया ताकि दुनिया के लिए ज़ाहिर हो जाए कि इमामत में इतनी ताक़त पाई जाती है कि वह पर्दे के पीछे रह कर भी हुकूमत को रुला सकती है, इमामत के सामने हुकूमत की कोई हैसियत और औक़ात नहीं होती।


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