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दुआ के आदाब

अगर तुम यह चाहते हो कि अल्लाह तुम्हारी हर दुआ पूरी कर ले तो सारे लोगों से मायूस हो कर केवल अल्लाह को अपनी उम्मीद का मरकज़ क़रार दो और जब तुम्हारे दिल की इस हालत को अल्लाह जान लेगा तो तुम जो भी मांगोगे अल्लाह उसे पूरा कर देगा।

विलायत पोर्टल : ** परवरदिगार की मारेफ़त
दुआ करने वाले के दिल में अल्लाह की मारेफ़त होनी चाहिए, यानी उसे मालूम होना चाहिए कि अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है और उसी की हस्ती से सारी चीज़ों को वुजूद हासिल है, जैसाकि पैग़म्बर स.अ. फ़रमाते हैं: अल्लाह का फ़रमान है कि जो इल्म और यक़ीन रखते हुए मुझ से सवाल करे कि मैं ही फ़ायदा और नुक़सान पहुंचाता हूं तो मैं उसकी दुआ क़बूल कर लेता हूं। (बिहारुल अनवार, जिल्द 90, पेज 305)
इमाम काज़िम अ.स. से नक़्ल है कि कुछ लोगों ने इमाम सादिक़ अ.स. की ख़िदमत में आकर पूछा कि आख़िर क्या वजह है कि हम दुआएं करते हैं मगर हमारी दुआएं क़ुबूल नहीं होतीं? आपने फ़रमाया: इसलिए कि तुम उसे पुकारते हो जिसे पहचानते नहीं हो। (शरहे नहजुल बलाग़ा, जिल्द 11, पेज 230)
** उम्मीद
दूसरी वह अहम चीज़ जो दुआ करते वक़्त ध्यान में रखने की ज़रूरत है वह यह कि हमें इस यक़ीन के साथ दुआ करनी चाहिए कि वह क़ुबूल करने वाला है, जैसाकि पैग़म्बर स.अ. का इरशाद है: इस यक़ीन के साथ अल्लाह से दुआ मांगो कि वह क़ुबूल करेगा। (बिहारुल अनवार, जिल्द 90, पेज 305)
इमाम सादिक़ अ.स. फ़रमाते हैं: जब दुआ करो तो क़ुबूल होने का यक़ीन रखो। (उसूले काफ़ी, जिल्द 2, पेज 473)
** अल्लाह के अलावा हर किसी से उम्मीद को तोड़ना
जो शख़्स अल्लाह की बारगाह में दुआ करता है उसे दूसरे सभी लोगों और चीज़ों से उम्मीद तोड़ लेना चाहिए, इमाम सादिक़ अ.स. फ़रमाया: अगर तुम यह चाहते हो कि अल्लाह तुम्हारी हर दुआ पूरी कर ले तो सारे लोगों से मायूस हो कर केवल अल्लाह को अपनी उम्मीद का मरकज़ क़रार दो और जब तुम्हारे दिल की इस हालत को अल्लाह जान लेगा तो तुम जो भी मांगोगे अल्लाह उसे पूरा कर देगा। (उसूले काफ़ी, जिल्द 2, पेज 148)
** जो ज़बान पर हो वही दिल में भी हो
दुआ के लिए ज़रूरी है कि दुआ ज़बान पर आने से पहले दिल में हो और दिल की गहराइयों से निकल कर ज़बान तक आए, जैसाकि इमाम सादिक़ अ.स. फ़रमाते हैं: बे दिली से की जाने वाली दुआ को अल्लाह क़ुबूल नहीं करता है इसलिए अगर दुआ मांगना है तो दिल को अल्लाह की बारगाह में हाज़िर रखो और यह यक़ीन रखो अल्लाह क़ुबूल करेगा। (उसूले काफ़ी, जिल्द 2, पेज 473)
** बिस्मिल्लाह से शुरुआत करना
पैग़म्बर स.अ. का इरशाद है: ऐसी दुआ को रद्द नहीं किया जाता जिसकी शुरुआत में बिस्मिल्लाह हो। (बिहारुल अनवार, जिल्द 90, पेज 313)
और यूं भी बुनियादी तौर पर हर अमल को बिस्मिल्लाह से ही शुरू करना चाहिए।
** अल्लाह की हम्द
दुआ से पहले अल्लाह की हम्द और तारीफ़ और साथ ही उसकी अज़मत, जलालत और दूसरी सिफ़ात का ज़िक्र करना चाहिए, इमाम सादिक़ अ.स. फ़रमाते हैं: जिस दुआ से पहले अल्लाह की हम्द न हो वह अबतर और अधूरी है। (बिहारुल अनवार, जिल्द 90, पेज 317)
** नबी और आले नबी पर दुरुद और सलाम
अल्लाह की हम्द और तारीफ़ और उसके ज़िक्र के बाद पैग़म्बर स.अ. और उनकी पाक आल अ.स. पर दुरुद और सलाम भेजना चाहिए, पैग़म्बर स.अ. का इरशाद है कि मुझ पर सलवात भेजना तुम्हारी दुआओं के क़बूल होने और आमाल की पाकीज़गी का ज़रिया है। (बिहारुल अनवार, जिल्द 91, पेज 54)
** नबी और आले नबी से तवस्सुल
चूंकि नबी और आले नबी अ.स. अल्लाह की रहमत और उसके फ़ैज़ान का वसीला हैं और उन्हें अल्लाह की बारगाह में शफ़ाअत का हक़ हासिल है इसलिए अपनी दुआएं क़ुबूल कराने के लिए उन्हें वसीला बनाना चाहिए।
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