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औरत और घरेलू कामकाज, जानिए क्या कहता है इस्लाम

इस्लामी दृष्टिकोण से औरत और मर्द परिवार में एक दूसरे के सहायक व मददगार हैं और औरत व मर्द विवाहित जीवन के माध्यम से दुनिया व आख़ेरत में कामयाबी और सफलता हासिल करने की कोशिश करते हैं।

विलायत पोर्टलः इस्लामी दृष्टिकोण से औरत और मर्द परिवार में एक दूसरे के सहायक व मददगार हैं और औरत व मर्द विवाहित जीवन के माध्यम से दुनिया व आख़ेरत में कामयाबी और सफलता हासिल करने की कोशिश करते हैं। 

अतः परिवार, उनके लिए मुक़ाबले और कम्पटीशन का नहीं बल्कि इंसानों में आपसी सहयोग और क्षमताओं के उजागर होने के लिए हालात तैयार करने का मैदान है। वह चीज़ जो इस्लामी परिवारों पर हावी है प्यार और आपसी एकता व सद्भावना की भावना है नाकि मुक़ाबला और कम्पटीशन। 

स्त्री और मर्द को एक-दूसरे के साथ जीवन-यापन करना चाहिए, मिलजुल कर काम करना चाहिए। यह समस्या कामों और जिम्मेदारियों के आपस में बाटने द्वारा आसान बन जाता है और नतीजे में सकारात्मक भावनाओं और उमंगों के उभरने का कारण बनता है तथा संयुक्त जीवन में सफलता की सीढ़ियों पर चढ़ने के लिए हालात को अनुकूल बनाता है।

शादी के बाद, औरत व मर्द का पहला कदम कामकाज को आपस में बाटना है। इस्लाम ने औरतों और मर्दों के शारीरिक और आध्यात्मिक अंतर के दृष्टिगत और परिवार में आपसी सहयोग के हालात को अनुकूल बनाने के उद्देश्य से औरतों और मर्दों के लिए अलग-अलग भूमिकाएं पेश की हैं, जिस पर परिवार द्वारा अगर ठीक से अमल किया जाता है तो आराम और सुकून की ज़िंदगी नसीब होती है। शारीरिक व आध्यात्मिक रूप से मर्दों व औरतों की विशेषताएं भिन्न हैं इसलिए उनकी जिम्मेदारियां भी अलग अलग हैं। मर्द घर का मुखिया और औरत घर की प्रबंधक है। जैसे चार पिलर वाला घर, जो उसकी छत को मजबूत बनाता है, छत का काम बारिश और अन्य प्राकृतिक आपदाओं की रोकथाम करना है और पिलर का काम छत को सुरक्षित रखना है।

इस्लामी दृष्टिकोण से मर्द छत और औरत स्तंभ की तरह है। चूंकि मर्द शारीरिक व आत्मिक रूप से शक्तिशाली है, उसे घर से बाहर की समस्याओं का सामना करना चाहिए। हर प्रकार की समस्या जिससे परिवार वालों का सामना हो मर्द को उसके मुकाबले में डट जाना चाहिए और अगर मर्द न हो या हो लेकिन नाकारा हो तो यही समस्याएं और आपदाएं घर में घुस कर परिवार वालों को नुक़सान पहुंचाएंगी। 

गौरतलब है कि दोनों में कुछ ऐसी विशेषताएं हैं जो सामान्य हैं और कुछ ऐसी हैं जो दोनों से विशेष हैं इसलिए यह कमाल नहीं है कि औरत, मर्द की भूमिका अदा करे और मर्द औरतों का रूप धारण कर ले।

वैवाहिक जीवन में कामकाज का विभाजन, जीवन का एक नियम और घरेलू ज़िंदगी के संतुलन का कारण है। पारिवारिक ज़िंदगी में प्रत्येक मर्द और औरत के लिए कुछ जिम्मेदारियों को संभालना आवश्यक है। इस काम के वितरण में, न्याय और ज़रूरत की मांग यह है कि जिस काम के लिए जिस्म व शारीरिक शक्ति की अधिक आवश्यकता होती है, उन्हें मर्दों को और जिन कामों में स्नेह, प्रेम और मेहरबानी की ज़्यादा ज़रूरत है, उन्हें औरतों को अपनाना चाहिए। इसी कारण इस्लाम में माँ की भूमिका औरतों से और रोज़ी रोटी की खोज और परिश्रम मर्दों की ज़िम्मेदारी है। 

लेकिन घरेलू कामों को कैसे अंजाम दिया जाए? क्या इस्लाम ने उसे औरतों की ज़िम्मेदारी माना है या मर्दों की?

