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बंद मुठ्ठी

जज ने फ़ैसला सुनाने के लिए क़लम उठाते हुए कहा कि आख़िर तुम जिस धरती पर रहती हो उसके सम्मान का भी ख़्याल नहीं रखा, ऐसा क्यों किया?अवैध रूप से तुमने सड़क पर क़ब्ज़ा जमाने की कोशिश की जिससे दंगा भड़क सकता था नतीजे में फ़साद और बढ़ सकता था।उस दुखिया औरत ने जो जवाब दिया उससे जज साहब का क़लम हाथ से छूट कर गिर गया।सर कैसा क़ब्ज़ा!! मैं तो पुलिस की गोली का निशाना बनने वाले अपने जवान बेटे की मौत की जगह पर अपने रिश्तेदारों के साथ फूल लेकर पहुंची थी जहां उसने बहुत दर्दनाक तरीक़े से दम तोड़ा था, यह देखें मेरी मुठ्ठी में अभी भी उस जगह की मिट्टी है।

विलायत पोर्टल : चारों तरफ़ से लोग लाठी और डंडे हाथों में लेकर एक ख़ास तरफ़ दौड़ रहे थे.......
कोई कह रहा था मारो..... कोई मार रहा था...... कोई गाली दे रहा था.....
कोई कह रहा था कि जाने दो अब बहुत हो गया, इतने में सायरन बजाती पुलिस की गाड़ी पहुंच गई, और आठ दस पुलिस वाले हाथों में डंडे लहराते हुए धम से अपनी गाड़ी से उतरे और फिर लाठियां बरसने लगीं, मैंने सोचा चलो इन दंगाइयों से निजात मिलेगी पुलिस देर से सही लेकिन पहुंच तो गई, मगर मेरी हैरत की हद न रही जब देखा उन लहराती हुई लाठियों का निशाना औरतें थीं और उनके बीच एक ऐसी औरत थी जिसकी गोद में एक बच्चा था जो कभी ख़ुद को बचाती कभी बच्चे को बचाती लाठियां खा रही थी।
कुछ देर बाद......
मैंने देखा उसके साथ बैठी औरतें जैसे तैसे इधर उधर भाग गईं थीं जबकि वह बेहोश हो कर गिर पड़ी थी, उसका सर फट चुका था, उसका चार साल का बच्चा अपनी मां के गाल को सहलाता हुआ उठाने की कोशिश कर रहा था, कभी वह अपनी मां के हाथों को चूमता कभी पेशानी को, और कभी उसके मुंह पर मुंह रख देता लेकिन वह बे सुध पड़ी थी, और पुलिस वाले खड़े अपने मोबाइल से फ़ोटो खींच रहे थे, इतने में किसी भले आदमी ने एम्बुलेंस को फ़ोन कर दिया और वह उसे उठा कर हॉस्पिटल ले गई।
डॉक्टरज़ ने बहुत ही मेहनत से काम किया और फिर पूरे 24 घंटे बाद उसे होश आया, जैसे ही उसे होश आया पुलिस की एक टीम अंदर घुसने लगी और डॉक्टरज़ से तू तू मैं मैं होने लगी, मैं अपना टूटा कैमरा लिए देख रहा था डॉक्टर्स उसे ले जाने को मना कर रहा थे उसकी हालत ऐसी नहीं थी कि उसे हॉस्पिटल से बाहर ले जाया जाए लेकिन पुलिस नहीं मानी और उसे देश से ग़द्दारी का मामला बताया और कहा इसे तुरंत कोर्ट में हाज़िर होना है, देश से ग़द्दारी की बात सामने आते ही डॉक्टरज़ चुप हो गए कि देश से ग़द्दारी का आरोप हर चीज़ पर भारी है।
कोर्ट में जज साहब आ चुके थे सब उनके सम्मान में खड़े हो गए, लगभग बेहोशी की हालत में उस औरत को बहुत मुश्किल से कटघरे में खड़ा किया गया, और फिर सरकारी वकील ने उसके ख़िलाफ़ लगने वाले आरोपों की पूरी लिस्ट पढ़ कर सुनाई, वह सर झुकाए सुनती रही उसने पूरी ताक़त समेट कर अपनी मुठ्ठियों को भींच रखा था।
जज ने वकील की बात सुनने के बाद उस औरत से पूछा आप क्या सफ़ाई देना चाहेंगी? उसने कहा कुछ नहीं, बस आप मुझे फांसी की सज़ा सुना दीजिए बस यही मेरी विनती है, मुझे और कुछ नहीं चाहिए मेरे हक़ में यही इंसाफ़ है।
जज ने समय बता कर पूछा क्या तुम इस समय पर जाफ़राबाद के उस इलाक़े में मौजूद नहीं थीं? उसने जवाब दिया बिल्कुल मौजूद थी।
जज ने कहा तुम्हारे साथ कुछ और भी औरतें थीं? उसने कहा कि हां तीन चार मेरी रिश्तेदार थीं लेकिन जब लाठीचार्ज हुई तो सब तितर बितर हो गईं।
जज ने फ़ैसला सुनाने के लिए क़लम उठाते हुए कहा कि आख़िर तुम जिस धरती पर रहती हो उसके सम्मान का भी ख़्याल नहीं रखा, ऐसा क्यों किया?
अवैध रूप से तुमने सड़क पर क़ब्ज़ा जमाने की कोशिश की जिससे दंगा भड़क सकता था नतीजे में फ़साद और बढ़ सकता था।
उस दुखिया औरत ने जो जवाब दिया उससे जज साहब का क़लम हाथ से छूट कर गिर गया।
सर कैसा क़ब्ज़ा!! मैं तो पुलिस की गोली का निशाना बनने वाले अपने जवान बेटे की मौत की जगह पर अपने रिश्तेदारों के साथ फूल लेकर पहुंची थी जहां उसने बहुत दर्दनाक तरीक़े से दम तोड़ा था, यह देखें मेरी मुठ्ठी में अभी भी उस जगह की मिट्टी है।
जहां पर मेरे बेटे ने पुलिस की गोली खाने के बाद ज़ख़्मी हालत में दंगाइयों की लाठी खा कर दम तोड़ा था।
कोर्ट परिसर में पूरी तरह सन्नाटा पसर गया था, कुछ मुर्दा ज़मीर थे जिन पर लाठियां बरस रही थीं लेकिन वह बे सुध बैठे थे क्योंकि वह मुर्दा थे, उनका ज़मीर दम तोड़ चुका था।
बंद मुठ्ठी की ख़ाक सबके सामने थी जिससे भारत के शहीदों की ख़ुशबू आ रही थी लेकिन ख़ाकी वर्दी पर इसका कोई असर नहीं था, हर तरफ़ सन्नाटा था, मैं बाहर निकला कोर्ट के ऊपर देखा तो तिरंगा पूरी आन बान शान के साथ लहरा रहा था और उसी तिरंगे के नीचे न जाने अभी और कितनी माएं थीं जो अपनी मुठ्ठी बंद किए हुए अपनी पेशी का इंतेज़ार कर रही थीं......

हुज्जतुल इस्लाम आलीजनाब मौलाना नजीबुल हसन साहब




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