×
×
×

हमारे ख़ौफ़ और ख़ौफ़े ख़ुदा

हम अल्लाह से अगर डरते हैं तो दुनिया के नुक़सान के लिए (हमारे ख़्याल में बस यही जहन्नुम है) या डरते हैं तो दुनिया के फ़ायदे के लिए कि कहीं छूट न जाए................

विलायत पोर्टल : समाज के हालात का अंदाज़ा उन्हीं लोगों को होता है जो समाज में घुले मिले रहते हैं, मुल्क और क़ौम के हालात का अंदाज़ा हमेशा उन बातों से होता है जो रैली में बसों में और इसी तरह जनता के बीच खड़े की जाती है, अपनी क़ौम में किस तरह के ख़्याल पाए जाते हैं इसका अंदाज़ा भी उन्हीं लोगों को होता रहता है जो आम जनता से रूबरु होते हैं और मुलाक़ात करते रहते हैं, इस आर्टिकल में ख़ुदा के खौफ़ को लेकर हमारे समाज में कैसे कैसे ख़्याल पाए जाते हैं उसकी कुछ मिसालें पेश की जाएंगी जो फ़र्ज़ी नहीं बल्कि सच्चे क़िस्से हैं।
एक बस्ती जिसमें कई हज़ार मोमेनीन रहते हैं, जहां ज़मींदारी की कई नस्लें गुज़र चुकी हैं, जिसके नतीजे में बड़ी तादाद में लोग पढ़े लिखे नहीं होते, अगर दुनियावी तालीम थोड़ी बहुत है भी तो दीनी तालीम से पूरे पूरे ख़ानदान दूर हैं, इन पढ़ाई लिखाई से दूर परिवारों को जेहालत और ग़रीबी ने बुरी आदतों का आदी बना दिया था, हालात यहां तक बुरे हो गए थे कि चोरी और डकैती करने वाले भी पैदा हो गए थे, रात को मोमेनीन ही मोमेनीन के खेत काट लाते थे, रमज़ान और ईद की इफ़्तारी और नमाज़ में शिरकत भी करते थे, हालांकि जब इनसे किसी भी नेक काम के लिए चंदा और डोनेशन मांगी जाती तो वह कहते थे कि हमारे पास हलाल रक़म नहीं है जो हम नेक काम में दे सकें, इनके दिल में ख़ुदा के ख़ौफ़ की बस यही जगह थी यानी हर जुर्म जायज़ था और हर हराम माल इस्तेमाल किया जा सकता था और जब अल्लाह की राह में पैसे मांगे जाते तो अपने पैसों को अल्लाह की राह में देने से डरते थे कि यह हराम कमाई देने से ख़ुदा का ख़ौफ़ याद आता था।
यह बेचारे चोर और जाहिल कहलाते थे इसलिए उनकी बातों पर सब ही खुल कर उन पर निशाना साधते थे, वरना हमारे समाज के कितने किसान, क्लर्क, कारीगर, अफ़सर और बिजनेसमैन वगै़रह हैं जो नाजायज़ आमदानी हासिल करते हैं और ख़र्च करते हैं, वारिसों को महरूम कर के भिखारी बना देते हैं और ख़ुद ठाठ बाट से रहते हैं।
औक़ाफ़ और इदारों को निजी जायदाद की तरह इस्तेमाल करते हैं और क़ौमी शख़्सियत बन जाते हैं, उनकी निगाह में नाजायज़ आमदनी हराम माल हासिल करने में अल्लाह से डरने की कोई ज़रूरत नहीं है, हालांकि कुछ गिने चुने दीनी काम वह साल भर में करते हैं वह इसलिए क्योंकि ख़ानदान में और समाज में वह काम किए जाते हैं, अगर वह न करें तो नक्कू बन जाएंगे, उन गिने चुने दीनी कामों के लिए वह हलाल रक़म बचा कर रखते हैं, यानी खाना पीना, ओढ़ना बिछौना सब हराम रहे तो अल्लाह से डरने की कोई वजह नहीं है क्योंकि यह तो सब ही करते हैं, और जो गिने चुने दीनी काम वह अंजाम देते हैं अगर उनमें हराम रक़म ख़र्च की तो अल्लाह का क़हर नाज़िल हो जाएगा, उनके ख़्याल में किसी भी नजिस और हराम चीज़ खाने में कोई हरज नहीं है।
