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काश कोई मुझे समझता!

अली की हक़ीक़ी ज़िंदगी और रोज़ाना की आपकी एक्टिविटी और पाक सीरत क्यों छिपी हुई है?इसके अलावा मेरी समझ में यह बात नहीं आती कि अली इंसानी इतिहास की सबसे मज़लूम हस्ती क्यों हैं?अली पर इतने ज़ुल्‍म क्यों हुए?और फिर अली की शहादत के बाद शाम में लोगों ने शहनाईयां क्यों बजाई?अली की शहादत की ख़बर मिलने पर शामी एक दूसरे को हैरत से देख कर क्यों पूछ रहे थे कि "अली और मस्जिद में?"

विलायत पोर्टल : एक ग़मगीन, दुखी, टूटे हुए दिल और लुटे हुए इंसान के दिल की गहराई से छेड़ी गई ग़म की दास्तान जो अपने आप को दुनिया का सबसे ज़्यादा मजबूर, दुखी और सताया हुआ इंसान समझता था लेकिन जब उसे पता चला कि इस दुनिया में एक ऐसा शख़्स भी है जो पूरी दुनिया का गौरव और फ़ख़्र होते हुए भी ख़ुद इससे ज़्यादा मज़लूम और सताया हुआ है तो उस शख़्स का सर शर्म से झुक गया उसने अपने आंसुओं को अपना क़ीमती ख़ज़ाना बना लिया और ग़म की दौलत को सीने से लिपटा कर बिलख बिलख कर रो पड़ा मगर ख़ुद पर नहीं बल्कि दुनिया के उस गौरव पर जो ख़ुद उससे ज़्यादा दुखी था।
मैं........ एक ऐसा फूल हूं जो बिखर गया
मैं........ एक ऐसा जाम हूं जो टूट गया
मैं........ वह कमज़ोर इंसान जिसने बेहिसी के घुटते हुए माहौल में अगर हल्की सी एहसास की गर्मी पाई तो पिघल कर पानी हो गया
मैं......... आंसुओं में जमा हुआ वह पुतला जो हमदर्दी की हल्की सी गर्मी पाकर पानी पानी हो जाता लेकिन बर्फ़ की शक्ल में पड़ा रहा और एहसास की हल्की सी आंच से भी महरूम रहा
मैं........ टूटा हुआ दिल
मैं........ एक ऐसा इंसान जिसके खलियान में धुएं और कुछ जले हुए तिनकों के अलावा कुछ भी नहीं
मैं......... एक तंहा, अकेला, दर्द का मारा और टूटा हुआ इंसान
एक ऐसा इंसान जिसे कभी किसी ने समझने की कोशिश नहीं की, हर एक मेरे हंसते हुए चेहरे को देख कर मेरे होंटों पर सजी हुई मुस्कुराहट को देख कर मेरी ख़ुशहाल ज़िंदगी का बयान समझ कर मुझ से हसद करता रहा, लेकिन किसी ने भी मेरे उस बिखरे हुए वुजूद के अंदर झांक कर नहीं देखा।
और मैं अपनी आंखों में सब्र का बांध बांधे जीता रहा लेकिन किसी ने मेरे वुजूद के अंदर पाए जाने वाले तूफ़ान को समझने की कोशिश नहीं की।
काश...... कोई मेरे अंदर पाई जाने वाली उलझनों को समझता
काश....... कोई मेरे जज़्बात और भावनाओं की गहराइयों उतर सकता
काश...... कोई मेरे दिल की किताब के ख़ून से रंगीन पन्नों को पढ़ता
काश....... कोई मेरे एहसास और जज़्बातों को ख़ुद से बात करने का मौक़ा देता
मगर अफ़सोस! किसी ने मुझे नहीं समझा और किसी ने भी मुझे समझने की कोशिश नहीं की, अल्लाह की इतनी बड़ी दुनिया में एक काग़ज़ के टुकड़े की इधर उधर पड़ा लोगों की बे मुरव्वती पर आंसू बहाता रहा।
मुझे इस बात का तो अफ़सोस है ही कि किसी ने भी मुझे नहीं समझा लेकिन उससे ज़्यादा मुझे अपने ऊपर रोना इसलिए आता है कि मेरे माबूद! यह तूने मेरा कैसा इम्तेहान लिया है कि जब मेरे दर्द और एहसास का कोई समझने वाला कोई नहीं तो फिर तूने मुझे ऐसा दिल क्यों दिया जो किसी मुरझाए फूल को देखे तो दुखी हो जाए
किसी पेड़ से पत्तों को झड़ता हुआ देखे तो रो पड़े, किसी घर से उठते हुए धुएं को देखे तो दिल थाम कर बैठ जाए, किसी कबूतर को अकेला देखे तो उसके साथ परवाज़ करने की सोंचने लगे
मालिक! यह तूने मुझे कैसा एहसास दिया कि मैं जिस मंज़र को देखता हूं बस कुछ ही पल उसमें हरियाली दिखाई देती है, यानी कुछ पल के लिए होंटो पर एक अजीब सी मुस्कुराहट आकर चली जाती है लेकिन तुरंत मुझे ऐसा लगता है कि जैसे वह मंज़र आंसू बहा रहा हो, रो रहा हो और मुझसे कहना चाह रहा हो "मेरे लिए दुनिया की कोई ख़ुशी ख़ुशी नहीं है जब तक उसमें मेरे आंसुओं की मिलावट न हो, मैं ख़ुशी की ऐसी किसी क़िस्म को नहीं पहचानता, लोग क्यों हंसते हैं? और क्यों ठहाके मार कर हंसते हैं?
