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राफ़ेज़ा की परिभाषा।

शियों को राफ़िज़ी कहने का कारण यह था कि शिया हज़रत अली (अ.) से स्नेह अभिव्यक्ति करते थे आपकी प्रमुखता व श्रेष्ठता का उल्लेख करते और आपको दूसरों से उत्तम व श्रेष्ठ समझते थे हालांकि अमवी शासकों की दृष्टि में हज़रत अली (अ.) से स्नेह अभिव्यक्ति और आपकी प्रमुखता व श्रेष्ठता का उल्लेख, अपराध था......

विलायत पोर्टलः मिलल व नहेल और अक़ाएद व तफ़सीर आदि की किताबों में कभी कभी शियों के लिए राफ़ेज़ा शब्द का प्रयोग किया जाता है अतः इस परिभाषा के संदर्भ में कुछ महत्वपूर्ण बातों की व्याख्या आवश्यक है।
शिया की तरह राफ़ेज़ा की परिभाषा के भी विभिन्न अर्थ हैं । इमाम शाफ़ेई की जिन पंक्तियों का वर्णन हमने पहले किया है उनमें हज़रत अली (अ.) की श्रेष्ठता पर विश्वास तथा आप और आपके परिवार से स्नेह अभिव्यक्ति के अर्थ में शिया को ही राफ़ेज़ा कहा गया है। कभी राफ़ेज़ा से मुराद शिया इसना अशरी लिया जाता है जैसा कि अश्अरी ने राफ़ेज़ा को इमामिया का समानार्थ बताया है और उसकी व्याख्या करते हुए कहा है कि राफ़ेज़ा का मतलब नस द्वारा (अर्थात अल्लाह के आदेशानुसार पैग़म्बर द्वारा हज़रत अली अ. की कथित एंव लिखित रूप से ख़िलाफ़त के लिए नियुक्ति) हज़रत अली (अ.) की ख़िलाफ़त पर विश्वास रखना।  
अब्दुल क़ाहिर बग़दादी ने एक क़दम आगे बढ़ाते हुए ग़ालियों को भी राफ़िज़ीयों का एक समुदाय बताया है। वास्तव में अब्दुल क़ाहिर ने शिया के स्थान पर राफ़ेज़ा, शब्द का ही प्रयोग किया है और उनके तीन गुट, ग़ुलाते  कीसानिया, इमामिया और ज़ैदिया बयान किए हैं ।
कुछ हदीसों और इतिहासिक स्रोंतों से यह पता चलता है कि बनी उमय्या के युग में अहलेबैत के दुश्मन, शियों के प्रति अपनी दुश्मनी के अभिव्यक्ति के लिए उन्हें राफ़िज़ी कहा करते थे और राफ़िज़ी होने को अक्षम्य अर्थात क्षमा न करने योग्य अपराध मानते थे उनकी दृष्टि में जो राफ़िज़ी हो उसकी सज़ा मृत्युदण्ड थी। हदीस के अनुसार अबू बसीर ने इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम से कहाः मेरी जान आप पर क़ुरबान, हमें ऐसा नाम और उपाधि दे दी गई है जिस उपाधि द्वारा शासन हमारा ख़ून बहाने और सम्पत्ति नष्ट करने तथा हमें दुख एंव यातनाएं देने को वैध समझते हैं इमाम ने प्रश्न किया कि वह उपाधि किया है? अबू बसीर ने उत्तर दियाः हमें राफ़िज़ी कहते हैं। इमाम ने अबू बसीर को सांत्वना देते हुए कहाः फ़िरऔन के सत्तर सैनिक फ़िरऔन को छोड़ कर जनाब मूसा (अ.) के साथ हो गए मूसा (अ.) की क़ौम में से कोई व्यक्ति भी उन सत्तर लोगों की तरह हारून से प्यार नहीं करता था और उन लोगों को मूसा (अ.) की क़ौम में राफ़िज़ी कहा जाता था।
इस हदीस से कुछ परिणाम निकलते हैं
1. उस युग में भी शियों को राफ़िज़ी कहा जाता था।
