×
×
×

जन्नतुल बक़ी को ढ़हाने से बे गुनाहों के ख़ून की होली तक, शैतान की डुगडुगी पर तकफ़ीरियत का नंगा नाच

यक़ीनन जब कभी भी अल्लाहो अकबर के नारों की गूंज में मशीन गन और रॉकेट लांचर से मौत बरसती है तो शैतान डुगडुगी बजा कर अपने चेलों का हौसला बढ़ाता है उसके क़हक़हे बढ़ते हैं, उसकी टोलियां आबाद होती हैं, कहीं यह ISIS का हाथ थामे दिखाई देता है कहीं अल-नुसरह का, कहीं अल-क़ायदा और तालिबान तो कहीं बोकोहराम, अल-अहरार और जुंदुल्लाह का, सबकी आवाज़ें एक जैसी, सबके रंग एक जैसे, सबका अंदाज़ एक जैसा, यह नफ़रत की आग में दहकते आग के गोले, यह बर्दाश्त न कर पाने के धुवें में काले सियाह साए, शैतान के कारिंदे और इबलीस के साथी नहीं तो कौन हैं?

विलायत पोर्टल : दुनिया भर में मौजूद आज़ादी को पसंद करने वाले हर साल जन्नतुल बक़ी को ढ़हाने के दुखी मौक़े पर उस दिन की याद में मजलिसों का इंतेज़ाम करते हैं, अलग अलग प्रोग्राम और प्रोटेस्ट में हिस्सा लेकर अपना विरोध दर्ज कराते हैं, हालांकि कोरोना बीमारी को देखते हुए इस साल यह विरोध और प्रोटेस्ट न सड़कों पर हो सकता है और न ही हम किसी प्रोग्राम का आयोजन कर सकते हैं लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इस मौक़े पर विरोध न हो, प्रोटेस्ट इस बार भी होगा लेकिन उसका अंदाज़ बदल जाएगा, सभी आज़ादी पसंद लोगों की यही कोशिश होगी कि मज़हब और धर्म से आगे निकल कर इंसानी हमदर्दी की बुनियाद पर इस बार भी ज़ोरदार अंदाज़ से अपनी बात को दुनिया तक पहुंचा सकें और ज़ुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठा कर अपने ज़िंदा ज़मीर होने का सबूत दें, हां इतना ज़रूर है कि इस बार प्रोटेस्ट का प्लेटफ़ार्म बदल जाएगा और ज़्यादातर विरोध सोशल मीडिया पर होगा जो इस समय इतना प्रभाव और असर रखती है कि असली प्लेटफ़ार्म से ज़्यादा लोग सोशल मीडिया, वेब और दूसरे तरीक़ों से एक्टिव नज़र आते हैं।
प्रोटेस्ट क्यों?
हो सकता है किसी के दिमाग़ में यह सवाल हो आख़िर हर साल इस प्रोटेस्ट की ज़रूरत क्या है? और इससे क्या फ़ायदा है? तो ऐसे लोगों को अपने ज़मीर से सवाल करना चाहिए फ़र्ज़ करें कि किसी की पुश्तैनी ऐसी ज़मीन पर कोई क़ब्ज़ा कर ले जिससे ख़ानदानी यादें जुड़ी हों, ख़ानदान की कोई निशानी हो और ऐसी ज़मीन पर मौजूद इमारत को तोड़ दिया जाए तो इंसान का रिएक्शन क्या होगा? क्या वह चीख़ चिल्ला कर ख़ामोश बैठ जाएगा? या फिर जब तक दोबारा उसकी ज़मीन उसे मिल नहीं जाती दोबारा इमारत बन नहीं जाती तब तक वह प्रोटेस्ट और विरोध करेगा? क्या किसी का हक़ मार लेने वाले बद किरदार और शातिर इंसान के सामने यह सोच कर ख़ामोश बैठ जाए तो बेहतर है कि अब जो जाना था चला गया अब हाथ पैर मारने से क्या फ़ायदा या फिर जब तक जान में जान है इंसान को अपने हक़ को हासिल करने के लिए कोशिश करना चाहिए?