जुर्म और गुनाह के ज़्यादा होने के बावजूद अल्लाह के सामने निडरता का की वजह यह है कि ऐसा सब लोग करते हैं, और जहां अल्लाह से डर जाते हैं उसकी वजह भी यही है कि यहां पर सब लोग अल्लाह से डरते हैं, यानी मज़हब का हमारे बीच इल्मी वजूद नहीं है, केवल रीति रिवाज का वजूद है, और रीति रिवाज को दीन की रौशनी में बदलना जुर्म है क्योंकि जो काम बाप दादा के ज़माने से नहीं हुआ है, वह आज कैसे हो सकता है, और रिवाज के समर्थन में ख़ानदान की बुज़ुर्ग औरतें भी मिल जाएंगी, मस्जिद के मोअज़्ज़िन भी मिल जाएंगे, मेहराब से मोलवी साहब और मिम्बर से ज़ाकिर साहब भी मिल जाएंगे, ग़रीब दीन की हिमायत और समर्थन के लिए अगर कोई मिलेगा तो केवल फक़ीह मिलेगा, जो कल भी अहकाम की तलाश में दिन रात एक किए था और आज भी एक किए है और इमाम अ.स. के ज़ुहूर तक ऐसे ही रहेगा, मगर हम फक़ीह की तक़लीद नहीं करेंगे, आलम की बात नहीं मानेंगे क्योंकि हम तो रीति रिवाज की तक़लीद करते हैं, अवाम और जनता से डरते हैं अल्लाह से नहीं, दीन को हमारा पाबंद होना चाहिए हम भला दीन के पाबंद क्यों हो जाएं।
जिस बस्ती का ज़िक्र था उस बस्ती के एक मुक़द्दर के फूटे डाकू बन गए थे, जो तौबा करने के बाद अपने क़िस्से बताया करते थे, उन्होंने सुनाया कि अल्लाह के करम से पुलिस के हाथों से बचे रहे क्योंकि कभी किसी कमज़ोर को नहीं सताया, हालांकि एक बार लोग जाग गए हमको भागना पड़ा, और उसी भागने में हमारा बल्लम एक बूढ़ी औरत की आंख में लग गया बस उसी की सज़ा मिली और पकड़े गए, जेल हो गई, यह एक बदनाम आदमी की दास्तान थी सब उसको अपमानित करेंगे, लेकिन यह फ़िक्र करने का अंदाज़ हमारे समाज में कितना फैला हुआ है इसका अंदाज़ा लगाना हो तो शरीफ़ों में बैठिए, बड़े आदमियों की बेबाक बैठकों में जाइए, मुंह बंद और कान खुले रखिए तब आप सुनेंगे कि नौकरी नहीं कारोबार नहीं दुनिया में सब कुछ करना पड़ता है, मगर हम बराबर ग़रीबों का ख़्याल रखते हैं अपने से जो बन पड़ता था वह नेक काम भी करते हैं, किसी कमज़ोर को सताते नहीं हैं, और अल्लाह का करम यह कि मुश्किल से मुश्किल काम आ पड़ते हैं जिसमें जेल जाने का ख़तरा होता है लेकिन अल्लाह बचा लेता है, अल्लाह क्या बचा लेता है बस यही नेकियां काम आ जाती हैं।
संक्षेप में इतना समझ लीजिए कि हम अल्लाह से अगर डरते हैं तो दुनिया के नुक़सान के लिए (हमारे ख़्याल में बस यही जहन्नुम है) या डरते हैं तो दुनिया के फ़ायदे के लिए कि कहीं छूट न जाए (हमारे ख़्याल में दुनियावी फ़ायदा बस जन्नत है), रही बात अल्लाह के अज़ाब से डरना और उसके लिए दीन के हलाल और हराम, वाजिब और गुनाह का जानना, यह पापड़ हमसे न बेले जाएंगे, हम न तक़लीद के चक्कर में पड़ेंगे न दीन की पाबंदी का नुस्ख़ा हमारे बस की बात है हम जो करते आए हैं वही करेंगे, हालांकि क़ुरआन का कहना है कि अगर ज़र्रा बराबर नेकी करोगे तो उसकी जज़ा पाओगे और अगर ज़र्रा बराबर गुनाह करोगे तो उसकी सज़ा पाओगे।
इसलिए अगर हम को अपने ऊपर, अपनी औलाद पर, अपने ख़ानदान पर, अपनी क़ौम पर रहम करना है, ज़ुल्म नहीं करना है तो हमको रिवाज के बजाए दीन को मानना होगा और दीन के अहकाम जानने के लिए आलम की तक़लीद करना होगी, अगर ज़िंदगी इस फ़ार्मूले से बाहर निकली तो ठिकाना केवल और केवल जहन्नुम होगा, यही अल्लाह का फ़रमान है यही क़ुरआन, पैग़म्बर स.अ. और इमामों का हुक्म है।

...............

लाइक कीजिए
0
फॉलो अस
नवीनतम