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शिया संप्रदाय

मिललो नहेल की किताबों में शियों के बहुत से संप्रदाय बयान किए हैं जैसा कि अश्अरी ने शियों को पहले तीन गुटों ग़ालिया, राफ़ेज़ा और ज़ैदिया में विभाजित करने के बाद ग़ालियों के 15, राफ़िज़ीयों के 24 और ज़ैदियों के छः समुदाय बयान किए हैं। मिललो नहेल के दूसरे लेखकों ने भी शियों के अनेक संप्रदायों का उल्लेख किया है परन्तु निम्नलिखित बातों पर मनन चिंतन करने से इन दृष्टकोणों का ग़लत और असत्य होना स्पष्ट हो जाता है

विलायत पोर्टलः मिललो नहेल अर्थात धर्मों एंव संप्रदायों का परिचय कराने वाली किताबों में शियों के बहुत से संप्रदाय बयान किए हैं जैसा कि अश्अरी ने शियों को पहले तीन गुटों ग़ालियाराफ़ेज़ा और ज़ैदिया में विभाजित करने के बाद ग़ालियों के 15, राफ़िज़ीयों के 24 और ज़ैदियों के छः समुदाय बयान किए हैं। मिललो नहेल के दूसरे लेखकों ने भी शियों के अनेक संप्रदायों का उल्लेख किया है लेकिन निम्नलिखित बातों के दृष्टिगत इन दृष्टकोणों का ग़लत और असत्य होना स्पष्ट हो जाता है ।

1.     ग़ालियों को इसलिए शिया कहना सही नहीं है चूंकि ग़ाली अहलेबैत अ. को अल्लाह या प्रतिपालक मानते हैं और इस्लामी दृष्टिकोण से ऐसा विश्वास रखने वाला मुश्रिक अर्थात अनेकेश्वरवादी है। इसीलिए इमामों अ. ने ग़ुलू (अतिशयोक्ति) करने वालों को काफ़िर कहा है और उनसे किसी भी प्रकार के सम्बंध को नकारते हुए दूरी बनाए रखने की ताकीद की है। शिया विद्धान भी ग़ुलात को काफ़िर और उन्हें इस्लाम में शामिल नहीं करते हैं। इस बारे में शेख़ मुफ़ीद र.ह. ने लिखा हैः

          ग़ुलातइस्लाम के भेस में उन अधर्मियों का गुट है जो अमीरुल मोमिनीन अ. और दूसरे इमामों को अल्लाह या नबी कहते हैं इसीलिए इमामों अ. ने उन्हें काफ़िर और इस्लाम से बाहर बताया है। 

तस्हीहुल-एतेक़ाद पृष्ठ 109 (इस बारे में अधिक जानकारी के लिए लेखक की किताब ”फ़िरक व म़ज़ाहिबे कलामी का अध्ययन करें।)

          मिलल व नहेल के कुछ लेखकों ने इस बात का ख़्याल रखा है और ग़ुलात के संप्रदायों को अलग अध्याय में बयान किया है अतः बग़दादी और इसफ़राइनी ने ऐसा ही किया है।

(अल-फ़ेरक़ बैनुल फ़ेरक़ पेज 21-23 . अत-तबसीर फ़िद्दीन पेज 123-147)

2.      किसी भी सम्प्रदाय से अगर कोई गुट निकलता है तो उसमें उस सम्प्रदाय के मौलिक सिद्धांतों और विश्वासों का पाया जानी ज़रूरी है चूँकि शियों का सबसे महत्वपूर्ण और मौलिक सिद्धांत "इमामत" है जो उसे दूसरे समुदायों से अलग करता है अतः इमामत को ही विभाजन और अलग गुट होने का आधार बनाना चाहिएदूसरे सिद्धांतों में मतभेद को शिया सम्प्रदाय की पहचान का आधार नहीं बनाया जा सकता है। इसलिए हेशामियःयूनेसीयःनोमानियः आदि संप्रदायों को शिया संप्रदायों में शामिल करना (जैसा कि कुछ किताबों में है) सही नहीं है।