यक़ीनन इंसान का ज़मीर अगर बेदार है तो वह यही कहेगा कि अगर ना हक़ किसी जगह पर क़ब्ज़ा किया गया है, अगर ना हक़ इमारत को गिराया गया है, अगर ना हक़ किसी यादगार चीज़ को मिटाया गया है तो इंसानी ज़मीर की आवाज़ यही है कि जब तक इसकी भरपाई न हो जब तक हक़ न मिले तब तक प्रोटेस्ट और विरोध होना चाहिए।
8 शव्वाल को क्या हुआ?
8 शव्वाल की तारीख़ इस दर्दनाक दास्तान की याद को ताज़ा करती है जब 90 साल से ज़्यादा समय होने वाला है वहाबियत और तकफ़ीरियत ने इस तारीख़ी क़ब्रिस्तान को ढ़हा कर के आने वाले कल के लिए अपने ख़ून ख़राबे की सियासत का ऐलान कर दिया था।
यूं तो एक सदी होने वाली है लेकिन जन्नतुल बक़ी के तारीख़ी क़ब्रिस्तान को ढ़हाने का ग़म आज भी ताज़ा है, वह क़ब्रिस्तान जिसमें रसूले रहमत की बेटी हज़रत फ़ातिमा ज़हरा (स.अ.) (एक रिवायत के मुताबिक़) और उनके बेटों की क़ब्रें थीं जिन्होंने इंसान की इल्मी तरक़्क़ी को वह ऊंचाई दी जिस पर पहुंच कर आज इंसान उनके शगिर्दों के सामने झुका नज़र आ रहा है कि इमाम बाक़िर अ.स. ने फ़रमाया इमाम सादिक़ ने फ़रमाया जैसे नारे ठाठे मारते हुए समंदर की कुछ बूंदें जाबिर इब्ने हय्यान और हेशाम इब्ने हकम ने इंसानियत के गले में कुछ बूंदें टपका दिए थे।
कितने अजीब सूखी सोच और कोढ़ दिमाग़ के लोग थे जिन्होंने इन महान हस्तियों के मज़ारों को ढ़हा दिया जिनसे किसी विशेष धर्म को नहीं बल्कि पूरी इंसानियत ने फ़ायदा उठाया और आज तक फ़ायदा उठा रही है।
बक़ी केवल एक क़ब्रिस्तान नहीं था:
बक़ी केवल एक क़ब्रिस्तान नहीं था जो वीरान हो गया बल्कि एक ऐतिहासिक दस्तावेज़ को मिटाने की कोशिश कर के कुछ लोगों ने अपनी बर्बादी का इतिहास लिखा था और आज मज़हबी और तकफ़ीरियत के जुनून में बे गुनाहों को मार कर जन्नत में जाने की आरज़ू इसका जीता जागता सबूत है, वहाबियत और तकफ़ीरियत ने केवल यह कुछ मज़ारों को नहीं गिराया बल्कि इंसानियत और शराफ़त के ताज को अपने पैरों तले रौंद कर दुनिया को बताया था कि पहचानो हम कौन हैं? और हमारा संबंध किस विचारधारा से है?
