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वहाबियों द्वारा अपने विचारों को दूसरों पर थोपना?

दुनिया के बहुत से धर्म और मज़हब ऐसे हैं जिन्होंने अपने मानने वालों को किसी भी प्रकार की तफ़तीश, सवाल जवाब और पूछ ताछ करने से सख़्ती से मना किया है, और मज़हब के बारे में हर तरह की जांच पड़ताल पर पाबंदी लगा रखी है, लेकिन इस्लाम एक ऐसा धर्म है जिसने पूरी आज़ादी के साथ दरवाज़े खोल रखे हैं कि जितना हो सके पूछो

दुनिया के बहुत से धर्म और मज़हब ऐसे हैं जिन्होंने अपने मानने वालों को किसी भी प्रकार की तफ़तीश, सवाल जवाब और पूछ ताछ करने से सख़्ती से मना किया है, और मज़हब के बारे में हर तरह की जांच पड़ताल पर पाबंदी लगा रखी है, लेकिन इस्लाम एक ऐसा धर्म है जिसने पूरी आज़ादी के साथ दरवाज़े खोल रखे हैं कि जितना हो सके पूछो, अपने विचारों को अक़्ल के अनुसार पेश करो, सवाल जवाब करो, अच्छे से पूछ ताछ करो, इस्लाम के बारे में किसी भी प्रकार का कोई भी विचार दिमाग़ में आए उसे मालूम करो, बस यह ध्यान रहे कि किसी प्रकार की हठधर्मी और कट्टरता दिल में न हो बल्कि समझने के लिए सवाल जवाब और पूछताछ हो, जैसाकि ख़ुद क़ुर्आन ने इस बात की ओक इशारा किया है, ख़ुदाया जब भी उन्हें बुलाया ताकि तू उनके गुनाहों को माफ़ कर दे, उन्होंने अपनी उंगलियां कान में लगा लीं, और अपने के कपड़ों में लपेट लिया, अपनी गुमराही पर डटे रहे, और अपनी हेकड़ी पर अटल रहे। (सूरए नूह, आयत 7)
 और जो लोग बिना हठधर्मी और कट्टरता के बातों को सुनते और समझते हैं और अमल करने की कोशिश करते हैं क़ुर्आन में उनकी सराहना भी मौजूद है, अल्लाह फ़रमाता है कि, जो बातों को भलि भांति सुनते हैं और पूरी तरह उस पर अमल करते हैं ऐसे लोगों की अल्लाह ने हिदायत की है, और ऐसे लोग बुध्दिमान लोग हैं। (सूरए ज़ोमर, आयत 17, 18)
यह कट्टर वहाबी पूरी तरह से अल्लाह, क़ुर्आन और इस्लाम के विरुध्द अपने विचारों को पेश करते हैं, इनका अक़ीदा है कि शिर्क और तौहीद जैसे मसलों में अपने विचारों को दूसरों पर थोप दो, चाहे धमकी, क़त्ल औक फ़ितने और फ़साद ही के द्वारा क्यों न हो, यह विचार इनकी बुनियादी किताबों में मौजूद हैं।
आयतुल्लाह मकारिम लिखते हैं कि, जब हम इनके आलिमों से कहते हैं कि अगर तुम लोग आलिम हो तो हम भी आलिम हैं, तुम से अधिक किताबें पढ़ी और लिखी हैं, अगर तुम मुज्तहिद हो तो हम भी मुज्तहिद हैं, मिस्र के अल-अज़हर नामी विश्वविधालय के उलेमा, और दमिश्क़, जार्डन और दूसरे इस्लामी शहरों और देशों में उलेमा और मुज्तहिद मौजूद हैं, क्यों सारे मुसलमान शिर्क और तोहीद के बारे में तुम्हारे विचारों को ही माने और उस पर अमल करें, इनका कहना यह है कि जो हम कहें बस वहा सही है, और जो हमारे विचार हैं वही इस्लाम है, आप लिखते हैं कि, मैं अभी तक वह अजीब घटना भुला नहीं पाया जब अल्लाह के घर की ज़ियारत के लिए गया था तो वहां कट्टर वहाबियों के एक आमेरीन बिल मारूफ़ नामी संगठन के लोग नबी के मज़ार के चारो तरफ़ लंबी लंबी दाढ़ी रखे हाथों में कोड़े लिए खड़े हुए थे, जैसे ही कोई नबी के मज़ार को चूमने के लिए आगे बढ़ता उसके सर पर कसके उस कोड़े से मारते और चिल्लाते यह लोहा और लकड़ी है, इसे चूमना शिर्क है, या इसी तरह नबी के मिंबर को चूमने के लिए एक शख़्स आगे बढ़ा तो इसी संगठन के एक आदमी को यह कहते हुए सुना कि ख़ुदा की क़सम इनसे जिहाद करना जाएज़ है, ऐसे संगठन के घटिया और कट्टर विचारों को (जो इल्म और ज्ञान में भी कोई विशेष दर्जा नहीं रखते हों) अधिकतर मुसलमानों पर थोप देना और ज़बरदस्ती मनवाना बहुत अफ़सोस और दुख की बात है। (वहाबियत बर सरे दो राही, पेज 52, 54)
इन वहाबियों ने कुछ इस्लामी फ़िरक़ों के विरुध्द लिखी किताबों में बहुत ही घटिया और बेहूदा शब्दों को इस्तेमाल किया है, जो पूरी तरह से इनकी कट्टरता को दर्शाता है, आयतुल्लाह मकारिम शीराज़ी एक दूसरी जगह लिखते हैं कि इन कट्टर वहाबियों ने पिछले कुछ सालों में कुछ इस्लामी फ़िरक़ों को रद्द और अस्वीकारते हुए किताबें लिखीं और उन्हें हज के दिनों में पूरे विश्व से आए हुए हाजियों के बीच बांटते हैं जबकि उसमें अपशब्द, झूठी बातें, और शिर्क और कुफ़्र जैसे तरह तरह के बे बुनियाद आरोप के अलावा कुछ नहीं होता, वह अपनी इन किताबों में अपने विरोधियों के लिए बुरे नाम का इस्तेमाल करते हैं जैसे मुशरिक कह कर पुकारना (शरहे कशफ़ुश शुबहात, पेज 77) अल्लाह का दुश्मन कहना (शरहे कशफ़ुश शुबहात, पेज 79) जाहिल मुशरिक कह कर पुकारना (शरहे कशफ़ुश शुबहात, पेज 120) और इसी तरह तौहीद के दुश्मन जैसे नामों दिए हैं। (शरहे कशफ़ुश शुबहात, पेज 65)

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