माबूद! जब तूने ऐसा ही दिया है तो काश तूने मुझे आंसू बनाया होता तो मैं लोगों की आंखों में चमकता........ दामन पर गिरता........ और फिर...... फ़ना हो जाता
लेकिन तूने यह मुझे कौन सा एहसास दिया है मलिक! कि तूने मुझे एक ऐसा इंसान बना दिया कि जो इंसान होकर भी एक बूंद आंसू के बराबर नहीं, और न ही ख़ुशी के आंसू का वह क़तरा जो आंखों में जगमगाए आए थोड़ी ही देर में रोने वाले के दामन पर गिर कर फ़ना हो जाए
मेरे लिए तो हर एक दिन दुखों का नया सूरज उगता है जो दर्द और बेचैनी की नई तड़पती रौशनी लेकर दिल के पन्नों को शाम जैसा रंगीन बना कर चला जाता है।
उफ़ मेरे मालिक! मैं इतने ग़म नहीं सह सकता
माबूद! मैं इतने ग़मों का बोझ नहीं उठा सकता
यही सब सोचते सोचते मुझे न जाने कब नींद आ गई पता ही नहीं चला, जब आंख खुली तो मस्जिद से अल्लाहो अकबर की आवाज़ आ रही थी.... मैंने मालिक की किबरियाई का इक़रार करते हुए अल्लाह की अज़मत और बुज़ुर्गी की गवाही दी, आज मैंने अल्लाहो अकबर को अपने वुजूद की गहराइयों में उतरा हुआ पाया, मैं बिस्तर से उठा और वुज़ू करने के लिए तैयार हुआ कानों में अज़ान के जुमले टकरा रहे थे, पैग़म्बर स.अ. की रिसालत की गवाही मैंने भी दोहराई और अपने हाथों को धोया, जैसे ही मैंने वुज़ू करते हुए अपने चेहरे पर पानी डाला मेरे कानों में आवाज़ आई "अशहदो अन्ना अलिय्यन वलिय्युल्लाह" मैंने इस जुमले को भी दोहराया लेकिन इस जुमले को दोहराते हुए मेरी सिसकियां बंध गईं, मैं एकदम से चौंका आज उन्नीसवीं माहे मुबारक है और फिर मेरी निगाहों में मस्जिदे कूफ़ा का मंज़र घूमने लगा।
वह उन्नीस की शब, वह इमाम अली अ.स. का बेचैन होकर कभी हुजरे में कभी सहन में आना, वह उम्मे कुलसूम का बाबा को देख कर तड़पना, वह मुर्ग़ाबियों का इमाम को घेर कर नौहा पढ़ना और रोना, वह दरवाज़े की ज़ंजीर का रिदा से उलझना, वह......
मालिक! आज शबे क़द्र है, इस्तेग़फ़ार की रात, तौबा की रात, गुनाहों के इक़रार करने की रात, अली की मज़लूमियत पर रोने की रात, मेरे ज़ेहेन के पर्दे पर उन्नीसवीं की दर्दनाक रात की तस्वीरों के साथ ही यह ख़्याल जैसे ही आया मैंने दुआ के लिए हाथ उठाए, माबूद क्या इस शब के सदक़े में मेरी तक़दीर बदल सकती है, मलिक क्या मुझे ग़मों से रिहाई मिल सकती है?
