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साम्राज्यवादी धड़े और नुस्राह फ्रंट की डुगडुगी पर फ़तवा और ज़मीर फरोशों का नंगा नाच

दरबारी मुफ़्ती और महान प्रोफ़ेसर साहेब आपसे सवाल यह है अगर यह ISIS और नुस्राह फ्रंट जैसे आतंकी संगठनों के समर्थन में और ज़ायोनी साम्राज्यवादी एजेंडे को आगे बढ़ाने में सहायता करने के उद्देश्य से किया गया सोशल वार न होकर खलीफा और इस्लामी इतिहास से मोहब्बत थी तो बुज़ुर्ग सहाबी हुज्र बिन अदी और खालिद बिन वलीद की क़ब्रों को जब ISIS और नुस्राह फ्रंट के आतंकियों ने खोद कर बेहुरमती की तो आप और आपका यह अंधभक्तों का टोला चुप क्यों था ?आपकी इस्लामी गैरत कहाँ मर गई थी ?

विलायत पोर्टल :  जनवरी 2020 में सीरियन सेना ने हलब के मअर्रातुन नौमान से आतंकी संगठन जिब्हतुन नुस्राह को मार भगाया था तो आतंकियों के क़ब्ज़े से मुक्त होने वाले भागों मे आंशिक रूप से क्षतिग्रस्त हो चुका उमवी खलीफा उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ का मक़बरा भी था जिसे भागते हुए आतंकियों ने क्षतिग्रस्त कर दिया था ताकि साम्राज्यवादी धड़े के थिंकटैंक समय आने पर आम जनता के भोलेपन का फायदा उठाकर मुसलमानों के बीच नफरत का घिनौना खेल खेल सकें।
ज़ायोनी सऊदी साम्राज्यवादी धड़े की साज़िशों का सामना कर रही सीरियन सेना अपने खिलाफ ऐसा कोई अवसर नहीं देगी कि वह दुनिया भर के मुसलमानों की आस्था से खेल कर अपने खिलाफ एक मोर्चा और खोल ले, हाँ वहाबी आतंकी टोला और इस विचारधारा के लोग अतीत में भी रसूल स.अ. के अहले बैत से लेकर बुज़ुर्ग सहाबा तक सबकी क़ब्रों को तोड़ कर निशान तक मिटाते रहे हैं।

