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क्योंकि यह मज़दूर हैं

सड़कों पर लाचार और बेसहारा वह भी बुख़ार में तपते खांसते और हांफते दो रोटियों के मोहताज भूखे प्यासे उन मज़दूरों को जो बड़ी बड़ी जगमगाती बिल्डिंगों अपने ख़ून पसीने से रौशनी की चादर उढ़ा कर ख़ुद अंधेरी और सुनसान रास्तों पर चल पड़े हैं।

विलायत पोर्टल :
मशीनों में एहसास नहीं होता....
उनके अंदर थकन नहीं होती....
शाम ढलते ढलते उनके माथे पर थकन नज़र नहीं आती....
देर रात उनकी कमर में तेज़ दर्द नहीं होता....
सुबह होते ही उन्हें काम पर जाने का टेंशन नहीं होता....
किसी कारण काम पर देरी से पहुंचने पर उन्हें देहाड़ी कटने का डर नहीं होता....
उन्हें अगले महीने किराए की फ़िक्र नहीं होती...
उन्हें किराया न जोड़ पाने की वजह से मकान मालिक से नज़रें चुरा कर गुज़रने की ज़रूरत नहीं होती....
उनके मां बाप नहीं होते....
उनकी ज़िम्मेदारियां भी नहीं होतीं....
बाल बच्चे भी नहीं होते इसलिए उनकी परवरिश की फ़िक्र भी नहीं होती....
न ही मशीनों को खांसी आती है....
न ही उन्हें सर्दी लगती है और न ही उन्हें ज़ुकाम होता है....
न किसी मशीन के पैरों में सूजन होती है....
वह तो खड़ी ही मज़दूरों के पैरों पर होती हैं....
न ही उनके कमर में डिस्क होती है....
न ही हथेलियों में ज़ख़्म होता है....
हां मशीन का ध्यान रखने वाला बेचारा मज़दूर!!!
उसके हाथों में कभी चोट लगती है तो कभी ज़ख़्म....
कहीं उसके पैरों में सूजन होती है तो कभी वजूद में थकन....
कभी उसे खांसी होती है तो कभी ज़ुकाम....
कभी वह सर्दी में कांपता है तो कभी बुख़ार में तपता है....
उसके बावजूद उसे इस बात की फ़िक्र रहती है कि न मालिक की गाड़ी ख़राब हो न कारख़ाने की मशीन न मोटर....
कितना मजबूर है यह मशीनों के सामने यह मज़दूर....
कि कभी किसी मशीन के नुकीले फंस यह हाथ गंवा बैठता है तो किसी मशीन के मुंह में पैर, कोई मशीन उसकी आंख छीन लेती है तो कोई उसकी उंगलियां निगल लेती है, हर मशीन को मज़दूर की भेंट चाहिए अपने काम के लिए....
लेकिन कोई मज़दूर किसी मशीन की भेंट नहीं चढ़ाता अपनी ज़रूरतों को पूरा करने के लिए....
