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क़ासिम सुलैमानी अब भी ज़िंदा हैं

कौन था आख़िर क़ासिम सुलेमानी?वह अपने आप में एक लश्कर था और हर जंग का ज़ख़्म अपने दिल में सजाए बातिल और इंसानियत के दुश्मनों के मुक़ाबले डटा हुआ था।न अस्लहा न ढाल केवल अल्लाह के नाम को अपना सहारा बना कर जंग के के मैदान में सबसे आगे हाज़िर रहना उसकी आदत थी

विलायत पोर्टल : दूसरों के वजूद को बचाते बचाते, अपने ज़ाहिरी वजूद को मिटा दिया इस हस्ती ने........
जिसको बातिन से इतना प्यार था कि जिस्म के टुकड़ों तक को महफ़ूज़ रखने पर ध्यान नहीं दिया.......
हां अगर कुछ बचा था तो वह हाथ, जिससे ज़ालिम के गिरेबान को पकड़ कर मज़लूम का हक़ दिलाया था.....
केवल वह हाथ जिससे अपने आक़ा और मौला इमाम हुसैन अ.स. का मातम किया था.....
ऐसा लगता है कुछ न बचे ऐसा उस अज़ीम सरदार ने पहले ही तय कर लिया था, और फिर उस सूरमा और बहादुर ने अपनी जान को लाखों लोगों के लिए क़ुर्बान कर दिया।
कौन था आख़िर क़ासिम सुलैमानी?
अपने आप में एक लश्कर था और हर जंग का ज़ख़्म अपने दिल में सजाए बातिल और इंसानियत के दुश्मनों के मुक़ाबले डटा हुआ था।
न अस्लहा न ढाल केवल अल्लाह के नाम को अपना सहारा बना कर जंग के के मैदान में सबसे आगे हाज़िर रहना उसकी आदत थी.....
न दुश्मन का डर न अस्लहों का ख़ौफ़ बस केवल शहादत के लिए बेताब....
हर उस जगह मौजूद जहां दुश्मन मौजूद.....
जैसे ही वह जंग के मैदान में क़दम रखता उसके वजूद की ख़ुशबू से ही जंग का मैदान सुकून महसूस करता था कि अब घबराओ नहीं क़ासिम सुलेमानी के क़दम हमारी छाती पर हैं......
नमाज़ का अंदाज़ वही जो आपके मौला और आक़ा इमाम अली अ.स. का था, रातों को जाग जाग कर वैसे ही आंसू बहाना जैसे उसका मौला आंसू बहाता था......
कितना बड़ा दाग़ दे दिया ज़ालिमों ने, कैसी अज़ीम हस्ती को हमसे छीन लिया......
अभी मुंह से यह जुमले निकले ही थे कि, हमारे पास जो कुछ है वह क़ासिम सुलैमानी की देन है और हम क़ासिम सुलैमानी से अहद करते हैं कि जो परचम उनके हाथों में था उसे हम गिरने नहीं देंगे तभी एक आवाज़ आई......
.......... क़ासिम सुलैमानी तो अब भी ज़िंदा है........
तुम देखते क्यों नहीं क़ासिम सुलैमानी तो अभी भी मौजूद हैं....
तुम सोचो कि तुम ज़िंदगी की किस मोड़ पर खड़े हो?
ज़िंदा लाश बन कर, ख़ामोश बे सुध..... जबकि इश्क़ के शहर में क़ासिम सुलैमानी अब भी वहीं खड़ा है जहां पहले था.....
हर गली हर मोहल्ले में जहां दुश्मन इश्क़ के दरिया में ज़हर घोलने की कोशिश कर रहा है....
तुम देखो तो ठीक से
दरियाओं से आगे निकल कर डटा हुआ है सुलैमानी
गर्म पहाड़ों की गोद में
बंजर इलाक़ों में तपते रेगिस्तान में
बर्फ़ीली घाटियों के बीच वह अपने वजूद की गर्मी लिए किसी ज़ख़्मी को अपने सीने से लगाए, किसी ग़रीब के आंसू साफ़ करते हुए.....
किसी कमज़ोर बदन को अपनी पीठ पर लादे
वह तो ज़िंदा है और अपने मक़सद की तरफ़ तेज़ी से आगे बढ़ रहा है।
गली मोहल्लों और सड़कों हर तरफ़ सुलेमानी ही दिखाई दे रहा है, क़ासिम सुलेमानी ज़िंदा है और क़ुरआन ने कई जगहों पर कहा भी है कि शहीद कभी मरता नहीं है
यह अल्लाह की राह में उसी मोर्चे पर डटा हुआ है जहां से ज़ालिम और दुश्मन के हमलों को नाकाम कर रहा था......