 अभी मेरे लबों पर यह जुमले आए ही थे कि तारीख़ मेरे सामने मुजस्सम हो गई और मेरी हर सोच का अंदाज़ बदल गया, शबे क़द्र में की गई इस दुआ के बाद जब भी मैं सोचता हूं, दुख दर्द और मुसीबत के इतिहास पर जब भी निगाह दौड़ाता हूं तो मेरे लिए सब कुछ साफ़ हो जाता है, सारे दुख मुझे अपने लगते हैं, बला और मुसीबत के राज़ मुझसे बातें करते हैं, और यह उस समय होता है जब तारीख़ की उंगली थामे मैं एक ग़रीब, दुखी, बे सहारा, मज़दूर शख़्स के पास पहुंचता हूं यह ग़रीब शख़्स कुछ खजूर के पेड़ लगा रहा है, पूरा जिस्म पसीने में भीगा हुआ है, जब यह शख़्स अपना काम ख़त्म कर लेता है तो बेलचा उठाकर किनारे रखता है अपना चेहरा अपने दामन से पोछता है लेकिन यह क्या!!
जब वह अपनी पेशानी से पसीने को साफ़ करता है तो एक अजीब सी लुभाने वाली महक पूरी फ़िज़ा को ख़ुशबूदार कर देती है और उसके पसीने की बूंदों से कुछ मोती बन कर ज़मीन पर गिरते हैं, मैं तारीख़ से पूछता हूं यह कौन है तो तारीख़ मुझे कुछ नहीं बताती बस एक सन्नाटा सा रहता है लेकिन मैं तारीख़ की उंगली नहीं छोड़ता उसे पकड़े हुए आगे बढ़ता हूं।
पुराने कपड़े पहने एक थका हारा शख़्स घर में जाता है और वहां तंदूर जलाता है, उस घर में कुछ यतीम बच्चे हैं यह शख़्स उनके लिए पैसे रोटियां बनाता है और बच्चों की मां को दिलासा देता है और उनके लिए और राशन का सामान पहुंचाने का वादा कर के चल पड़ता है, मैं तारीख़ से सवाल करता हूं कि यह शख़्स कौन है? लेकिन तारीख़ मुझे कुछ नहीं बताती वह ख़ामोश निगाहों से बस मुझे तकती रहती है
 रात का अंधेरा है एक ग़रीब इंसान अपनी पीठ पर रोटियों की बोरी लादे हुए धीरे धीरे कूफ़ा की अंधेरी और पतली गलियों में चल रहा है, टूटे हुए घर और खंडर में जाता है और भूख से बिलख कर सो जाने वाले छोटे छोटे बच्चों के पास रोटियां रख कर उन्हें मोहब्बत भरी निगाहों से देखता है, उनके सरों पर प्यार भरा हाथ फेरता है और उठ जाता है, मैं तारीख़ से पूछता हूं यह कौन है? लेकिन तारीख़ यहां पर भी अपने लबों पर ख़ामोशी की मोहर लगाए चुप है।
खाने का समय है, एक थका हारा पसीने में भीगा हुआ शख़्स घर पहुंचता है, बच्चे उसका इंतेज़ार कर रहे हैं कि बाबा के आने पर खाने का बंदोबस्त होगा लेकिन वह ख़ाली हाथ है, उसके पास कुछ भी नहीं है, उसकी निगाह जब बच्चों के मुरझाए हुए चेहरों पर पड़ती है तो उसके दिल में एक टीस सी उठती है, कुछ सोच कर कोई चीज़ अपने हाथ में उठाता है और घर से निकल पड़ता है और उसे गिरवी रखता है कुछ पैसे हाथ आते हैं उन्हें लेकर बाज़ार की तरफ़ चल पड़ता है कि बच्चों के लिए कुछ खाने का बंदोबस्त कर सके, रास्ते में एक फ़क़ीर मिलता है आपस में न जाने क्या बात होती है सारे पैसे उस फ़क़ीर के हवाले कर देता है और ख़ुद ख़ाली हाथ वापस घर पहुंच जाता है, बच्चे बाबा का इंतेज़ार करते करते सो चुके हैं, रात काफ़ी हो चुकी है अपनी बीवी से थोड़ी देर कुछ बात करता है और फिर सो जाता है, मैं तारीख़ से सवाल करता हूं यह कौन है? लेकिन तारीख़ यहां पर भी ख़ामोश है।