ज़ायोनी साम्राज्यवादी साज़िशों से बेखबर ट्वीटर पर ISIS और नुस्राह फ्रंट तथा अन्य आतंकी संगठन के प्रोपेगण्डे को भारत में हवा देकर शिया सुन्नी फसाद और नफ़रतें फ़ैलाने की कोशिश करने वाले फतवा फरोश मुफ़्ती वहीदुज़्ज़माँ और तथाकथित प्रोफ़ेसर नूरूल को बताना चाहूंगा कि आतंकी विचारधारा वहाबियत के विपरीत शिया फ़िर्क़ा दुश्मनों की क़ब्रों को खोदना भी हराम कहता है फिर कोई शिया उमर बिन अब्दुल अज़ीज़ की क़ब्र की बेहुरमती क्यों करेगा जिसे वह बनी उमय्या के अन्य शासकों से अलग देखते है और उसका हिसाब किताब भी बनी उमय्या के अन्य शासकों से अलग समझते हैं कि उसने बनी उमय्या के सरकारी मुफ्तियों और दरबारी मुल्लाओं और खतीबों की ओर से लगातार 70 वर्षों से इमाम अली अ.स. पर हो रही गली गलौच को बंद कराया और रसूल स.अ. की बेटी का हक़ फदक इमाम बाक़िर अ.स. को वापस किया था।
दरबारी मुफ़्ती और महान प्रोफ़ेसर साहेब आपसे सवाल यह है अगर यह ISIS और नुस्राह फ्रंट जैसे आतंकी संगठनों के समर्थन में और ज़ायोनी साम्राज्यवादी एजेंडे को आगे बढ़ाने में सहायता करने के उद्देश्य से किया गया सोशल वार न होकर खलीफा और इस्लामी इतिहास से मोहब्बत थी तो बुज़ुर्ग सहाबी हुज्र बिन अदी और खालिद बिन वलीद की क़ब्रों को जब ISIS और नुस्राह फ्रंट के आतंकियों ने खोद कर बेहुरमती की तो आप और आपका यह अंधभक्तों का टोला चुप क्यों था ?
आपकी इस्लामी गैरत कहाँ मर गई थी ?
क्यों उम्मत को जगाने का ख्याल नहीं आया ?
क्यों तब इन बुज़ुर्ग सहाबा की क़ब्रों की बेहुरमती करने वाले और उनके मसलक पर तकफ़ीर और शिर्क का फतवा न लगाया गया ?
क्या हुई आपकी इस्लामी ग़ैरत ?
यमन में 20 हज़ार से अधिक मस्जिदें सऊदी बमबारी में तबाह हो गई जिस में बुज़ुर्ग सहाबी मआज़ बिन जबल की बनाई हुई मस्जिद भी थी तब फतवा फरोश मुफ़्ती क्यों चुप रहा?
जवाब बस एक है, नफरत और तफ़र्क़ा फ़ैलाने वाली इन कठपुतलियों को तब अपने आकाओं की ओर से न ऐसा कोई संदेश मिला था न चबाने और भँभोड़ने के लिए कोई हड्डी !
क़ौम और दीन का दर्द होता तो अहले बैत रसूल स.अ. और उम्माहतुल मोमेनीन से बढ़ कर कौन हो सकता है?
जब जन्नतुल बक़ी में उम्महातुल मोमेनीन, सहाबा ऐ किराम, और रसूल की चहेती बेटी हज़रत फ़ातेमा ज़हरा स.अ , रसूल के नवासे और मुसलमानों के खलीफा इमाम हसन अ.स. , इमाम ज़ैनुल आबेदीन सज्जाद और इमाम बाक़िर अ.स समेत इब्ने अब्बास जैसे सहाबी की क़ब्रों को पामाल किया गया उनका निशान तक मिटा दिया गया उस पर ख़ामोशी क्यों?
क्यों आज तक किसी हलक़ से कोई आवाज़ नहीं निकली?
कुफ्र के फतवे बकने वाले यह फतवा फरोश कभी इस्लाम और रसूले इस्लाम के वफादार थे ही नहीं, कल बनी उमय्या के दस्तरखान पर टुकड़े तोड़ते थे आज साम्राज्यवादी धड़े के बेदाम नौकर आले सऊद और कुछ मुस्लिम हुक्मरानों के इशारों पर नाचते हैं।
वहीदुज़्ज़माँ जैसा ज़मीर फरामोश मुफ़्ती जन्नतुल बक़ी पर क्यों कुछ नहीं बोलता?
हुज्र बिन अदी से लेकर खालिद बिन वलीद के मज़ार की बेहुरमती तक सन्नाटा क्यों है ?
आप तो सहाबा की मोहब्बत का नाम लेकर उम्मत में नफरत का सौदा बेचने निकले हो तो बताओ न यमन से लेकर सीरिया तक, मआज़ बिन जबल से लेकर हुज्र बिन अदी और खालिद बिन वलीद के मज़ार तक ISIS नुस्राह फ्रंट और इन जैसे वहाबी आतंकी संगठनों ने जो नंगा नाच किया है उस पर आपने कितने फतवे दिए?
कितने फ़िर्क़ों को काफिर कहा?
किस को इस्राईल का एजेंट कहा?
आप के मसलक के आतंकी सीरिया से लेकर लीबिया, अफ़ग़ानिस्तान से लेकर पाकिस्तान, नाइजीरिया, सूडान, यूरोप,इराक, यमन यहाँ तक कि भारत माता तक की गोद उजाड़ते हुए अलग अलग बम धमाकों में अपने वतन को खून से नहला कर मुसलमानों के खून की होली खेल रहे हैं लेकिन वहीँ सीरिया से अपने ठिकानों से 15-20 किलोमीटर दूर इस्राईल की ओर एक भी फायर नहीं कर सकते
इन सबके बाद भी आप पक्के सच्चे मुजाहिद और इस्राईल की राह में सीसा पिलाई हुई दीवार, लेकिन लेबनान से लेकर सीरिया तक से इस्राईल को बाहर भगाने वाले हिज़्बुल्लाह के शेर इस्राईल के एजेंट हो गए?
आपके आका फिलिस्तीन की पीठ में खंजर घोंप कर इस्राईल के साथ क़ुद्स का सौदा कर बैठे और फिलिस्तीनी दलों के ही अनुसार इस्राईल के मुक़ाबले उनका सच्चा और पक्का मददगार ईरान दुश्मन का एजेंट !
क्या कहें इस अक़्ल और इस बेशर्मी को ?
सामर्रा हो या दमिश्क़ में अली अ.स. की बेटी का मज़ार, काज़मैन, कर्बला या बग़दाद और नजफ़ में आपके दाइशी और नुस्राह फ्रंट के बम धमाके या शहीदे कर्बला इमाम हुसैन अ.स. की मज़लूम बेटी जनाबे सकीना के मज़ार पर हमले,उन्हें तो जाने ही दीजिये !
उनके तो ज़िक्र से ही आपके तन बदन में आग लग जाती है, अली अ.स. का बुग़्ज़ अँधा कर देता है
लेकिन सैफुल्लाह कहे जाने वाले हज़रत खालिद बिन वलीद तो अज़ीम सहाबी है, हुज्र बिन अदी जैसा अज़ीम मुजाहिद सहाबी है, यमन में शहीद होने वाली हज़ारों मस्जिदे अल्लाह का घर हैं उनके लिए भी तो उम्मत को जगाईये, यहाँ भी किसी पर कुफ्र का फतवा लगाएं !
या मान लीजिए जनवरी में हुई चार महीने पुरानी घटना जिस में शिया समुदाय का कोई रोल भी नहीं उस एक घटना की आड़ में आपने हिंदुस्तान में कम से कम सोशल मीडिया की हद तक एकजुट हो रहे मुसलमानों को फ़िर्क़ों फ़िर्क़ों में बाँटने के लिए दुश्मन के इशारों पर नाचते हुए अपने बुज़ुर्गों की पुरानी रिवायतों को ज़िंदा रखा है।
अगर सच में उम्मत का दर्द होगा तो हमें उम्मीद है कि इस तरह आतंकी संगठनों के एजेंडे को फ़ैलाने की भूल करने वाला प्रोफ़ेसर नूरूल और फतवा फरोश मुफ़्ती वहीदुज़्ज़माँ अपने किए पर शर्मिंदा होकर अपना पक्ष स्पष्ट करते हुए अब जन्नतुल बक़ी के लिए उम्मत को जगाने का काम करेंगे।

Maulai G
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