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मालिक-ए-अश्तर

ऐ माविया कहो तो इस ख़त को मौला के पास ले जाऊं और कहो तो ख़ुद जवाब दे दूं, अगर तेरे लश्कर की तादाद सितारों की तरह है तो मेरे लश्कर में अली सूरज की तरह हैं और सूरज की चमक और रौशनी के आगे सितारों का वजूद किसी को दिखाई तक नहीं देता, और अगर तेरा लश्कर राई के दानों की तरह है तो मेरे लश्कर में मालिक-ए-अश्तर हैं जो राई के दानों को चोंच से चुन लेंगे।

विलायत पोर्टल : आपका नाम मालिक इब्ने हारिस और लक़ब अश्तर था, आप इमाम अली अ.स. के बहुत क़रीब थे और इमाम आप पर भरोसा करते थे, आपकी बहादुरी और विलायत और इमामत के लिए दिए गए बलिदान को आज तक इतिहास याद करता है।
आप कूफ़ा में नख़अ क़बीले के थे और इमाम के अज़ीम सहाबियों में शुमार होते थे, आपकी बहादुरी और इमाम से मोहब्बत को कोई भी क़लम लिख नहीं सकता, दूसरे ख़लीफ़ा के दौर में मुसलमानों ने जिस रूम और फ़ारस पर जीत हासिल की थी तो उसमें मालिक शामिल थे और आपने ज़बर्दस्त बहादुरी पेश की थी।
आपकी बहादुरी का चर्चा केवल अपनों के बीच ही नहीं बल्कि दुश्मनों के बीच भी था जैसा कि सिफ़्फ़ीन की जंग से पहले इमाम अली अ.स. ने माविया को तिरिम्माह इब्ने अदी के हाथों एक ख़त भेजा जिसमें आपने माविया के ख़ानदान के फ़साद और इस्लाम से दुश्मनी का ज़िक्र किया था, जब यह ख़त माविया को मिला तो उसे पढ़ने के बाद उसने पढ़ने के बाद कातिब से जवाब लिखवाना शुरू किया, कहा लिखो यह ख़त अल्लाह के बंदे और उसके बंदे के बेटे माविया इब्ने अबू सुफ़ियान के तरफ़ से अली के इब्ने अबू तालिब के लिए: मेरे लश्कर की तादाद सितारों की तरह अनगिनत है जिसके लिए ज़मीन भी छोटी पड़ जाएगी और मेरा लश्कर राई के दानों की तरह है जिसकी गिनती मुमकिन नहीं है।
तिरिम्माह खड़े सुन रहे थे, आपने कहा ऐ माविया कहो तो इस ख़त को मौला के पास ले जाऊं और कहो तो ख़ुद जवाब दे दूं, अगर तेरे लश्कर की तादाद सितारों की तरह है तो मेरे लश्कर में अली सूरज की तरह हैं और सूरज की चमक और रौशनी के आगे सितारों का वजूद किसी को दिखाई तक नहीं देता, और अगर तेरा लश्कर राई के दानों की तरह है तो मेरे लश्कर में मालिक-ए-अश्तर हैं जो राई के दानों को चोंच से चुन लेंगे।
आप इमाम अली अ.स. के साथ जमल, सिफ़्फ़ीन और नेहरवान की जंग में मौजूद रहे।
सिफ़्फ़ीन की जंग में लैलतुल हरीर की उस भयानक रात में जिसमें पूरी रात जंग हुई आप इमाम अली अ.स. के साथ ही मौजूद रहे और इमाम के हुक्म से इस्लाम के दुश्मनों को नाबूद करते रहे जिसके चलते जब माविया को अपनी नाबूदी का यक़ीन हो गया तो उसने अमरे आस के मशविरे से क़ुरआन को नैज़ों पर बुलंद करवा कर नारा लगवा दिया कि हम जंग नहीं क़ुरआन से फ़ैसला चाहते हैं, जिसके नतीजे में इमाम अली अ.स. के लश्कर वालों ने तलवारें रोक लीं और फिर यह देख कर इमाम को भी मजबूर हो कर तलवार रोकनी पड़ी।
दूसरी तरफ़ मालिक जंग कर रहे थे जो माविया के ख़ैमे तक पहुंचने वाले थे आप के पास इमाम का जंग रोकने का पैग़ाम पहुंचा जिसकी वजह से आपको भी जंग रोकनी पड़ी जिसका आपको हमेशा अफ़सोस रहा।
आपकी अज़मत और फ़ज़ीलत के लिए इमाम अली अ.स. का यह जुमला काफ़ी है कि अशतर मेरे लिए ऐसे ही हैं जैसे मैं पैग़म्बर स.अ. के लिए था।
इमाम अली अ.स. ने आपको नसीबीन का हाकिम बनाया, सन् 38 हिजरी में जब आप नेहरवान की जंग लड़ रहे थे तो माविया ने अमरे आस को 6 हज़ार के लश्कर के साथ मिस्र की तरफ़ भेजा, वहां के हकीम मोहम्मद इब्ने अबू बक्र ने इमाम अली अ.स. से मदद मांगी तो इमाम ने मालिक को नसीबीन से बुला कर मिस्र की तरफ़ भेजा, जब माविया को यह ख़बर मिली तो मालिक की बहादुरी और जंग के नतीजे को सोंच कर घबरा गया और मिस्र के रास्ते के कुछ जमींदारों को माल व दौलत देकर मालिक को ज़हर देने के लिए तैयार किया, क़ुलज़ुम के ज़मींदार ने आपको रोका और दावत पर बुला कर शर्बत में ज़हर मिला कर आपको शहीद कर दिया।
आप केवल बहादुरी ही में नहीं बल्कि इल्म, सब्र और इबादत में भी ऊंचे दर्जे पर पहुंचे हुए थे, आप बहुत ज़्यादा रोज़े रखते थे और ज़्यादा से ज़्यादा इबादत में ज़िंदगी गुज़ारते थे, एक दिन आप एक मामूली लिबास पहन कर कूफ़ा के बाज़ार से गुज़र रहे थे, एक दुकानदार ने आपकी तरफ़ लकड़ी उछाल दी, आपने कुछ नहीं कहा और सर झुका कर चले गए, लोगों ने कहा तुमको पता नहीं शायद, यह मालिके अशतर हैं, वह घबरा कर पीछे पीछे चल दिया उसने देखा वह मस्जिद में गए और नमाज़ पढ़ने लगे, जब नमाज़ ख़त्म हुई तो वह बढ़ा और हाथ जोड़कर माफ़ी मांगने लगा, मलिक ने कहा तुमने कोई गुनाह नहीं किया मैं तो तुम्हारी मग़फ़ेरत के लिए ही मस्जिद आया और नमाज़ पढ़ी।




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