 रात का तीसरा पहर है मुझे एक अंधेरे कुंवे से किसी के रोने की आवाज़ आ रही है, कोई बहुत ही दर्दनाक तरीक़े से रो रहा है, मैं तारीख़ की उंगली थामे कुंवें के पास पहुंचता हूं, एक ग़रीब शख़्स नज़र आता है जो कुंवे में सर डाले अंधेरे कुंवे से दर्दे दिल बयान कर रहा है, मैं तारीख़ से पूछता हूं कि यह कौन है और क्यों रो रहा है लेकिन तारीख़ इस बार भी मुझे कोई जवाब नहीं देती।
रात धीरे धीरे अपनी मंज़िल की तरफ़ बढ़ रही है एक जंगल से किसी के रोने की आवाज़ आ रही है, आवाज़ में पैदा होने वाली थरथराहट से रोने वाले के दर्द को महसूस किया जा सकता है, मैं तारीख़ की उंगली थामे रोने वाले के और क़रीब जाता हूं तो उसकी ज़ुबान से यह जुमले सुनता हूं: मालिक तेरे पास उस दिन से पनाह चाहता हूं जब न माल काम आएगा न औलाद, और उस दिन से अमान चाहता हूं जब न बाप को बेटे की जज़ा दी जाएगी और न बेटा बाप की जगह ले सकेगा..... मालिक उस दिन से अमान चाहता हूं जब मुजरिमों को उनके चेहरे से पहचाना जाएगा और उनकी पेशानी के बालों को पकड़ कर तेरी बारगाह में लाया जाएगा.... मालिक उस दिन से अमान चाहता हूं जब इंसान अपने भाई, मां बाप, बीवी और औलाद से भागेगा.... मालिक जब किसी के लिए कोई पनाहगाह न होगी, जहन्नुम वह जलाने वाली आग है जो खाल को जला देगी.... मालिक तू मेरा मलिक है और मैं तेरा बंदा, क्या अपने ग़ुलाम पर मालिक के अलावा कोई और रहम करता है.......
अब हिचकियों और सिसकियों के बीच केवल "मौलाया या मौलाया" यानी ऐ मेरे मौला ऐ मेरे आक़ा की आवाज़ ही सुनी जा सकती है, धीरे धीरे यह आवाज़ आना भी बंद हो जाती है, शायद ज़्यादा रोने की वजह से रोने वाला बेहोश हो गया है, लेकिन कुछ ही देर फिर रोने वाले की दर्द में डूबी हुई आवाज़ पूरी फ़िज़ा को ग़मगीन कर देती है....
"माबूद मैं तेरी हम्द करता हूं कि तू अपने इस मुसलमान बंदे के रोने और गिड़गिड़ाने की आवाज़ को सुनेगा जिसे तेरे अहकाम की ना फ़रमानी की वजह से जहन्नुम के तबक़ों में क़ैद कर दिया गया है और वह बिलखते हुए तड़प तड़प कर तुझे पुकार रहा है...... मालिक तू उसे कैसे जलाएगा जबकि वह तेरी उम्मीद लगाए हुए है, मलिक उसे कैसे आग जला सकती है जबकि तू उसकी आवाज़ सुन रहा है और उसकी जगह को देख रहा है...."
मैं यह फ़सीह कलाम को देख कर लरज़ जाता हूं, कोई इन जुमलों का सहारा लेकर भी मालिक के दरबार में मुनाजात कर सकता है, मैं तारीख़ से पूछता हूं कि आख़िर यह कौन है कि इतने ख़ूबसूरत शब्दों में अपने मालिक से दिल का दर्द बयान कर रहा है? लेकिन तारीख़ ख़ामोश है।
रमज़ानुल मुबारक की 19वीं शब है मैं तारीख़ की उंगली थामे मस्जिदे कूफ़ा पहुंचता हूं.....