3.      इमामत के मुद्दे में मतभेद के कारण बनने वाले कुछ गुटजिनको मिललो नहेल की किताबों में बयान किया गया हैअब ख़त्म हो चुके हैं और आज उन्हें केवल इतिहास के पन्नों में मौजूद संप्रदायों में ही ढ़ूंढ़ा जा सकता है। उदाहरण स्वरूप मिललो नहेल और इतिहास की किताबों में इमाम हसन असकरी अ. की शहादत के बाद शियों के चौदह गुटों का वर्णन कियाग गया हैजिनमें से आज किसी सम्प्रदाय का नाम व निशान तक मौजूद नहीं है। अगर यह मान लिया जाए कि यह गुट रहे भी होंगे तो आज पूरी तरह से ख़त्म हो चुके हैं। मिललो नहेल की किताबों में बयान किए गए शिया संप्रदायों की ओर इशारा करने के बाद शेख़ तूसी र.ह लिखते हैः

यह वह मतभेद हैं जो शियों के बारे में बयान किए गए हैं परन्तु इनमें से अधिकांश मतभेद ऐसे हैं जिन्हें विश्वसनीय किताबों में बयान नहीं किया गया है और इनमें से कुछ गुट जैसे ग़ुलात और बातेनीयः जो इस्लाम से ही बाहर हैं।

(तलख़ीसुल मुहस्सिल पृष्ठ 413)

          अल्लामा तबातबाई र.ह भी कीसानियःज़ैदियःइस्मालियःफ़तहियः और वाक़ेफ़ीयः जैसे संप्रदायों को बयान करने के बाद लिखते हैः आठवें इमाम अ. के बाद से बारहवें इमाम तक जिन्हें अधिकतर शिया महदी-ए-मौऊद मानते हैंशियों में कोई उल्लेखनीय विभाजन नहीं हुआ और न कोई गुट बना है और अगर कोई गुट बना भी हो तो वह ज़्यादा दिनों तक बाक़ी नहीं रह सका और ख़त्म हो गया जैसे कि इमाम अली तक़ी अ. के बेटे इमाम मान भी लिया परन्तु कुछ ही दिनों के बाद उनसे दूरी बना ली और बाद में जाफ़र ने भी इमामत के दावे से हाथ खींच लिए। इसी प्रकार शिया विद्वानों एंव बुद्धिजीवियों के बीच वैज्ञानिकसैद्धांतिक और न्यायशास्त्रीय मुद्दों में मतभेद पाया जाता है लेकिन ऐसो मतभेदों को धर्म का विभाजन या नए सम्प्रदाय बननानहीं कहा जा सकता है। 

(शिया दर इस्लाम पेज 61)

          उल्लिखित बातों के दृष्टिगत कहा जा सकता है कि शियों के महत्वपूर्ण समुदाय जो मौजूद हैं और हमारे युग में भी जिनके मानने वाले पाये जाते हैंवह केवल तीन गुट हैः 

1.इसना अशरी (इमामिया) 2.ज़ैदिया 3.इस्मालिया। लेकिन इमामत के नाम पर बनने वाले कीसानियःनाऊसियःफ़तहियः और वाक़ेफ़ीयः जैसे सम्प्रदाय पूरी तरह से मिट चुके हैं और वर्तमान युग में उनका नाम व निशान भी बाक़ी नहीं है।

          उल्लिखित तीनों शिया सम्प्रदाय अमीरुल मोमिनीन हज़रत अली अइमाम हसन अ. और इमाम हुसैन अ. की इमामत पर सहमत हैं और उनका मानना है कि यह लोग मासूम हैं और अल्लाह व पैग़म्बर की ओर से इमामत के पद पर नियुक्त किए गए हैं। परन्तु ज़ैदियः समुदाय के मानने वाले इमाम हुसैन अ. के बाद हसन इब्ने हसन (हसने मुसन्ना) और उनके बाद ज़ैद इब्ने अली अ. को इमाम मानते हैं तथा इमाम ज़ैनुल आबेदीन अ. और बाक़ी इमामों की इमामत को स्वीकार नहीं करते। इसी प्रकार इस्मालियः समुदाय भी इमाम जाफ़र सादिक़ अ. के बाद इमाम मूसा काज़िम अ. और बाद के इमामों की इमामत को नहीं मानते हैं। 


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