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पड़ोसी के अधिकार।

इस्लाम ने जहाँ पड़ोसियों के साथ अच्छे से अच्छा सम्बंध बनाए रखने और उनसे अच्छा व्यवहार रखने की ताकीद की है वहीं पड़ोसियों को किसी भी प्रकार की यातना देने से मना किया है और पड़ोसियों से अच्छे सम्बंध रखने और उन्हें तकलीफ़ देने को ईमान के परखे जाने का आधार बताया है....

विलायत पोर्टलः इस्लाम में पड़ोसी के अधिकारों का ख़्याल रखने की बहुत ज़्यादा ताकीद की गई है। हज़रत इमाम जाफ़र सादिक़ अ. फ़रमाते हैः

علیکم بحسن الجوار فان اللہ عزوجل امر بذٰلک

तुम्हारे पर वाजिब है कि पड़ोसियों के साथ अच्छा व्यवहार रखो, क्योंकि उसका हुक्म ख़ुद अल्लाह तआला ने दिया है। (बिहारुल अनवार भाग 69, चैप्चर 38, हदीस 11)

इस हदीस में अल्लाह के जिस हुक्म की तरफ़ इशारा किया गया है वह सूरए नेसा की आयत न0 36 हैः

واعبدوااللہ ولاتشرک بہ شیئا وبالوالدین احساناً وبذی القربیٰ والیتامیٰ والمساکین والجار ذی القربیٰ والجار الجنب والصاحب بالجنب وابن السبیل وماملکت ایمانکم ان اللہ لا یحب من کان مختالاً فخور

और अल्लाह की इबादत करो, किसी चीज़ को उसका शरीक न बनाओ, मां बाप के साथ अच्छा व्यवहार करो और रिश्तेदारों के साथ, यतीमों, मिस्कीनों, पड़ोसियों........... सबके साथ अच्छा व्यवहार रखो कि अल्लाह घमंडियों और अहंकारियों को पसंद नहीं करता है। (सूरए नेसा/36)

पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद स. ने अपने सहाबियों को पड़ोसियों के अधिकारों को अदा करने की ताकीद करने के बाद उनके अधिकारों की अनदेखी करने के ख़तरों के प्रति सचेत कराने के बाद यह फ़रमाया हैः

पड़ोसियों के बारे में जिबरईल ने मुझे इतनी ज़्यादा ताकीद की है कि मुझे यह लगने लगा कि वह पड़ोसियों को एक दूसरे का वारिस बना देंगे।  (कन्ज़ुल उम्माल हदीस 24913)

हज़रत अली अलैहिस्सलाम फ़रमाते हैः

اللہ اللہ فی جیرانکم فانہ وصیۃ نبیکم مازال یوصی بھم حتی ظننا انہ سیورثھم

अल्लाह के लिए अल्लाह के लिए अपने पड़ोसियों का ख़्याल रखो क्योंकि यह तुम्हारे पैग़म्बर की वसीयत है पैग़म्बर उनके बारे में इतनी ज़्यादा ताकीद करते रहते थे कि हमें यह ख़्याल होने लगा कि यह उन्हें वारिस बना देंगे।    (बेहारुल अनवार भाग 71, पेज 153)

पड़ोसियों के अधिकारों के बारे और उनके सम्मान के बारे में पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुसतफ़ा स.अ फ़रमाते हैः

احسن مجاورۃ من جاورک تکن مومناً

अपने पड़ोसियों के साथ अच्छा व्यवहार ताकि मोमिन बन सको। (बेहारुल अनवार भाग 74, पेज 116)

حرمۃ الجار علی الانسان کحرمۃ امہ

पड़ोसी का सम्मान, माँ के सम्मान की तरह ज़रूरी है। (बेहारुल अनवार भाग 73, पेज 154) 

ماتاکدت الحرمۃ بمثل المصاحبۃ والمجاورۃ

दोस्तों और पड़ोसियों के सम्मान की तरह किसी के सम्मान की ताकीद नहीं गई है।

4. हज़रत मुहम्मद मुसतफ़ा स.अ से सवाल किया गयाः

ऐ अल्लाह के नबी क्या पूंजी में ज़कात के अतिरिक्त कोई और अधिकार भी है?

आपने जवाब दियाः

हाँ जब कोई रिश्तेदार तुम से सम्बंध तोड़ ले तो उसके साथ अच्छा व्यवहार करो और पड़ोसियों और रिश्तेदारों से सम्बंध बनाए रखो वह मेरे ऊपर कदापि ईमान नहीं लाया जो रात को भरे पेट के साथ सो जाए और उसका पड़ोसी भूखा हो। (बेहारुल अनवार भाग 71,पेज 151)

5. एक आदमी अपना घर ख़रीदने से पहले हज़रत मुहम्मद स.अ की सेवा में आपसे सलाह मशवेरा करने आया तो आपने कहाः

الجار، ثم الدار، الرفیق قبل السفر

घर ख़रीदने से पहले पड़ोसी और सफ़र से पहले हमसफ़र को देखो।      (मीज़ानुल हिक्मा चैप्टर 64)

6. हदीस में है कि हज़रत मुहम्मद स.अ ने अपने सहाबियों से सवाल किया कि क्या आप लोगों को पड़ोसियों के अधिकार मालूम हैं?

सबने कहा कि नहीं।

तो आपने फ़रमायाः

अगर पड़ोसी तुम्हें अपनी मदद के लिए पुकारे तो उसकी मदद को पहुंचो, उधार माँगे तो उसे उधार दे दो, ज़रूरतमंद हो तो उसकी ज़रूरत को पूरा करो उसे कोई ख़ुशी नसीब हो तो उसे मुबारकबाद दो, मरीज़ हो जाए तो उसे देखने जाओ कोई ग़म या मुसीबत आ पड़े तो उसे तसल्ली दो, अगर मर जाए तो उसके अंतिम संस्कार में शामिल हो और अपने घर की दीवारें इतनी ऊंची न करो कि उसके घर में धूप और हवा जाना बंद हो जाए मगर यह कि वह इजाज़त दे दे। अगर तुम कोई फल ख़रीद कर लाओ तो कुछ फल उसके यहाँ भी भिजवा दो और अगर ऐसा नहीं कर सकते हो तो फ़िर उन्हें छिपा कर अपने घर में ले जाओ और तुम्हारे बच्चे उन्हें बाहर लेकर न निकलें ताकि उसके बच्चों को अफ़सोस न हो और अपने ख़ुशबूदार खानों से उसे दुखी न करो मगर यह कि उसमें से कुछ उसके यहाँ भी भिजवा दो। (बेहरुल अनवार भाग 79, पेज 93)

इस्लाम ने जहाँ पड़ोसियों के साथ अच्छे से अच्छा सम्बंध बनाए रखने और उनसे अच्छा व्यवहार रखने की ताकीद की है वहीं पड़ोसियों को किसी भी प्रकार की यातना देने से मना किया है और पड़ोसियों से अच्छे सम्बंध रखने और उन्हें तकलीफ़ देने को ईमान के परखे जाने का आधार बताया है।

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