उन्नीसवीं रमज़ान की शब सहर के वक़्त एक दर्द से डूबी आवाज़ बुलंद होती है जिससे कूफ़ा शहर की दीवारें तक दहल जाती हैं "फ़ुज़्तो व रब्बिल काबा" और मस्जिद की मेहराब किसी के नाहक़ ख़ून से रंगीन हो जाती है, मैं तारीख़ से सवाल करता हूं यह नारा किसने बुलंद किया और यह किसके लहू से मस्जिद की मेहराब रंगीन हो गई? लेकिन तारीख़ ख़ामोश है।
रमज़ानुल मुबारक की 20 तारीख़ है, लोग एक घर के बाहर जमा हैं, घर के अंदर कल सहर के वक़्त ज़ख़्मी होने वाला शख़्स बिस्तर पर है, तभी अचानक शोर उठता है, एक मुजरिम को जिसके हाथ बंधे हैं मशकें कसी हुई हैं घर में लाया जाता है, लोग देख रहे हैं कि अब क्या होगा... कल जिसने वार किया था उसे पकड़ लिया गया है, उसे ज़ख़्मी शख़्स के पास लाया जाता है, ज़ख़्मी शख़्स के हाथ में दूध का गिलास है जो वह अपने क़ातिल की तरफ़ बढ़ा देता है और रस्सी खोलने का हुक्म देता है, अपने बेटे से कहता है कि इसने मेरे सर पर एक वार किया है, अगर मैं ज़िंदा रहा तो ठीक है मैं ख़ुद देखूंगा मुझे क्या करना है लेकिन अगर मैं इस वार के नतीजे में गुज़र गया तो तुम भी केवल एक ही वार करना..... मैं यह सुनता हूं तो दिल कटने लगता है, मैं फिर तारीख़ से सवाल करता हूं यह कौन है जो अपने दुश्मन के साथ भी इंसाफ़ चाहता है? जो अपने दुश्मन के लिए भी दूध का प्याला पेश कर रहा है? लेकिन तारीख़ यहां भी ख़ामोश है।
रमज़ानुल मुबारक की बीसवीं तारीख़ धीरे धीरे गुज़र रही है, मैं तारीख़ की उंगली थामे उस जगह पहुंचता हूं जहां अचानक एक शोर उठता है, लोग डरे और परेशान हुए इधर उधर भाग रहे हैं, किसी हकीम को लाया गया है लोग हसरत भरी निगाहों से उसे देख रहे हैं, हकीम उनसे आराम से रहने की गुज़ारिश करते हुए घर में दाख़िल होता है, एक भेड़ ज़िबह कर के उसकी सफ़ेद नस लाने को कहता है, भेड़ ज़िबह की जाती है, सफ़ेद नस लेकर उस ज़ख़्मी इंसान के ज़ख़्मी हिस्से पर रखता है और कुछ ही देर में उठा लेता है, उस नस के साथ दिमाग़ के ज़र्रात भी आ जाते हैं... उफ़ कितना दर्दनाक मंज़र है, हकीम की आंखों में मायूसी की परछाइयाँ हैं, वह उस ज़ख़्मी शख़्स से वसीयत करने के लिए कहता है और हाथों को दुआ के लिए उठा देता है, साथ ही यह भी कहता है कि ज़हर का असर बहुत ज़्यादा हो चुका है, ऐसी हालत में कमज़ोरी बहुत आ जाती है इसलिए अगर दूध का इंतेज़ाम हो जाए तो बेहतर है, जैसे ही यह ख़बर बाहर निकलती है नन्हे नन्हे बच्चे दूध का कूज़ा लिए दौड़ पड़ते हैं, मैं तारीख़ से सवाल करता हूं आख़िर दिलों पर हुकूमत करने वाला आख़िर यह शख़्स कौन है? जिसकी तकलीफ़ इन यतीम बच्चों से नहीं देखी जाती, लेकिन यहां भी तारीख़ कोई जवाब नहीं देती...