जिस तरह शैतान होने के बावजूद रहमान के सामने नाबूद है वैसे ही यह तकफ़ीरियत और वहाबियत के पुतले अहलेबैत अ.स. और हज़रत ज़हरा स.अ. द्वारा दरबारे ख़िलाफ़त में दिए गए ख़ुत्बे के सामने नाबूद हैं, इनका वजूद वैसे ही है जैसे शैतान का, यह हर उस जगह गरजते मिलेंगे जहां शैतान गरजता है जहां हवा और हवस के मेले हों जहां नफ़सानी ख़्वाहिशों के सजे बाज़ार हों, जबकि यह हर उस जगह से भागते मिलेंगे जहां से शैतान भागता है, जहां बंदगी की बात हो या जहां तौहीद की बात हो, और जहां सजदों की पासदारी की बात होगी जहां मुशरिकों से दूरी की बात होगी वहां से दुम दबाए भागते नज़र आएंगे लेकिन जहां मुसलमानों के क़त्लेआम की बात होगी, मासूम बच्चों पर बारूद की बारिश की बात होगी, निहत्थे लोगों को ख़ून में नहलाने की बात होगी तो इनके क़दमों के निशान नज़र आएंगे।
यक़ीन न आए तो देखें शैतान कहां हंस और गरज रहा है? कहीं यमन वालों के सरों पर हज़ारों टन बारूद बरसा के, कहीं इंसान की खोपड़ियों से फ़ुटबाल खेल के, कहीं इराक़ की ज़मीन को लहूलुहान कर के, कहीं सीरिया को वीरान कर के, कहीं नाइजीरिया में इंसाफ़ और अदालत का गला घोंट के, कहीं सऊदी में शैख़ बाक़िर अल-निम्र का सर काट के, कहीं पाकिस्तान और अफ़्ग़निस्तान की ज़मीनों को ख़ून से लाल कर के, कहीं मासूम फूलों को मसल के, कहीं नन्हीं कलियों को कुचल के, कहीं धमाकों के बीच, कहीं शोलों के बीच, कहीं लाश के बिखरे टुकड़ों के बीच, कहीं कटे हुए सरों के बीच, कहीं मस्जिदों में ख़ून की होली खेलते हुए, कहीं इमामबाड़ों में ख़ून में सने हुए हाथों के साथ क़हक़हा लगाते हुए, हाल ही मेह अफ़ग़ानिस्तान में बच्चों के हॉस्पिटल पर जो हमला हुआ उसे आप क्या नाम देंगे, क्या वह लोग इंसान थे जिन्होंने मासूम कलियों के खिलने से पहले ही मसल दिया या वह शैतान के चेले थे जो मज़हब के नाम पर इंसानियत का क़त्ल कर रहे हैं? इंसानियत शर्मिंदा थी और शैतान के क़हक़हों को साफ़ सुना जा सकता था।
यक़ीनन जब कभी भी अल्लाहो अकबर के नारों की गूंज में मशीन गन और रॉकेट लांचर से मौत बरसती है तो शैतान डुगडुगी बजा कर अपने चेलों का हौसला बढ़ाता है उसके क़हक़हे बढ़ते हैं, उसकी टोलियां आबाद होती हैं, कहीं यह ISIS का हाथ थामे दिखाई देता है कहीं अल-नुसरह का, कहीं अल-क़ायदा और तालिबान तो कहीं बोकोहराम, अल-अहरार और जुंदुल्लाह का, सबकी आवाज़ें एक जैसी, सबके रंग एक जैसे, सबका अंदाज़ एक जैसा, यह नफ़रत की आग में दहकते आग के गोले, यह बर्दाश्त न कर पाने के धुवें में काले सियाह साए, शैतान के कारिंदे और इबलीस के साथी नहीं तो कौन हैं? जिन्होंने इंसानियत पर वह ज़ुल्म ढ़हाया कि बस..... वह सितम ढहाए कि अल-अमान.... यह जिधर निकले आग और दहशत का माहौल लेकर निकले जिधर पहुंचे हैवानियत का भांगड़ा करते पहुंचे दरिंदगी का नाच नाचते पहुचे।

वहाबियत की तरफ़ से क़त्ल व ग़ारत मुस्लिम उम्मत की ग़फ़लत का नतीजा:

