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रिश्तेदारों से कत्ए रहम (सम्बंध तोड़ लेना)

इस्लाम के सामाजिक अधिकारों में से एक महत्वपूर्ण अधिकार घर परिवार और रिश्तेदारों से सम्बंध बनाए रखना है। रिश्तेदारों से मिलने जुलने का मतलब यह है कि एक दूसरे का सहयोग किया जाए और ज़रूरतमंदों की ज़रूरतों को पूरा किया जाए और ............

विलायत पोर्टलः इस्लाम ने रिश्तेदारों से मिलने जुलने, घर परिवार एंव रिश्तेदारों से सम्बंध बनाये रखने को बहुत महत्व दिया है। इसलिये यह जानना भी ज़रूरी है कि रिश्तेदारों से सम्बंध तोड़ लेने के बाद एक मुसलमान की ज़िन्दगी में कितने ख़तरनाक और भयानक नतीजे सामने आ सकते हैं।

क़ुर्आने मजीद में अल्लाह फ़रमाता हैः

जो अल्लाह को वचन देने के बाद भी उसे तोड़ देते हैं और जिसे अल्लाह ने (जोड़ने का) हुक़्म दिया है उसे काट देते हैं और ज़मीन में फ़साद करते हैं यही वह लोग हैं जो वास्तव में घाटा उठाने वाले हैं।

इस आयत में अल्लाह तआला ने सम्बंध तोड़ने को ज़मीन में फ़साद (उपद्रव) करने के बराबर बताया है और इस बात की तरफ़ ध्यान दिलाया है कि आपसी सम्बंध तोड़ लेने के बाद (दुश्मनी) पैदा करके और ज़मीन पर फ़साद फ़ैलाने के बाद भी क्या तुम नेजात के उम्मीद करते हो? जब्कि अल्लाह ने तुमको हुक्म दिया है कि हमेशा आपसी भाईचारगी बनाये रखो और रिश्तेदारों से मिलते जुलते रहा करो। 

क़त्ए रहम और आपसी मतभेद के कितने ख़तरनाक परिणाम देखने को मिल सकते हैं इसे निम्लिखित हदीसों की रौशनी में समझा जा सकता है।

पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम फ़रमाते हैं।

जिस क़ौम में कोई क़त्ए रहेम अर्थात रिश्तेदारों से सम्बंध तोड़ने वाला मौजूद हो उस पर अल्लाह की कृपादृष्टि नहीं हो सकती।

इमाम मोहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम ने फ़रमायाः

पैग़म्बरे इस्लाम हज़रत मुहम्मद मुसतफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही वसल्लम ने फ़रमायाः जब सम्बंध टूट जाते हैं तो दौलत और ताक़त बुरे लोगों के हाथों में पहुँच जाती है।

और आपने ही हज़रत अली अलैहिस्सलाम का यह कथन भी बयान किया हैः

तीन चीज़ें ऐसी है जिनको अंजाम देने वाला उस समय तक नहीं मरता जब तक ख़ुद उसका परिणाम न भुगत लेः

1. बग़ावत

2. क़त्ए रहम

3. झूटी क़सम।

हदीसों के अनुसार जो लोग एक दूसरे से क़त्ए रहम करते हैं उन पर अल्लाह की कृपादृष्टि नहीं होती और अगर किसी क़ौम में इस ख़तरनाक बीमारी (क़त्ए रहम और दुश्मनी) का चलन हो जाए तो उनकी सम्पतियों और ख़ुद उनपर भी बुरे लोगों का क़ब्ज़ा हो जाता है। यह बिल्कुल स्पष्ट सी बात है कि जब रिश्तेदारों से मिलने जुलने से आपसी भाईचारे में मज़बूती आती है तो अगर यह सम्पर्क टूट जाए और किसी को दूसरे की चिंता न रहे और किसी के अंदर ज़िम्मेदारी का एहसास बाक़ी न रहे तो फिर लूट खसोट करने वालों और बदमाशों के लिए रास्ते खुल जाते हैं और वह मोमनीन के धन दौलत पर क़ब्ज़ा कर लेते हैं।

इस तरह क़त्ए रहम का भयानक नतीजा इंसान, दुनिया में अपनी आँखों से देख कर ही मरता है क्योंकि सम्बंध और रिश्तेदारी में दूरी और आपसी दुश्मनियां यह एक क़ौमी और समाजी मुद्दा है जिसके ख़तरनाक परिणाम बहुत जल्द ही सामने आ जाते हैं और क़त्ए रहम करना ऐसा ही है जैसे कोई अपने हाथों से काँटे बो रहा हो कि कल उसे काँटे ही काटना पड़ेंगे इसी तरह बुराई के बीज बोने से शर्मिंदगी और घाटे के अलावा किया हासिल हो सकता है?

अतः इस्लाम के सामाजिक अधिकारों में से एक महत्वपूर्ण अधिकार घर परिवार और रिश्तेदारों से सम्बंध बनाए रखना है। रिश्तेदारों से मिलने जुलने का मतलब यह है कि एक दूसरे का सहयोग किया जाए और ज़रूरतमंदों की ज़रूरतों को पूरा किया जाए और सब लोग एक दूसरे का हाथ बटाएँ इससे समाज में ख़ुशहाली का माहौल वजूद में आता है।

क़त्ए रहम से दुनियावी नोक़सान और आख़ेरत में शर्मिंदगी के अलावा और कुछ भी हासिल नहीं होगा।

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