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क्या यह वही ईरान है?

अमेरिका को इस लांचिंग पर बेचैनी है और उसका कहना है कि ईरान ने यह सैटेलाइट लांच कर के अंतरराष्ट्रीय समझौते का विरोध किया है, वैसे यह अमेरिका अपने अलावा किसी किसी भी देश की तरफ़ से लांच होने वाली सैटेलाइट को अंतर्राष्ट्रीय क़ानून के मुताबिक़ नहीं समझता, इसीलिए उसने चीन और दक्षिण कोरिया को भी कई मौक़ों पर ऐसी ही धमकियां दी हैं, जिन पर यह देश अब कान तक नहीं धरते।

विलायत पोर्टल : पिछले दिनों ईरान ने अपने देश में तैयार होने वाले सैटेलाइट "नूर" को अपने ही देश में तैयार होने वाले लांचर द्वारा पूरी कामयाबी के साथ फ़िज़ा में पहुंचा दिया, सैटेलाइट ने लांच होने के बाद 90 मिनट बाद अपने ज़मीनी सेंटर पर सिग्नल देना शुरू कर दिया था, वैसे तो फ़िज़ा में कई देशों के सैटेलाइट मौजूद हैं, हालांकि अभी हर देश के पास यह टेक्नोलॉजी नहीं है कि वह अपने सैटेलाइट ख़ुद फ़िज़ा में भेज सके, इस काम के लिए ज़्यादातर ग़रीब देशों को विकासशील देशों का सहारा लेना पड़ता है, ईरान ने इस सैटेलाइट को फ़िज़ा में भेजने के लिए इससे पहले दो तजुर्बे किए थे जिनमें उसे कामयाबी नहीं मिली थी, लेकिन इस बार वह कामयाब हुए, सूत्रों के अनुसार यह सैन्य सैटेलाइट है लेकिन इसे सैन्य कामों के अलावा भी इस्तेमाल किया जा सकता है, इस सैटेलाइट को उसकी जगह तक पहुंचाने के लिए जो लांचर इस्तेमाल किया गया उसके बारे में यह जानकारी है कि उसमें ठोस ईंधन इस्तेमाल हुआ है, एक्सपर्ट्स के मुताबिक़ ठोस ईंधन को लांचर में इस्तेमाल करने की टेक्नोलॉजी गिने चुने देशों के पास है, ईरान उन गिने चुने देशों में से एक है, कहा जाता है कि इस ईंधन के इस्तेमाल के लिए काफ़ी हाईटेक टेक्नोलॉजी की ज़रूरत है, नूर के सफ़ल प्रयोग से यह बात साफ़ हो गई कि ईरान ने यह हाईटेक टेक्नोलॉजी हासिल कर ली है ईरान ने इस बात को भी साफ़ किया है कि हम इस टेक्नोलॉजी को मिसाइल सिस्टम में इस्तेमाल करने का इरादा नहीं रखते हैं, हालांकि यह बात एक हक़ीक़त है कि वह ऐसा करने की क्षमता रखते हैं, इसीलिए अमेरिका को इस लांचिंग पर बेचैनी है और उसका कहना है कि ईरान ने यह सैटेलाइट लांच कर के अंतरराष्ट्रीय समझौते का विरोध किया है, वैसे यह अमेरिका अपने अलावा किसी किसी भी देश की तरफ़ से लांच होने वाली सैटेलाइट को अंतर्राष्ट्रीय क़ानून के मुताबिक़ नहीं समझता, इसीलिए उसने चीन और दक्षिण कोरिया को भी कई मौक़ों पर ऐसी ही धमकियां दी हैं, जिन पर यह देश अब कान तक नहीं धरते।
