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हमारी ख़राबियों का इलाज

जिस दीन के ज़रिए कल अरब की जाहिलियत का इलाज हुआ था, जिस दीन के ज़रिए अजम (ग़ैर अरब) की जाहिलियत का इलाज हुआ है, उसी दीन के ज़रिए हमारी जाहिलियत का इलाज भी मुमकिन है।

विलायत पोर्टल : हमारी दीनी और क़ौमी ज़िंदगी बेहद मतभेदों का शिकार है, हर तरफ़ ख़राबियां डेरा डाले हैं, बुराईयों ने अड्डे जमा लिए
हैं, नेक लोग और उलमा इस्लाह और सुधार को लेकर मायूस हो गए हैं बल्कि मायूसी का ऐलान कर के हालात को और बिगड़ने का मौक़ा दे रहे हैं, हालांकि व्यक्तिगत किरदार बुरे अख़लाक़ में गिरफ़्तार है और सामाजिक किरदार और नैतिकता में लगातार गिरावट आ रही है, लेकिन इन सबके बावजूद इस्लाह और सुधार से मायूस हो जाना न सही है और न ही मुनासिब है, इस्लाह और सुधार मुमकिन है और कामयाबी यक़ीनी है बस शर्त यह है कि सही इलाज तलाश किया जाए और उस पर अमल करने की हर तदबीर का इस्तेमाल किया जाए, जिस दीन के ज़रिए कल अरब की जाहिलियत का इलाज हुआ था, जिस दीन के ज़रिए अजम (ग़ैर अरब) की जाहिलियत का इलाज हुआ है, उसी दीन के ज़रिए हमारी जाहिलियत का इलाज भी मुमकिन है।
केवल अरब की जाहिलियत के इलाज की मिसाल शायद हिम्मत और हौसला न बढ़ाती, बल्कि यह ख़्याल शायद मायूसी का सहारा बन जाता कि अरब की जाहिलियत का इलाज केवल दीन के नुस्ख़े से नहीं हुआ बल्कि पैग़म्बर स.अ. जैसा हकीम तबीब मौजूद था, लेकिन आज अजम की जाहिलियत का इलाज इमाम ख़ुमैनी द्वारा हुआ है जो न मासूम हैं न नबी हैं न इमाम हैं केवल एक आलिमे दीन हैं।
ईरान का इस्लामी इंक़ेलाब इस बात का यक़ीन दिलाता है कि दीन के ज़रिए कामयाब इलाज किया जा सकता है, बस ज़रूरत है पूरी लगन के साथ काम करने की, ज़रूरत है अल्लाह पर भरोसा रखने की, ज़रूरत है नाकामी के हर ख़्याल को दिमाग़ से दूर फेंकने की, ज़रूरत है क़ुर्बानियां देने की, ज़रूरत है काम की शुरुआत लोगों की दीनी तरबियत से की जाए, लोगों से ही क़ौम की तामीर होती है।
अगर लोग दीनदार बन गए तो तो समाज दीनदार बन जाएगा और समाज के दीनदार हो जाने के बाद हर ख़राबी का इलाज हो जाएगा।
ख़राबियों का कारण कुछ लोग हुए हैं, जिस शहर में मज़हबी दंगे होते हैं या जो इंसानों को ख़ून में नहलाते हैं, प्रॉपर्टी को जला कर तोड़ कर नुक़सान पहुंचाते हैं लेकिन जब कभी कहीं भी ऐसा होता है अधिकतर यह काम नहीं करती है बल्कि मुट्ठी भर लोग सारे हंगामे और डर का कारण बनते हैं और ज़्यादातर लोग ख़ामोश रहने में निजात समझते हैं।
आप किसी स्कूल, कॉलेज या यूनिवर्सिटी को देखें तो 100 में से 10 लड़के 90 लड़कों पर हुकूमत करते दिखाई देंगे, किसी फ़ैक्ट्री कारख़ाने को देख लें अधिकतर मज़दूर पेट की आग बुझाने के लिए और नंगे भूखे बच्चों के आंसू पोंछने के लिए काम करने पर तैयार मिलेंगे लेकिन कुछ नेताओं के हाथों बेबस और मजबूर नज़र आएंगे, दंगों और हिंसा में ज़्यादातर आबादी, कष्ट, तकलीफ़, नुक़सान, ख़ौफ़ और दहशत का शिकार बनती है इसलिए वह अमन और शांति चाहती है मगर कुछ गुंडों का राज रहता है, हुकूमत, पुलिस, अदालत सब इस ख़ूनी खेल को बार बार खेलते देखती हैं लेकिन केवल तमाशाई बनी रहती है, या आज के माहौल में ख़ुद भी ज़ुल्म और दरिंदगी में शामिल हो जाती है या इंसाफ़ को क़ानून के हाथों में क़ैदी बता कर अपने को ज़िम्मेदारियों से आज़ाद करा लेती हैं।
आज हम आसानी से इस बात को महसूस कर सकते हैं कि किस तरह वह लोग जिनका काम दंगे को रोकना लोगों को उनके हक़ दिलाना उनकी सुरक्षा का बंदोबस्त करना जैसे काम होते हैं वह सब मिलकर लोगों में डर का माहौल पैदा कर रहे हैं, लोगों के हुक़ूक़ को रौंद रहे हैं, हुकूमत के इशारे पर जवानों की ज़िंदगी से खिलवाड़ कर रहे हैं, न जाने कितने बिजनेस न जाने कितनों की रोज़ी रोटी केवल अपनी सत्ता को बचाने के लिए नष्ट कर दे रहे हैं।
लेकिन इन सारी परिस्तिथियों के बावजूद मायूसी किसी हाल में भी नहीं होनी चाहिए अपने हक़ की मांग करना हमारा हक़ है और साथ ही ज़ुल्म करने वाला हमेशा ज़लील और अपमानित हुआ है बस ज़रूरत इस बात की है हम अपनी सहनशीलता और संयम को बाक़ी रखें और पूरी ज़िम्मेदारी और बहादुरी से हालात का सामना करें और एक दूसरे पर भरोसे को बाक़ी रखें और एक दूसरे के सम्मान का ध्यान रखें, मिलकर आवाज़ उठाएं आपसी मतभेद को किसी दूसरे मौक़े के लिए छोड़ कर पूरी क़ौम को ध्यान में रख कर उनके हक़ के भी आवाज़ उठाने को भी ध्यान में रखना चाहिए।

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