शक नहीं कि अगर इस्लामी उम्मत बेदार होती तो कभी यह लोग दुनिया में इतना फ़साद नहीं फैला सकते थे, अगर बक़ी की वीरानी पर पूरी मुस्लिम उम्मत एक साथ खड़ी हो गई होती तो इस्लामी तालीमात की धज्जियां उड़ाने की हिम्मत इस टोले में न होती जिसके लिए पैग़म्बर स.अ. बहुत पहले बता गए थे: जैसाकि अहले सुन्नत की मोतबर किताबों में पैग़म्बर स.अ. से ऐसी रिवायतें नक़्ल की गई हैं जिसमें हुज़ूर ने वहाबी फ़िर्क़े के ज़ाहिर होने की तरफ़ इशारा फ़रमाया था: जैसाकि सही बुख़ारी में अब्दुल्लाह इब्ने उमर से नक़्ल किया गया है कि वह कहते हैं: पैग़म्बर स.अ. ने फ़रमाया: ऎ अल्लाह हमारे मुल्क शाम में हमें बरकत दे, हमारे मुल्क यमन में हमें बरकत दे, सहाबा ने कहा कि और हमारे नज्द में? आपने फिर फ़रमाया: ऐ अल्लाह हमें हमारे शाम में बरकत दे, हमें हमारे यमन में बरकत दे, सहाबा ने कहा और हमारे नज्द में? मेरा ख़्याल है कि आपने तीसरी बार फ़रमाया: वहां ज़लज़ले और फ़ितने ईजाद होंगे और वहीं से शैतान की सींग बरामद होगी...., अहले सुन्नत के बहुत बड़े आलिम ऐनी जिन्होंने सही बुख़ारी की शरह लिखी है इस हदीस के नीचे लिखते हैं: शैतान की सींग से मुराद उसका गिरोह और टोला है उसी तरह बुख़ारी ने अपनी सही में अबू सईद ख़ुदरी के के वास्ते से पैग़म्बर स.अ. का फ़रमान नक़्ल किया है कि आपने फ़रमाया: पूर्वी क्षेत्र से कुछ लोग ख़ुरूज करेंगे जो क़ुरआन की तिलावत तो करेंगे लेकिन क़ुरआन उनके हल्क़ से नहीं उतरेगा, यह लोग दीन से इसी तरह से निकल जाएंगे जिस तरह तीर कमान से निकल जाता है और फिर दीन की तरफ़ पलट कर नहीं आएंगे जिस तरह तीर पलट कर नहीं आता, पूछा गया कि उनकी निशानी क्या होगी? फ़रमाया: वह अपने सर के बाल साफ़ करते होंगे।
मक्का के पूर्व मुफ़्ती ज़ैनी देहलान इस हदीस की तरफ़ इशारा करते हुए लिखते हैं: पैग़म्बर स.अ. के फ़रमान में इस गिरोह की खुली हुई निशानी सर मुंडाना है और यह वहाबी टोले की तरफ़ इशारा है, इसलिए कि यही फ़िरक़ा है जो अपनी पैरवी करने वालों को सर मुंडाने का हुक्म देता है और यह सिफ़त वहाबियों से पहले ख़्वारिज या बिदअत ईजाद करने वालों में से किसी एक के अंदर नहीं देखी गई है।
इसके अलावा मुफ़्ती सैयद अब्दुल रहमान अहदल से नक़्ल करते हुए वह साफ़ तौर पर लिखते हैं: ज़ुबैद नामी जगह के मुफ़्ती सैयद अब्दुल रहमान अहदल कहा करते कि वहाबियों के अक़ाएद की रद्द के लिए किताबें लिखने की ज़रूरत नहीं बल्कि पैग़म्बर स.अ. की यही हदीस जिसमें इस फ़िरक़े की पहचान (सर मुंडाना) बयान की गई है उनके अक़ीदे के बातिल करने के लिए काफ़ी है इसलिए कि वहाबियों के अलावा किसी भी बिदअत फैलाने वाले फ़िरक़े में यह सिफ़त नहीं पाई जाती, क्या अफ़सोस का मक़ाम नहीं है कि इतनी साफ़ निशानियों के बावजूद जिसे पैग़म्बर स.अ. ने भी बयान किया और अहले सुन्नत के उलमा ने भी उसको वहाबियों पर एप्लिकेबल किया उसके बावजूद किसी ने इस फ़िरक़े पर लगाम कसने की कोशिश नहीं की बल्कि सऊदी रियालों की झंकारों में क़लम चले तो इस फ़िरक़े की हिमायत और समर्थन में ज़ुबान खुली और इस फ़िरक़े को सच्चा इस्लामी पैरोकार साबित करने में, जिसका नतीजा सामने है, कहीं वीरान बक़ी की शक्ल में कहीं खौफ़नाक साये की सूरत में, कहीं स्कूल के मासूम बच्चों की चीख़ की शक्ल में, कहीं बच्चों के हॉस्पिटल में मजबूर माओं की फ़रियाद की सूरत में।
