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सुलहे इमाम हसन के चौदह सौ साल

इमाम हसन अ.स. की ऐतिहासिक सुलह ने इस्लाम की हिफ़ाज़त की ख़ातिर जो अहम भूमिका निभाई है उसे देख हर अक़्लमंद और मंझा हुआ सियासी इंसान भी आज तक दांतों के नीचे उंगली दबाए हुए है, हालांकि हंगामों की आदी दुनिया ने इस ख़ामोश लेकिन ऐतिहासिक कारनामे को उसका वह हक़ बिल्कुल नहीं दिया जो उसे मिलना चाहिए था, और इमाम हसन अ.स. का यह अज़ीम कारनामा भी आपकी अज़ीम शख़्सियत की तरह मज़लूमियत की भेंट चढ़ गया।

विलायत पोर्टल : दुनिया जानती है कि पैग़म्बर स.अ. के पाक व पाकीज़ा गुलिस्तान में जो फ़ज़ीलत और करामत के फूल हैं उनमें हर एक अपनी मिसाल ख़ुद ही है, उस इसमत के घराने का हर शख़्स एक दूसरे को मुकम्मल करने की वजह होने के बावजूद मर्तबे और अदब का ख़्याल रखते हुए अपने दौर का सबसे कामिल और बेहतरीन इंसान है और सबको अपने ओहदे और हालात के हिसाब से अपने कमाल को ज़ाहिर करने का पूरा पूरा हक़ है।
यह पूरे का पूरा फ़ज़ीलत का गुलिस्तान हम इसका ज़िक्र तो क्या उसके बारे में तसव्वुर भी नहीं कर सकते।
जिनमें से इस आर्टिकल में सुलह और बहादुरी की अज़ीम मिसाल इमाम हसन अ.स. का ज़िक्र करना मक़सद है, जो बहुत सारी सिफ़ात और कमालात में अकेले होने के साथ साथ अपनी अनोखी ख़िदमात को लेकर भी बे मिसाल हैं, जिनमें इबादत, इल्म, बहादुरी, सख़ावत, अदब, अख़लाक़ और भी बहुत सारी सिफ़ात शामिल हैं।
संक्षेप में इतना समझ लीजिए कि अकेले आपकी शख़्सियत में वह सारी अच्छाईयां जमा थीं जो सारे नेक लोगों में थीं।
और आपके कारनामे में सबसे अनोखा और ज़्यादा जिसने लोगों का ध्यान अपनी तरफ़ खींचा वह आपका सुलह करना है।
पैग़म्बर स.अ. के दोनों शहज़ादों इमाम हसन अ.स. और इमाम हुसैन अ.स. ने इस्लाम की कश्ती को निजात दिलाने के लिए दो अलग अलग बेहतरीन और नुमायां काम अंजाम दिए हैं जिनके बिना असली इस्लाम तो बहुत दूर शायद उसके नाम भी बाक़ी रहना ना मुमकिन नहीं होता।
पैग़म्बर स.अ. ने क़ुर्आनी आयतों में शहज़ादों के फ़ज़ाएल और कमालात की तरफ़ इशारा करने के साथ साथ ख़ुद अपने अक़वाल और हदीसों से इस्लामी उम्मत में उनकी शान और अज़मत को उजागर किया था और दोनों के किरदार की बुलंदी गारंटी और ज़मानत के लिए वह मशहूर हदीस इरशाद फ़रमा दी थी जिसमें सुलह और जंग दोनों पर इसमत का पहरा "हाज़ाने इमामान क़ामा अव क़आदा" यह दोनों इमाम हैं चाहे क़ेयाम करें चाहे ख़ामोश बैठ जाएं, यानी आप बताना चाहते थे कि इस्लाम के वक़ार और इज़्ज़त की ख़ातिर उनका क़ेयाम और उनकी सुलह दोनों ही उनकी इमामत का हिस्सा हैं और दोनों ही के ज़रिए इस्लाम की हिफ़ाज़त का बंदोबस्त होना है।
यही वजह है कि इमाम अली अ.स. के बाद जब शाम की हुकूमत ने अपने काले कारनामों को अंजाम देने के लिए इस्लाम की ख़ूबसूरत नक़ाब ओढ़ना चाही तो पैग़म्बर स.अ. के इस बड़े शहज़ादे यानी इमाम हसन अ.स. ने अपनी सुलह द्वारा उसके चेहरे पर पड़ी नक़ाब को कुछ इस तरह नोच फेंका कि शाम की हुकूमत सरेआम ज़लील हो गई और फिर उसके पास मुंह छिपाने का कोई मौक़ा नहीं रह गया, यही वजह है कि फिर इमाम हसन अ.स. के वारिस यानी इमाम हुसैन अ.स. के सामने माविया के वारिस यज़ीद को उसकी सभी बर्बादियों और ज़िल्लत के साथ खुल कर सामने ज़ाहिर कर दिया।
इमाम हसन अ.स. की ऐतिहासिक सुलह ने इस्लाम की हिफ़ाज़त की ख़ातिर जो अहम भूमिका निभाई है उसे देख हर अक़्लमंद और मंझा हुआ सियासी इंसान भी आज तक दांतों के नीचे उंगली दबाए हुए है, हालांकि हंगामों की आदी दुनिया ने इस ख़ामोश लेकिन ऐतिहासिक कारनामे को उसका वह हक़ बिल्कुल नहीं दिया जो उसे मिलना चाहिए था, और इमाम हसन अ.स. का यह अज़ीम कारनामा भी आपकी अज़ीम शख़्सियत की तरह मज़लूमियत की भेंट चढ़ गया।
मौजूदा साल 1441 हिजरी इस अज़ीम कारनामे को 1400 साल पूरे होने का साल है, होना तो यह चाहिए था कि पूरा साल इस अज़ीम सुलह के विषय पर बड़े बड़े सेमिनार होते और उसकी अज़मत, फ़ायदे और ज़रूरत पर इल्मी विश्लेषण करते हुए किताबें लिखी जातीं और इसी तरह अनेक आर्टिकल छापे जाते ताकि दुनिया वालों के लिए यह साफ़ हो जाता कि इस्लाम दहशत और आतंक का मज़हब नहीं बल्कि आतंक के मुंह पर ज़ोरदार तमांचा मारने का मज़हब है।
मगर अफ़सोस कि एक इस अज़ीम सुलह के कारनामे से हमारी ग़फ़लत और फिर शायद उसी ग़फ़लत की वजह से सज़ा के तौर पर दुनिया की ताला बंदी ने हमें यह मौक़ा नहीं दिया कि हम इस अज़ीम कारनामे की खुली हुई जीत का जश्न मना सकें।
आइए इस फ़ज़ीलत के मालिक की विलादत के मौक़े पर आपकी बारगाह में अपनी इस कमी पर माफ़ी मांगें और साथ ही विनती करें कि मौला अपने दस्ते करम से परवरदि‍गार की बारगाह से इस ख़ौफ़नाक बीमारी के चलते रहम करते हुए इस वबा और बीमारी से महफ़ूज़ रखे और हमें हमारी ना क़दरी की और सज़ा न दे।।


तर्जुमा: सैयद मोहम्मद मेहदी

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