इस्लामी दृष्टिकोण से नैतिक और भावनात्मक विशेषता के कारण औरत घरेलू काम करने के लिए ज़्यादा उचित है। लेकिन इस्लामी कानून के अनुसार, घर के कामों को औरत के सिर पर थोपा नहीं जा सकता है और इस तरह के कामों को अंजाम देने के लिए औरतों को स्वतंत्रता दी गई है। घर में एक औरत की जिम्मेदारी केवल पति और बच्चों की देखरेख और अपने पति के प्रति वफादारी है। लेकिन स्तनपान, बर्तन धोना, कपड़े धोना और झाड़ू पोछा औरत की जिम्मेदारी नहीं है। इमाम खुमैनी र.ह इस संबंध में कहते हैं "पति को यह अधिकार नहीं कि औरत को अपनी सेवा और घर के कामकाज के लिए मजबूर करे। "यद्यपि इस्लाम ने औरत को घर के कामकाज के लिए मजबूर नहीं किया है लेकिन नैतिकता के आधार पर औरत से अपील ज़रूर की है कि घर के कामों को करने में कोताही न करे और उसे एक तरह की इबादत समझ कर अंजाम दे। क्योंकि घरेलू जीवन में संतुलन बनाए रखने के लिए कामकाज में आपसी तालमेल ज़रूरी है और इसी आधार पर मर्दों के लिए बाहर के कठिन कामों की ज़िम्मेदरी सौंपी है। 

पैग़म्बरे इस्लाम स.अ, औरतों को संबोधित करते हए कहते हैंहर वह औरत जो पति के घर में कोई काम करती है और उसका उद्देश्य घर के कामकाज में सुधार करना होता है, अल्लाह तआला उस पर कृपादृष्टि बनाए रखता है और जिसपर अल्लाह की कृपादृष्टि हो वह जहन्नम के दण्ड से सुरक्षित है।

पैग़म्बरों और इमामों के चरित्र के प्रति सही जानकारी, विशेष रूप से काम के वितरण में और घर के मामलों में औरतों और मर्दों की भागीदारी, परिवार की मज़बूती व स्थिरता के लिए आदर्श बन सकती है। जैसा कि किताबों में बयान किया गया है कि एक दिन हज़रत अली अ.स. और हज़रत फातिमा ज़हरा स.अ ने पैग़म्बरे इस्लाम स.अ से उनके कामों के वितरण के बारे में सवाल किया तो पैग़म्बर ने इस तरह से फैसला किया कि घर का काम फ़ातिमा और बाहर के काम अली अंजाम दें। हज़रत फ़ातिमा स. बहुत ख़ुश हुईं और आपने कहा: मैं इस विभाजन को लेकर इतनी खुश हूं कि अल्लाह के रसूल ने मुझे उन चीजों का ज़िम्मेदारी सोंपी है जो घर के भीतर के हैं और उन कामों से दूर रखा है जिसमें मर्दों के बीच आना जाना और उनसे बातचीत करना पड़ता है। वास्तव में इस्लाम ने परिवार में मर्दों और औरतों के कुछ कर्तव्य और जिम्मेदारियां बयान की हैं और यह जिम्मेदारियों का यह विभाजन किसी के स्थान को ऊंचा या नीचा दिखाने के लिए नहीं बल्कि उनके शारीरिक व आत्मिक अंतर के अनुसार है।

दूसरी ओर घर का सही संचालन अपने आप में एक कौशल और पुण्य का काम है। इस्लाम ने घरेलू कामकाज के लिए औरत को मजबूर नहीं किया है लेकिन अगर औरत अपनी इच्छानुसार घर के कामों को अंजाम दे तो बदले में उसे पुन्य और इनाम भी मिलेगा।

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