रमज़ानुल मुबारक को इक्कीस तारीख़ है, कूफ़ा शहर मातम कदा बना हुआ है, हर तरफ़ काले कपड़े पहने हुए लोग हैं, हर किसी की आंखों में आंसू हैं, हर एक हैरान, परेशान और उदास नज़र आ रहा है, मैं तारीख़ से पूछता हूं आख़िर माजरा क्या है और क्या हुआ? लेकिन तारीख़ हमेशा की तरह ख़ामोश है।।
रात का अंधेरा है, कूफ़ा शहर के एक पुराने और टूटे मकान से एक जनाज़ा निकल रहा है, जनाज़े से नूर निकल रहा है, उस पूरी अंधेरी रात में अगर कोई चीज़ रौशन है तो वह नूर हाओ जो जनाज़े से निकल रहा है, जनाज़े के पीछे पीछे जहां और भी लोग हैं वहां कुछ यतीम बच्चे भी नज़र आ रहे हैं जिनके हाथों में दूध से भरे कूज़े हैं और वह जनाज़े के पीछे दौड़ रहे, उनकी आंखों में उदासी के बादल हैं, अश्कों की रिमझिम है, और होंटों पर वा अलिययाह की आवाज़ें हैं, इस बार मैं तारीख़ से कुछ नहीं पूछता हूं इसलिए कि मुझे मालूम है कि तारीख़ गूंगी है वह मुझे कुछ नहीं बता सकती बल्कि मैं उन यतीम बच्चों की आंखों में देखता हूं जहां मुझे नज़र आ रहा है कि एक शख़्स कभी उनके सरों पर हाथ फेर रहा है तो कभी बाप बन कर उन्हें दिलासा दे रहा है कभी उनके लिए घोड़ा बन रहा है और बच्चे उसकी पीठ पर चहक रहे हैं, कभी उनके लिए तंदूर रौशन कर रहा है कभी उन्हें अपने हाथों से निवाला दे रहा है, कभी अपनी आग़ोश में उनके सर रख कर उन्हें सुला रहा है.....
अब तारीख़ की कड़ियां ख़ुद एक दूसरे से मिल जाती हैं जब तारीख़ की कड़ी से कड़ी मिलती है तो अब सब कुछ समझ में आ जाता है कि यह कौन है अब मुझे तारीख़ से पूछने की ज़रूरत नहीं कि "फ़ुज़्तो व रब्बिल काबा" का नारा लगाने वाला कौन है? इसलिए कि इंसानी इतिहास का यह ऐतिहासिक जुमला इंसानियत की सबसे मज़लूम हस्ती इमाम अली अ.स. के अलावा कौन हो सकता है? अब जब यह सारी हक़ीक़त मेरे लिए ज़ाहिर हो चुकी है तो तारीख़ मेरे सामने मुजरिम बनी खड़ी सपाट नज़रों से मुझे देख रही है उसके माथे पर शर्मिंदगी के पसीने की बूंदें हैं, तारीख़ शर्मिंदा है, एक ऐसे शख़्स की ज़िंदगी के अलग अलग मरहलों को ज़ाहिर न करने पर जिसके फ़ज़ाएल ख़ुद ब ख़ुद लोगों की ज़बान पर आम हो गए।
क्या आज तक कोई इतर की ख़ुशबू और निकहत को छिपाने में कामयाब हो पाया है?
लेकिन मेरे लिए और तारीख़ को पढ़ने वाले हर दिल रखने वाले सेंसिटिव इंसान के लिए एक मसला अभी तक हल नहीं हुआ है और वह यह कि अली की हक़ीक़ी ज़िंदगी और रोज़ाना की आपकी एक्टिविटी और पाक सीरत क्यों छिपी हुई है?
इसके अलावा मेरी समझ में यह बात नहीं आती कि अली इंसानी इतिहास की सबसे मज़लूम हस्ती क्यों हैं?
अली पर इतने ज़ुल्‍म क्यों हुए?
और फिर अली की शहादत के बाद शाम में लोगों ने शहनाईयां क्यों बजाई?
अली की शहादत की ख़बर मिलने पर शामी एक दूसरे को हैरत से देख कर क्यों पूछ रहे थे कि "अली और मस्जिद में?"
इन सारे सवालों के अलावा मेरा सबसे बुनियादी सवाल भी अभी तक हल नहीं हो सका और वह यह कि अली की शख़्सियत में वह कौन सा राज़ छिपा है कि जिसने आपकी ज़ात को अभी तक लोगों से छिपा कर रखा है?
यह सारे सवाल मेरे दिमाग़ में जो बेचैनी और उलझन पैदा कर रहे हैं उनके सामने मैं अपनी ज़िंदगी से मिलने वाले दुखों को भूल चुका हूं और अब मुझे अपनी ज़िंदगी से लगे ज़ख़्मों पर कोई शिकवा नहीं है और न ही अपने किसी तरह के दर्द की कोई शिकायत है और हो भी क्यों?
"जबकि मेरे कानों में सर डाले अली के रोने की आवाज़ के साथ यह आवाज़ भी आ रही है कि काश कोई मुझे समझता"....?

मौलाना सैयद नजीबुल हसन ज़ैदी
तर्जुमा सय्यद मौहम्मद महदी रिज़वी

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