×
×
×

मज़दूर और मोलवी साहब

वह समझ गया कि यह इमाम साहब की पूरी एक महीने की सैलरी है जो पूरी उन्होंने इसके हवाले कर दी है, वह भागता हुआ इमाम साहब के घर पहुंचा और कहा कि यह आपने क्या किया आप अगर मुझे दे देंगे तो आपका ख़र्च कैसे चलेगा? इमाम साहब ने कहा कि यह आप ही का है और इसे मैं बिल्कुल भी वापस नहीं लूंगा, इमाम साहब ने जब उसे ज़्यादा ही परेशान देखा तो कहा अल्लाह रिज़्क़ देने वाला है और सामने खुले हुए क़ुरआन पर नज़रें झुका दीं।

विलायत पोर्टल :  कुछ दिन तो आस पड़ोस से क़र्ज़ लेकर घर चल गया लेकिन अब तो कोई यह सोच कर क़र्ज़ भी नहीं देता कि जब काम नहीं है तो वापस कैसे मिलेगा बीमारी तो फैलती जा रही है, सड़कें सुनसान हैं, लोग घरों में दुबके बैठे हैं हर तरफ़ हाहाकार मची है।
आज आठवां दिन है घर में तवा चूल्हे पर नहीं चढ़ा, चढ़ता भी कैसे जब आटा जो नहीं तो रोटी कैसे पके? माँ का खांसते खांसते बुरा हाल है, न रात को सो पाती है न दिन में चैन है, रात में पुरानी खांसी नहीं सोने देती दिन में भूखे बच्चे नहीं सोने देते, पूरा दिन उन्हें बहलाने में गुज़र जाता, डॉक्टर के पास जाने का ख़तरा कौन मोल ले कौन समझाएगा कि यह खांसी अभी की नहीं है, यूं भी मज़दूर के बच्चे दिन रात खांसते ही रहते हैं लेकिन अब यह खांसी भी मुसीबत है मनहूस बीमारी की निशानी है।
पुरानी बासी रोटी में घी लगाकर जो माँ के मुताबिक़ मलीदा बनाया था उसी पर गुज़ारा हो रहा था जो कभी बच्चों को नाश्ते में दिया जाता था, जब दिहाड़ी मिलती थी तो माँ ने कुछ दिन की कमाई इकठ्ठा की और घी मंगवाया था और ढेर सारी बासी रोटियों में डाल कर मलीदा जैसा कुछ बना दिया था।
सुबह सुबह छोटू मोनू स्कूल जाते हैं तो जल्दी जल्दी थैली में बांध कर उन्हें यह बासी रोटियों का नाश्ता दे दिया जाता कि बच्चे स्कूल में भूखे न रहें, अब बेचारे बच्चों का खाना पूरा घर खा रहा था फिर भी भूखा था।
ऐसा नहीं है कि वह काम पर नहीं जाता घर में पड़ा रहता वह तो बेचारा रोज़ सुबह सवेरे 4 बजे अपने झोले में ज़रूरत का सामान रख कर चौक की तरफ़ निकल जाता लेकिन शहर में वबा और बीमारी ही ऐसी फैली है कि कोई उसे काम पर ले जाने को तैयार नहीं जबकि बेचारा रूमाल से अपना मुंह ऐसा ढ़ांक कर जाता कि कोई मास्क क्या हिफ़ाज़त करेगा।
हालांकि हुकूमत को तरफ़ से एलान है कि जो मज़दूर अपने अपने घरों में रहेंगे उन्हें हुकूमत की तरफ़ से मदद दी जाएगी लेकिन इसका मामला ही अलग है इसका रजिस्ट्रेशन होता है जिससे वह अपने पेशे को साबित करे कि वह मज़दूर है।
बेचारा रोज़ चौक तक जाता और ख़ाली हाथ वापस आ जाता है, ख़ाली हाथ वापस होना बड़ी मुश्किल है उससे बड़ी मुश्किल बच्चों को समझाना है, दरवाज़े पर जैसे ही दस्तक देता है बच्चे पैरों से लिपट जाते हैं अब्बा हमारे लिए आज क्या लाए, और उसका सर झुक जाता है, बच्चों को समझाने के लिए उसके पास बस इतना ही है कि बस कुछ दिन की बात और है, यह कोरोना की बीमारी टल जाएगी तो रोटी सब्ज़ी बिस्कुट फल दालमोट नमक सब लेकर आऊंगा, बच्चे भी दिल से दुआ करते हैं कि जल्दी से यह कोरोना की बीमारी टले तो सब कुछ पटरी पर वापस आए।