मशीनों के मालिक बड़ी बड़ी मशीनों को लाकर डाल देते हैं और पलट कर देखते भी नहीं लेकिन यह मज़दूर है जो उसका पूरा ख़्याल रखता है।
वह तो अपनी मां के हाथों से सिले कुर्ते तक से साहब की बेजान गाड़ी को ऐसे साफ़ करता है जैसे अपने बच्चे के चेहरे से धूल मिट्टी साफ़ कर रहा हो।
उसके बावजूद यह मशीनी दौर का तोहफ़ा है कि हुकूमत पर ब्रजमान लोगों को इन मज़दूरों की फ़िक्र नहीं जो ज़िंदा एहसास रखते हैं, उन मशीनों की फ़िक्र ज़्यादा है जिन्हें यह मज़दूर अपने ख़ून पसीने से चलते रहने और काम करने के क़ाबिल बनाते हैं।
जैसाकि मशीनों की देखरेख के लिए मज़दूर वर्ग ही तैनात रहता है और उनकी सफ़ाई सुथराई और देखभाल के लिए भी यही वर्ग मौजूद रहता है।
क्या अफ़सोस का विषय नहीं कि घर की सिलाई मशीन से लेकर बड़े बड़े कारख़ाने की भारी भरकम मशीनों तक को कोर में रखा जाए उन्हें एक शहर से दूसरे शहर में भेजने का इतना ख़्याल रखा जाए कोई पुर्ज़ा इधर से उधर न हो कोई खरोच तक न आए और बेचारे मज़दूरों को यूंही छोड़ दिया जाए।
सड़कों पर लाचार और बेसहारा वह भी बुख़ार में तपते खांसते और हांफते दो रोटियों के मोहताज भूखे प्यासे उन मज़दूरों को जो बड़ी बड़ी जगमगाती बिल्डिंगों अपने ख़ून पसीने से रौशनी की चादर उढ़ा कर ख़ुद अंधेरी और सुनसान रास्तों पर चल पड़े हैं।
क्या फ़र्क़ पड़ता है मशीन ही जैसा दिमाग़ रखने वालों पर कि यह मज़दूर हैं जिस तरह दुख भरे हालात में ज़िंदगी गुज़ार लेते हैं उसी तरह जैसे तैसे अपनी मंज़िल तक पहुंच ही जाएंगे, यह चल पड़े हैं तो इन्हें चलने दो यह मज़दूर हैं इसीलिए चल रहे हैं।
यह चलते चलते मर भी सकते हैं, यह मर मर कर चल भी सकते हैं क्योंकि यह मज़दूर हैं क्योंकि उनके सीने में दिल है, यह केवल अपने लिए सोचते तो कभी कोरोना जैसी महामारी के सामने सीना तान कर अपने बीवी बच्चों अपने मां बाप के लिए घर से बाहर न निकलते बल्कि अपनी जान बचाने की फ़िक्र करते।
पता नहीं सरकार के यह बात क्यों समझ में नहीं आती कि यह लोग अपने लिए नहीं बल्कि उन लोगों के लिए निकले हैं जिनके बारे में सोचना सरकार की ज़िम्मेदारी है, लेकिन जब सरकार ज़िम्मेदारी नहीं निभाएगी तो मजबूर होकर यह ज़िम्मा उन्हें ही उठाना होगा क्योंकि वह मज़दूर हैं, मज़दूर तो होता ही इसलिए है ताकि दूसरे का बोझ उठाए इसलिए इन्हें चलने दो कहीं न कहीं पहुंच ही जाएंगे चाहे कोरोना की भेंट चढ़ कर या भूख से मर कर.... ।
इन्हें मत रोको यह मज़दूर हैं कोई मशीन नहीं जिसके पास एहसास नहीं होता यह इसीलिए चल रहे हैं कि इनके पास ज़िंदा एहसास है।
यह उन मुर्दों से लाख गुना बेहतर हैं जो अपने घरों में बेकार मशीन बने बेहिस बन कर टीवी के सामने रिमोट लिए बैठे हैं कि स्क्रीन पर कोई ज़िंदा मज़दूर चलता न दिख जाए।
यह ऐसे मशीन टाइप लोग हैं जो सब कुछ देख सकते हैं लेकिन ज़िंदा रहने की निशानियों से उन्हें सख़्त नफ़रत है, यही वजह है कि जब भी किसी मज़दूर को देखते हैं चैनल बदल कर फिर इंसानों के भेष में अपनी जैसी मशीनों के सीन देखने में बिज़ी हो जाते हैं, भरी हुई चाभी पर नाचती मशीनें, थिरकती मशीनें, जाम उठाए हुए मशीनें, गाती हुई मशीनें, पुलिस की वर्दी पहने लाठी भांजती मशीनें, ग़रीबों का लहू चूसती इंसानी भेष में मशीनें.....।
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