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हज़रत आयतुल्लाह ख़ामेनई के बयान की रौशनी में

इस्लामी एकता के परिणाम

मुसलमान क़ौमों को चाहिए कि अपनी ताक़त को पहचाने। आज भी अगर इस्लामी मुल्क एक-दूसरे के हाथ में हाथ दे दें तो इतनी ताक़त हो जाएगी कि दुश्मन सामने खड़े होने की हिम्मत भी नहीं कर पाएगा। इस्लाम की सरबुलंदी बिल्कुल यक़ीनी है अगर मुसलमान एक दूसरे का हाथ थाम लें और दुश्मन का मोहरा न बने

मुसलमानों की जीत और सम्मान

मुसलमान क़ौमों को चाहिए कि अपनी ताक़त को पहचाने। आज भी अगर इस्लामी मुल्क एक-दूसरे के हाथ में हाथ दे दें तो इतनी ताक़त हो जाएगी कि दुश्मन सामने खड़े होने की हिम्मत भी नहीं कर पाएगा। इस्लाम की सरबुलंदी बिल्कुल यक़ीनी है अगर मुसलमान एक-दूसरे का हाथ थाम लें और दुश्मन का मोहरा न बने।

जहाँ भी क़ौमें मैदान में उतर चुकी हैं वह मैदान न छोड़ें, डटी रहें, मुश्किलों को बर्दाश्त करें तो अमेरिका हो या अमेरिका जैसा कोई दूसरा मुल्क अपनी मनमानी नहीं कर सकता। अगर मुस्लिम उम्मत जीत हासिल करना चाहती है तो उसे कुछ ज़िम्मेदारियाँ तो क़ुबूल करना ही होंगी और इन ज़िम्मेदारियों में पहली ज़िम्मेदारी है ”यूनिटी“।

मुश्किलों पर कंट्रोल

अगर मुसलमान एक हो जाएँ और जाग जाएँ और अपनी ताक़त को पहचान लें और यह यक़ीन हो जाए कि मौजूदा हालात को बदला जा सकता है और अपने फ़्यूचर को अपने हाथ में लिया जा सकता है। जिस तरह ईरान और कुछ दूसरी क़ौमों ने अपने फ़्यूचर को अपने हाथों में ले लिया है। अगर वह बड़ी ताक़तों के अंडरप्रेशर न रहें तो कोई वजह नहीं है कि मुश्किलें ख़त्म न हों। इस समय सबसे मौलिक चीज़ यही है। 

उनके सामने गिड़गिड़ाना, उनकी चमचागीरी करना, उनके आगे सर झुकानाउनसे किसी मसले पर बात-चीत करना और वह रास्ते अपनाना जिनको अपनाने की कुछ लोग राय देते हैं, इनमें से कोई एक भी मुसलमानों की नजात का रास्ता नहीं है और न इनको अपनाकर मुश्किलें हल हो सकती हैं। हल बस सिर्फ़ और सिर्फ़ एक है और वह है मुसलमानों के बीच एकता, इस्लाम, इस्लामी सिद्धांतों पर डटे रहना, दबाव और सख्तियों का मुक़ाबला करना और एक लम्बी मुद्दत में दुश्मन की ज़िन्दगी तंग कर देना।

मज़बूत इॅकोनामी और मज़बूत पॉलीटिक्स को बढ़ावा देना

इस्लामी मुल्कों के बीच फ़ायदा हासिल करने को लेकर टकराव नहीं है। एक इस्लामी ब्लाक अगर बन जाए तो वह सबके लिए अच्छा है, किसी ख़ास ग्रुप के लिए नहीं। यह चीज़ सबके फ़ायदे की है। अगर बोस्निया के मुसलमानों को इस्लामी दुनिया की हिमायत हासिल न होती तो आज यूरोप में बोस्नियाई मुसलमानों का कोई नामों निशान न होता और अब तक उनका सफ़ाया हो चुका होता। मौजूदा हालात में वेस्ट अफ़्रीका से लेकर ईस्ट एशिया तक के इलाक़ों में मुसलमान आबाद हैं। दुनिया के महत्वपूर्ण इलाक़ें मुसलमानों के पास हैं, इन्हीं हिस्सों में एक हिस्सा फ़ार्स की खाड़ी का भी है। इस इलाक़े के प्राकृतिक स्त्रोतों से अपनी झोली भरने के लिए पूरी दुनिया लाईन लगाए खड़ी है। पूरी दुनिया को इस क्षेत्र में मौजूद तेल की ज़रुरत है, अगर मुसलमान आपस में एकजुट हो जाएँ तो पूरी इस्लामी दुनिया को फ़ायदा पहुँच सकता है।

लीडरशिप व होल्ड

मौजूदा दौर में मुसलमानों को एक होने से रोकने और उन्हें एक-दूसरे के ख़िलाफ़ लगाये रखने के लिए बहुत बड़े पैमाने पर कोशिशें हो रही हैं। अब जब कि मुसलमानों को हमेशा से ज़्यादा इत्तेहाद की ज़रुरत है तो यह कोशिशें और भी तेज़ हो गई हैं। और इन कोशिशों का मक़सद यह है कि मुसलमानों में कोई लीडरशिप उभरने न पाए। यही वजह है कि पूरी कोशिश इस बात की है कि मुसलमानों को एक-दूसरे के ख़ून का प्यासा बना दिया जाए।

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