आज फिर सुबह उठ कर वह चौक पर उस जगह जाने की तैयारी कर रहा था जहां से कोई न कोई गाड़ी उसे छोटे मोटे काम के लिए ले जाती थी और वह शाम तक अपने हाथों में मां की दवाएं खाने पीने का सामान लेकर मुस्कुराता हुआ पहुंचता कि साहब ने मेरा मज़दूरी का जो हक़ बनता था वह तो नहीं दिया लेकिन ख़ुदाया तेरा शुक्र है कि मैंने मेरा काम अच्छे से किया और किसी का हक़ नहीं मारा।
आज सुबह सुबह उसने बाहर निकलने के लिए घर का दरवाज़ा खोला ही था कि सामने मोहल्ले की मस्जिद के मोलवी साहब अपने बेटे के साथ हाथ में कुछ ग़ल्ला और घर का ज़रूरी सामान लिए हुए नज़र आए, उन्होंने बिना ज़्यादा कुछ कहे घर के दरवाज़े पर थैला रखा और साथ ही जेब से एक लिफ़ाफ़ा निकाल कर कहा इसे रख लो, जब उसने मना किया तो मोलवी साहब ने ज़बर्दस्ती उसकी जेब में रख दिया और ख़ुदा हाफ़िज़ कह कर आगे बढ़ गए, उसकी आंखों में आंसू आ गए वह अंदर गया और झोला खोला तो लगभग दो हफ़्तों का राशन मौजूद था, मोलवी साहब के लिए अपने आप दिल से दुआ निकली, अब लिफ़ाफ़ा खोला तो उसमे साढ़े पांच हज़ार रुपए थे, जब वह पैसे गिन चुका तो उसे लिफ़ाफ़े के किनारे कुछ लिखा दिखाई दिया, उसने ध्यान से देखा तो उसमे टेढ़ी मेढ़ी उर्दू में लिखा था "इमाम साहब का हदिया 5500 रुपए केवल"
वह समझ गया कि यह इमाम साहब की पूरी एक महीने की सैलरी है जो पूरी उन्होंने इसके हवाले कर दी है, वह भागता हुआ इमाम साहब के घर पहुंचा और कहा कि यह आपने क्या किया आप अगर मुझे दे देंगे तो आपका ख़र्च कैसे चलेगा? इमाम साहब ने कहा कि यह आप ही का है और इसे मैं बिल्कुल भी वापस नहीं लूंगा, इमाम साहब ने जब उसे ज़्यादा ही परेशान देखा तो कहा अल्लाह रिज़्क़ देने वाला है और सामने खुले हुए क़ुरआन पर नज़रें झुका दीं।
वह वापस अपने घर की तरफ़ चल दिया उसके माथे पर पसीने की बूंदें थीं, वह सोच रहा था कि जिस तरह मेरी दिहाड़ी बंद है उसी तरह मोलवी साहब की मस्जिद भी तो बंद है, घरों में अब कोई मोलवी साहब को क़ुरआन पढ़ाने के लिए भी नहीं बुलाता, मोलवी साहब वह वाले भी नहीं हैं जिनका कोई मदरसा हो, किसी के वकील हों, कहीं से हर महीने उनकी मदद भी नहीं होती या ऐसा भी नहीं है कि दुआ तावीज़ कराने वाले उनके मुरीद उनका ख़्याल रखते हों, वह तो बेचारे नमाज़ पढ़ा कर, क़ुरआन और दीनियात पढ़ा कर ही अपना गुज़ारा करते हैं, वह अपने घर की तरफ़ बढ़ता जा रहा था और उसके दिमाग़ में यही विचार चल रहे थे कि "जब मेरी दिहाड़ी बंद है तो मोलवी साहब का ख़र्च कैसे चल रहा होगा?"।

हुज्जतुल इस्लाम आलीजनाब मौलाना नजीबुल हसन साहब


..........

लाइक कीजिए
2
फॉलो अस
नवीनतम
हज़रत आयतुल्लाह ख़ामेनई के बया ...

इस्लामी एकता के परिणाम