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मुश्किलों के मुक़ाबले में इल्म और ईमान का किरदार

इस तरह कि ईमान इंसान को रूहानी और नफ़्सानी परेशानियों के समय उसे अंदर से सुकून और चैन देता है और इल्म इंसान को सैलाब, बीमारियों, ज़लज़ला और दूसरी आपदा के मुक़ाबले मज़बूत बना कर ताक़त और क़ुदरत देकर चैन और सुकून देता है और तंहाई के एहसास से पैदा होने वाली उलझनें ज़िंदगी को बे मक़सद बना देती हैं

विलायत पोर्टल : ज़िंदगी में पेश आने वाली अनेक तरह की मुश्किलें, बीमारियां, उलझनें, बेचैनियां और आसमानी और ज़मीनी आपदा जैसे सैलाब, ज़लज़ला, तूफ़ान और आंधियां और वह मौक़े जहां इंसान ख़ुद को अकेला पाता है और सामने किसी मदद करने वाले को नहीं पाता है तो ऐसे समय में इल्म और ईमान क्या किरदार निभाते हैं?
इल्म यानी इंसानी उलूम जैसे साइंस, टेक्नॉलजी, मेडिकल साइंस वग़ैरह, और ईमान यानी दीन, मज़हब और और अल्लाह पर यक़ीन।
जवाब: इल्म भी इंसान को सुकून और चैन देता है और ईमान भी उसे अमन शांति और सुकून देता है।
यानी साइंस, टेक्नॉलजी और इंसानी तजुर्बे में आए हुए दूसरे उलूम बाहर की दुनिया से इंसान को जोड़ते हुए उससे मुक़ाबला करने के लिए तैयार करते हैं और ईमान इंसान को ख़ुद अपने बातिन की दुनिया से जोड़ता है और अपने बातिन से संबंध को मज़बूत करता है।
लेकिन कैसे?
इस तरह कि ईमान इंसान को रूहानी और नफ़्सानी परेशानियों के समय उसे अंदर से सुकून और चैन देता है और इल्म इंसान को सैलाब, बीमारियों, ज़लज़ला और दूसरी आपदा के मुक़ाबले मज़बूत बना कर ताक़त और क़ुदरत देकर चैन और सुकून देता है और तंहाई के एहसास से पैदा होने वाली उलझनें ज़िंदगी को बे मक़सद बना देती हैं जैसे ख़्याल अल्लाह पर यक़ीन और मज़हब की तालीमात पर भरोसा रखने से ख़त्म हो जाता है और ईमान की वजह से बेचैन रूह को सुकून मिलता है।
इसलिए इंसान मरते दम तक इल्म और ईमान दोनों का मोहताज है बल्कि वह इल्म अधूरा है जो जो इंसान को मंज़िल तक न पहुंचा सके।
नतीजा यह हुआ कि इल्म इंसान को बाहर की दुनिया से मुक़ाबले की ताक़त देता है और ईमान उसे उसकी ज़ात जोड़ कर रूह की बेचैनी और परेशानी को दूर करने की बे मिसाल ताक़त और क़ुदरत अता करता है।
 इसीलिए आज का मुसलमान न ही ख़ुद को इल्म से अलग कर सकता है और न ही ईमान से, क्योंकि दोनों ही की इंसान के वुजूद को ज़रूरत है।
और यह ज़रूरत किसी एक ख़ास दौर या ज़माने की नहीं है बल्कि यह दोनों ज़रूरतें हर दौर में मुसलमानों के लिए ज़रूरी है इसलिए दुनिया के सारे मुसलमानों को इल्म और उसके साथ साथ ईमान को मज़बूत करना होगा ताकि उसके प्रभाव से अपने, समाज के और देश के सभी लोगों की सेवा हो सके।

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