2. सामान्य रूप से अमवी शासक ही राफ़िज़ी कहा करते थे और उसका उद्देश्य इसी बहाने शियों पर अत्याचार करना था।
3. शियों को राफ़िज़ी कहने का कारण यह था कि शिया हज़रत अली (अ.) से स्नेह अभिव्यक्ति करते थे आपकी प्रमुखता व श्रेष्ठता का उल्लेख करते और आपको दूसरों से उत्तम व श्रेष्ठ समझते थे हालांकि अमवी शासकों की दृष्टि में हज़रत अली (अ.) से स्नेह अभिव्यक्ति और आपकी प्रमुखता व श्रेष्ठता का उल्लेख, अपराध था।
4. यद्धपि अहलेबैत (अ.) के शत्रुओं और शियों के विरोधियों की दृष्टि में राफ़िज़ी होना नापसंदीदा और निंदनीय था परन्तु अहलेबैत (अ.) की दृष्टि में यही नाम पसंदीदा और प्रसंशनीय है।
उल्लिखित हदीस के दृष्टिगत शियों को राफ़िज़ी कहे जाने का कारण और राफ़िज़ी कहने का आरम्भ किसके द्वारा हुआ, जैसे प्रश्नों में शंका व्यक्त की गई है इसलिए कि कुछ इतिहासकारों के अनुसार जब ज़ैद इब्ने अली इब्ने हुसैन (अ.) ने कूफ़ा में आंदोलन किया तो आरम्भ में कूफ़े के लोगों ने उनके आज्ञापालन की शपथ ली परन्तु फिर शपथ लेने वालों ने पहले दो ख़लीफ़ाओं के बारे में जनाबे ज़ैद का दृष्टिकोण पता करना चाहा तो जनाबे ज़ैद ने पहले दो ख़लीफ़ाओं के प्रति सम्मानजनक रवैया अपनाया और उनसे दूरी नहीं जताई अतः कूफ़ेवासियों ने ज़ैद का साथ छोड़ दिया और प्रतिज्ञा पालन नहीं किया तो ज़ैद ने उन्हें राफ़ेज़ा कहा।
उपरोक्त रिवायत के अनुसार राफ़िज़ी की परिभाषा, ज़ैद के आंदोलन से पहले भी प्रचलित थी और अमवी शासक उसे शियों के लिए प्रयोग करते थे।
इतिहासिक स्रोंतों व प्रलेखों में मनन चिंतन से यह परिणाम निकलता है कि राफ़िज़ी, वास्तव में  धार्मिक परिभाषा होने से पहले राजनीतिक परिभाषा है और  शासक या शासन प्रणाली का विरोध करने वाले लोगों के लिए प्रयोग होता है चाहे उस शासन की नींव सत्य पर हो या असत्य पर। अतः जमल के युद्ध के बाद मुआविया ने अम्र इब्ने आस के नाम एक पत्र लिखा जिसमें हज़रत अली (अ.) के विरूद्ध विद्रोह करने वालों को राफ़ेज़ा कहा है।
قد سقط الينا مروان بن الحكم في رافضة اهل البصرة
इस आधार पर चूँकि शिया सदैव बनी उमय्या के अत्याचारी शासनों के विरूद्ध धर्मयुद्ध में व्यस्त रहे अतः उन्हें राफ़िज़ी कहा गया और फिर जब इस बहाने से शियों को कुचलने का बहाना मिल गया तो उसे धार्मिक रंग दे दिया गया और रफ़्ज़ को खुल्फ़ा के बारे में शियों के विश्वास से जोड़ दिया गया। इतिहासिक दृष्टि से ज़ैद इब्ने अली की कहानी अगर सही हो तब भी दूसरे सक्ष्यों व प्रमाणों की रौशनी में सम्भवतः यही परिणाम निकाला जा सकता है कि इन परिस्थितियों में ऐसा प्रश्न करना और प्रतिज्ञा लेने वालों का साथ छोड़ देना, वास्तव में अमवियों का षड़यंत्र था ताकि  ज़ैद इब्ने अली के आंदोलन को पराजय का मुँह देखना पड़े।


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