किसी ज़माने में कहीं पढ़ा था शायद कार्ल मार्क्स ने अपनी मशहूर किताब "सरमाया" में लिखा था " माल व ज़र अगर दुनिया में अपने एक गाल पर ख़ून का धब्बा लेकर आता है तो सरमाया, साम्राज्यवाद की शक्ल में सर से पैर तक, अपने हर एक अंग से ख़ून टपकाते हुए नमूदार होता है"
बात सही है साम्राज्यवाद का पूरा इतिहास ज़ुल्म, दूसरे देशों पर क़ब्ज़ा, लूटमार और क़त्लेआम से भरा पड़ा है, लेकिन आज जंग का मैदान बदल चुका है, साम्राज्यवाद अपने मोहरों को क़त्ल व ग़ारत का नंगा नाच नचवाने के लिए जो कुछ उनकी ज़रूरत है उसे पूरा भी कर रहा है और फिर गोलमेज़ कॉन्फ्रेंस में दुनिया में अमन और अमान की बातें भी, आज पूंजीवाद का मुखौटा ज़रूर दुनिया की सुपर पावर ने पहना हुआ है लेकिन हक़ीक़त में इस पूंजीवाद सिस्टम ने जानबूझ कर शरिया के सिस्टम का मुखौटा लगा कर शहंशाही की शक्ल में सऊदी के हवाला किया हुआ है जिसकी तारीख़ ही ख़ून ख़राबे से भरी है वह आज अल्लाह के हरम में अमन का रखवाला है जिसने अपनी नीचता से मस्जिदुल नबी और अल्लाह के घर को इंसानी लाशों से पाट दिया है, जिसने क़ुरआन की तालीमात का गला घोंटने में कभी देर नहीं करते वह क़ुरआन को पूरी दुनिया में बांट कर इलाही पैग़ाम फैलाने का ठेकेदार बना घूम रहा है।
कार्ल मार्क्स के मुताबिक़ अगर पैसा इंसान के गाल पर ख़ून का धब्बा है और माल व दौलत बदन से टपकता लहू है तो आज कहा जा सकता है कि जो पूंजीवादी सोच नहीं कर सकी वह सऊदी रियालों की झनकार कर रही है और तकफ़ीरियत और वहाबियत, पूंजीवाद सिस्टम के साथ अपने पूरे ऐतिहासिक ज़ुल्म के तजुर्बों के साए में इंसानियत के सीने पर बैठी उसका गला रेत रही है और उसकी उंगली के पोर पोर से लहू टपक रहा है और कोई उसके ख़िलाफ़ बोले तो क्या बोले?......
इंसानी हुक़ूक़ और इंसानियत के नारों को बुलंद करने वाले संगठन उसके ख़ूनी नाच के साथ ख़ुद भी शैतान के साथ डुगडुगी बजा बजा कर महफ़ूज़ हो रहे हैं कि कल तो शाम के हाकिम का बाप अज़ान से मुहम्मदु-र-रसूलुल्लाह का नाम नहीं निकाल सका लेकिन आज हमारी डुगडुगी की डग डग डग और तकफ़ीरियत के नंगे नाच में ज़रूर मुहम्मदु-र-रसूलुल्लाह का नाम आतंकवाद और वीरानी फैलाने का ज़िम्मेदार बन जाएगा, जो नारा अल्लाहो अकबर और मुहम्मदु-र-रसूलुल्लाह जानों को बचाने के लिए बुलंद होता था वह जब जानों को लेने के लिए बुलंद होगा तो कोई ख़ुश हो न हो शाम की हाकिम के बाप की तमन्ना ज़रूर मचल मचल कर आला हुबल आला हुबल के नारे लगा रही होगी।