और अभी भी उस मोर्चे पर उसके वजूद की गर्मी को महसूस किया जा सकता है.......
क़ासिम सुलेमानी ज़ुहूर की सुबह तक हमारे साथ है, हां हमको सोचना है कि हम आज की सुबह कहां खड़े हैं?
ख़तरों के सीने को चीर कर वह अब भी दुश्मन के मुक़ाबले पर डटा हुआ है.....
क़ासिम सुलेमानी अब भी ज़िंदा है और हमारे साथ यहीं है, इसी बज़्म में जहां हम बैठे हैं, जी हां यहीं पर है वह, बस हमें अपनी आंख की रौशनी बढ़ानी होगी, देखेंगे तो वह ज़रूर नज़र आएगा
वह बहादुर एक पहाड़ था जिसे लांघने की औक़ात दुश्मन में न थी, एक ऐसा पहाड़ जो ऊंचा भी था और ख़ूबसूरत भी.....
एक ऐसा अहलेबैत अ.स. का आशिक़ जिसकी लबों पर हज़रत ज़हरा स.अ. के नाम की ख़ुशबू थी तो उसकी आंखें अपने मौला मुसीबत की याद में भीगी थीं
"जिसकी आंखों में मालिके अश्तर को मौला के साथ जंग करते देखा जा सकता था"
हरम की हिफ़ाज़त में जिसकी बेचैनी आज भी ज़ैनबिया टीले पर एक बहन की भाई के लिए बेचैनी को बयान कर रही है
अगर उस पाक इंसान के वजूद कि गर्मी हमारे वजूद में आ जाए तो हम भी उसी की तरह इज़्ज़त वाले हो जाएंगे और हमेशा रहेंगे
हम भी उस लश्कर का हिस्सा बन जाएंगे जिसे क़ुद्स कहा जाता है जिसका रहबर ख़ुरासानी सय्यद है, मैं ने एक बार फ़िर कहा कि जो कुछ हमारे पास है सब सुलेमानी का है, हम कैसे उनका परचम किसी को दे सकते हैं, हम उनके बाद भी उनके परचम को गिरने नहीं देंगे।
अब भी साम्राज्यवाद के ख़िलाफ़ जंग जारी है, अब भी साम्राज्यवाद तुम्हारे नाम से लरज़ता है, अब भी तुम्हारे नारों और दहाड़ से भागता है
शर्त यह है नारों का रंग यही रहे, नारों में गरज इसी तरह से रहे
अब भी ISIS का मुंह काला है, अब भी शीयत का बोलबाला है
अब भी डरे डरे, सहमे सहमे ट्वीटस के तूफ़ान में किसी सुपर पावर कहे जाने वाले देश की कश्ती का नाख़ुदा आने वाले ख़तरे की बे लगाम मौजों के बीच हिचकोले ले रहा है
और उसके देश की सियासत की नय्या मजधार में जा पहुंची है, इसका मतलब है कि अब भी शहीद क़ासिम सुलेमानी ज़िंदा है
धमकियां किसी मुर्दे को नहीं दी जातीं हैं, धमकियों का सीधा संबंध ज़िंदा लोगों से होता है, अगर किसी को शक है कि क़ासिम सुलेमानी ज़िंदा है या नहीं तो वह यह देखे कि जो धमकियां कल दी जा रही थीं वह जारी हैं या नहीं, अगर जारी हैं तो क़ासिम सुलेमानी ज़िंदा है
क़ासिम सुलैमानी का लहू बातिल परस्तों की लंका को आज भी जलाए है
कितनी ज़बर्दस्त चोट है
कल क़ासिम सुलैमानी के हाथ की मार से ज़ालिमों के चेहरे लाल थे आज सुलेमानी के लहू की मार से चेहरे काले हो गए हैं
हम कैसे मान लें कि क़ासिम सुलैमानी ज़िंदा नहीं हैं, सुलैमानी ज़िंदा हैं तभी तो ज़ालिम के चेहरे पर हवाईयां उड़ रही हैं
कि कल का पता नहीं कब और कहां सुलैमानी का का लहू गले में तौक़ बन कर लटक जाए और इस दौर के फ़िरऔन को शहीदों के ख़ून में डुबो कर दरिया ए नील तक खींच लाए और फिर हमेशा के लिए उसमें डुबो कर हलाक कर दे
पीने पिलाने वाले फ़िरऔन का दम पानी के नीचे घोंट दे
और उसकी लाश को बाहर फेंक दे
कि उसकी ममी बना कर हमेशा के लिए रख लो और कहे:
कि जो किसी मूसा की हमेशा बाक़ी रहने वाली क़ौम के ज़िंदा ए जावेद सूरमा से टकराने की हिम्मत करता है उसका अंजाम यही होता है।

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