मेरा हैरत में डूबा हुआ सवाल सच में दुनिया के बड़े से बड़े बुद्धिजीवी को भी हैरत में डाले हुए है कि ईरान जो अमेरिका, यूरोप, यूरोपीय यूनियन, संयुक्त राष्ट्र संघ की तरफ़ से पिछले तीन दहाईयों पाबंदियों का सामना कर रहा है, जहां मिसाइल, टेक्नोलॉजी, तरक़्क़ी, साइंस के अनेक विभाग, फ़ौजी इदारे और शख़्सियतें, बैंक, करंसी, कारोबार, हवाई क्षेत्र, समुद्री क्षेत्र और दूसरे कई क्षेत्रों पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पाबंदियां हैं, जिसकी अर्थव्यवस्था और GDP को कभी सुख की सांस नहीं लेने दिया गया, उसने कैसे सैटेलाइट बनाई और फिर ख़ुद ही स्पेस में भेज दिया, वह भी ऐसे समय में जब ईरान कोरोना महामारी के निशाने पर है उसके हज़ारों नागरिक इस बीमारी से जान की बाज़ी हार चुके हैं।
ईरान ने इससे पहले भी दुनिया को कई बार हैरत में डाला है, कभी अमेरिकी ड्रोन उतार कर, कभी हाई टेक ड्रोन को मार गिरा कर, कभी इराक़ में अमेरिकी अड्डों को निशाना बना कर, हालांकि इस बार ईरान ने सारी हदें पार कर दीं और दुनिया को यह बता दिया कि ईरान के हालात चाहे जैसे भी क्यों न हों, ईरानी क़ौम की तरक़्क़ी का सफ़र किसी भी हाल में थमने वाला नहीं है, अगर ईरान की जगह कोई और देश होता जो यूरोपीय देशों की ओर से पाबंदियों को इतने लंबे समय से झेल रहा होता तो मैं नहीं समझता कि वह फ़िज़ा में गुब्बारे छोड़ने से ऊपर जा सका होता, ईरान की लीडरशिप, साइंसदानों, बुद्धिजीवियों ने सारी दुनिया के सामने यह साबित कर दिया कि अगर कोई क़ौम तरक़्क़ी और आगे बढ़ने का फ़ैसला कर ले तो दुनिया की बड़ी से बड़ी ताक़त उसके इरादों को कमज़ोर नहीं कर सकती है, ईरानियों ने यही साबित किया है कि आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और साइंटेफ़िक पाबंदियां तरक़्क़ी की रफ़्तार धीमी तो कर सकती हैं लेकिन पूरी तरह से रोकना इन पाबंदियों के बस से बाहर है।
ईरान ने नूर सैटेलाइट को सफ़लतापूर्वक फ़िज़ा में पहुंचाने का तजुर्बा कर के जहां साइंस और इल्मी मैदान में अपनी क्षमता और योग्यता को दर्शाया है, वहीं उसने इलाक़े के दूसरे देशों को भी ऐसी ही तरक़्क़ी और आगे बढ़ने के मौक़े दिए, कोरोना के ख़िलाफ़ जंग में भी ईरान ने बहुत जल्द ऐसे इंक़लाबी क़दम उठाए हैं जिनसे देश में मरने वालों की संख्या और आंकड़े दूसरे कई विकासशील देशों से कम हैं, ईरान में कोरोना मरीज़ों के ठीक होने की संख्या चीन के बाद सब से ज़्यादा है, ईरान में अब तक 90,000 कोरोना के मरीज़ों का रजिस्ट्रेशन हुआ है जिसमें लगभग 70,000 ठीक हो चुके हैं, इस समय ईरान में Covid19 के लगभग 15,000 केस मौजूद हैं जबकि मरने वालों की संख्या लगभग 5700 है, ईरान की इस कामयाबी का दूसरे किसी देश के मुक़ाबले जोड़ कर देखना बिल्कुल ग़लत है क्योंकि इस्लामी देशों को देखें या सारी दुनिया को, कोई भी देश ऐसा नहीं है जो अमेरिका और यूरोपीय देशों की तरफ़ से इतनी पाबंदियों को झेल रहा हो और आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, व्यापारिक और साइंटिफिक प्रतिबंधों के बावजूद ऐसा चमत्कार दिखाए।
साइंस की तरक़्क़ी की यह मिसालें और उन डिपार्टमेंट में आत्मनिर्भर होना ईरानी क़ौम और वहां की लीडरशिप की ख़ास विशेषता रही है और यही उनके अल्लाह पर मुकम्मल ईमान की दलील है।
 
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