ऐसे में ज़रूरी है कि हम दुनिया को पहचानवाएं कि यह कौन लोग हैं और इंसानियत के लिए कितने ख़तरनाक साबित हो सकते हैं? उनकी काली करतूत तो देखें जो अंतरराष्ट्रीय साम्राज्यवाद को बचाने में उस तकफ़ीरी टोले ने अंजाम दिए, बक़ी तो केवल एक क़ब्रिस्तान था जिससे मुसलमानों को दिली लगाव था जो इंसानी वैल्लूज़ को बचाने वाले इंसानी जिस्म में ढले इलाही नूर की पाकीज़ा क़ब्रों को अपने दिल से लगाए थे, इस टोले ने केवल उसे ही नहीं ढ़हाया बल्कि उसके साथ साथ और भी ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और कई यादगार चीज़ों को तबाह कर दिया, यहां तक इस्लाम का मरकज़ समझा जाने वाला शहर मदीना को भी नहीं छोड़ा, जैसाकि तारीख़ बताती है कि वहाबियों ने मक्का पर क़ब्ज़ा करने के बाद मदीना का रुख़ किया, शहर की घेराबंदी की और शहर की हिफ़ाज़त करने वालों से जंग के बाद उस पर क़ब्ज़ा कर लिया, जन्नतुल बक़ी में में इमामों की क़ब्रें और इसी तरह बाक़ी क़ब्रों जैसे हज़रत इब्राहीम (पैग़म्बर के बेटे) उनकी बीवियों की क़ब्रें, हज़रत अब्बास की मां उम्मुल बनीन की क़ब्र पैग़म्बर स.अ. के वालिद की क़ब्र पर मौजूद गुम्बद और सारे असहाब और ताबेईन की सारी की सारी क़ब्रों को ढ़हा दिया और इस फ़ौलादी ज़रीह को भी उखाड़ दिया जिसे इस्फ़हान ईरान से ख़ास कर बनवा कर मदीना लाया गया था और जिसे इमाम हसन अ.स., इमाम सज्जाद अ.स., इमाम बाक़िर अ.स. और इमाम सादिक़ अ.स. की क़ब्रों पर लगाया गया था, इस टोले ने न केवल उस ज़रीह को वहां से उखाड़ा बल्कि उसे अपने साथ ले गए और पैग़म्बर स.अ. के चचा जनाब अब्बास, और इमाम अली अ.स. की वालिदा फ़ातिमा बिनते असद की क़ब्रों को भी वीरान कर दिया जो चारों इमामों के साथ एक ही गुम्बद के नीचे थीं।
इसी तरह मदीने में इमाम हसन अ.स. और इमाम हुसैन अ.स. के विलादत की जगह, बद्र के शहीदों की क़ब्रें, और इमाम अली अ.स. द्वारा हज़रत ज़हरा स.अ. के लिए मदीने में बनवाया हुआ घर भी गिरा दिया।
कुछ लोग यह सोंचते हैं कि वहाबियों ने केवल शिया आबादी के इलाक़ों को ही तबाह किया जबकि हेजाज़ और सीरिया के इलाक़ों को देखने के बाद यह बात भी साफ़ हो गई कि अहले सुन्नत आबादी वाले इलाक़े भी इनके हमलों से बच नहीं सके।
मक्का के मुफ़्ती ज़ैनी देहलान लिखते हैं:
1217 हिजरी में जब वहाबियों ने ताएफ़ पर क़ब्ज़ा किया तो छोटे बड़े, सरदार मज़दूर सबको क़त्ल कर डाला, बूढ़े लोगों के अलावा कोई उनके हाथों से बच नहीं सका, यहां तक कि माओं की गोद से उनके दूध पीते बच्चों को छीन कर उनके सर को धड़ से अलग कर दिया, लोगों का माल लूटा, औरतों को क़ैदी बनाया..... इनके ज़ुल्म की दास्तान लिखने के लिए किताबों की ज़रूरत है, कल उन्होंने मदीना, हेजाज़ और ताएफ़ नहीं छोड़ा आज यमन की तबाही के पीछे हाथ धो कर पड़े हैं, ऐसे में जन्नतुल बक़ी के ढहाए जाने के सिलसिले में होने वाले प्रोग्रामों में उनके ज़ुल्म से पर्दा उठाना हमारा दीनी ही नहीं इंसानी फ़रीज़ा है, वह दिन दूर नहीं जब अंतरराष्ट्रीय साम्राज्यवाद के साथ इन ज़ालिमों को भी अपने किए का हिसाब देना होगा।

मौलाना सैयद नजीबुल हसन ज़ैदी
۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔۔

लाइक कीजिए
2
फॉलो अस
नवीनतम