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रिश्तेदारों से मिलना जुलना।

इस्लाम ने जिन सामाजिक अधिकारों की ताकीद की है और मुसलमानों को उनकी पाबंदी का हुक्म दिया है उनमें से एक यह है कि वह अपने घर परिवार और रिश्तेदारों के साथ हमेशा अच्छे सम्बंध बनाये रखें इसी को सिल-ए-रहेम अर्थात रिश्तेदारों से मिलना जुलना कहा जाता है।

विलायत पोर्टलः इस्लाम ने जिन सामाजिक अधिकारों की ताकीद की है और मुसलमानों को उनकी पाबंदी का हुक्म दिया है उनमें से एक यह है कि वह अपने घर परिवार और रिश्तेदारों के साथ हमेशा अच्छे सम्बंध बनाये रखें इसी को सिल-ए-रहेम अर्थात रिश्तेदारों से मिलना जुलना कहा जाता है।

इसलिए एक मुसलमान के लिए ज़रूरी है कि अपने घर परिवार और रिश्तेदारों से मिलता और उनका हालचाल पूछता रहे, उनके साथ अच्छा व्यवहार रखे, अगर ग़रीब हों तो उनकी सहायता करे, परेशान हाल हों तो उनकी मदद के लिए पहुँचे और उनके साथ घुल मिल कर रहे और नेक कामों तथा सदाचार और तक़वे में उन्हें सहयोग दे अगर कोई किसी मुसीबत में ग्रस्त हो जाए तो ख़ुद उनका शरीक हो जाए और अगर किसी को किसी मुश्किल का सामना हो हो तो उसे हल करने की कोशिश करे और अगर उनकी तरफ़ से ग़लत व्यवहार या कोई अनुचित काम देखे तो ख़ुबसूरत तरीक़े से उन्हें नसीहत करे। क्योंकि हर इंसान के घर परिवार और रिश्तेदार ही उसके सहारा होते हैं यानी अगर हालात के उलट फेर से उसके ऊपर कोई भी मुश्किल आ पड़ती है तो उसकी निगाहें उन्हीं की तरफ़ उठती हैं।

इसीलिए उनके अधिकार के बारे में हज़रत अली अ. फ़रमाते हैः

ایھا الناس انہ لا یستغنی الرجل و ان کان ذاعن عشیرتہ و دفاعھم عنہ بایدیھم والسنتھم وھم اعظم الناس حیطۃً من ورائہ والھم لشعثہ واعطفھم علیہ عند نازلۃ اذا نزلت بہ

ऐ लोगो ! कोई आदमी चाहे जितना मालदार हो वह आपने घर परिवार और रिश्तेदारों और क़बीले की ज़बानी या अमली और दूसरे प्रकार की सहायता से विमुक्त नहीं हो सकता है और जब उस पर कोई मुश्किल और मुसीबत पड़ती है तो उसमें सबसे ज़्यादा यही लोग उसका सहारा बनते हैं। 

(नहजुल बलाग़ा ख़ुत्बा न0 23) 

आपने यह भी फ़रमायाः जान लो कि तुम में कोई आदमी भी अपने रिश्तेदारों को मोहताज देख कर उस माल से उसकी ज़रूरत पूरी करने से हाथ न ख़ींचे जो बाक़ी रह जाए तो बढ़ नहीं जाएगा और ख़र्च कर दिया जाए तो कम नहीं होगा इसलिए कि जो आदमी भी अपने क़ौम और क़बीले से अपना हाथ रोक लेता है तो उस क़बीले से एक हाथ रुक जाता है और ख़ुद उससे अनगिनत हाथ रुक जाते हैं और जिसके व्यवहार में नरमी होती है वह क़ौम की मुहब्बत को हमेशा के लिए हासिल कर लेता है। 

(नहजुल बलाग़ा ख़ुत्बा न0 23)

इमाम ने इस स्थान पर परिवार वालों या रिश्तेदारों से सम्बंध तोड़ लेने से नुक़सान की बेहतरीन मिसाल दी है कि उसके अलग हो जाने की वजह से घर परिवार और रिश्तेदारों को केवल एक आदमी का नुक़सान होता है मगर वह ख़ुद अपने अनगिनत हमदर्दों को खो बैठता है इस तरह आपने इस बात की तरफ़ भी इशारा फ़रमाया किः अच्छे व्यवहार द्वारा घर परिवार और रिश्तेदारों की मोहब्बतें हासिल होती हैं जिसमें अनगिनत भलाईयाँ पाई जाती हैं। निश्चित रूप से हर बड़े ख़ानदान या क़बीले और समाज में बहुत सारे लोग पाए जाते हैं जिन की क्षमताएं, सम्भावनाएं और योग्यताएं भी भिन्न होती हैं, आपको उनके अंदर आलिम, जाहिल, मालदार, ग़रीब, स्वस्थ, शक्तिशाली, कमज़ोर या बिल्कुल पिछड़े हुए, हर प्रकार के लोग मिल जाएंगे। तो आख़िर वह ऐसी कौन सी चीज़ है जो उस समाज को एक ताक़तवर, विकसित और बिल्कुल मॉडरेट समाज बना सकती है?

निश्चित रूप से आपसी सम्बंध और सम्पर्क की स्थिरता या ज़िम्मेदारी के एहसास जो एक दूसरे की सहायता तरक़्की और सहयोग से पैदा होते हैं यही वह चीज़ें हैं जिनके द्वारा हम उस नेक मक़सद तक पहुँच सकते हैं और उसका तरीक़ा यह है कि हर मालदार अपनी क़ौम के ग़रीबों का दामन थाम ले, ताक़तवर अपनी क़ौम के कमज़ोर तबक़े के अधिकारों का समर्थन करे और दुश्मनों के मुक़ाबले में उनके अधिकारों के लिए उनके साथ उठ ख़ड़ा हो।

बेशक किसी भी क़ौम और समाज में रिश्तेदारों से मिलने जुलने की की बदौलत एक मज़बूत ताक़तवर और सम्मानित समाज वजूद में आता है। यही वजह है कि इस्लाम ने मुसलमानों को आपसी भाई चारे और बरादरी को मज़बूत से मज़बूत बनाने की ताकीद की है और किसी भी हाल में उन से सम्पर्क को तोड़ने या उन्हें कमज़ोर करने के ख़तरों से उन्हे बख़ूबी आगाह कर दिया है। 

और हदीसे शरीफ़ में तो रिश्तेदारों से मिलने जुलने को इस क़दर अहमियत और बुलंद दर्जा दिया गया है कि उसे दीन और ईमान बताया गया है जैसा कि इमाम मुहम्मद बाक़िर अलैहिस्सलाम ने अपने पाक पूर्वजों के माध्यम से हज़रत मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे व आलिही वसल्लम की यह रेवायत नक़्ल फ़रमाई है कि आपने फ़रमायाः अपनी उम्मत के मौजूदा और ग़ैर मौजूदा यहां तक कि मर्दों के सुल्बों और औरतों के रहमों में मौजूद और क़यामत तक आने वाले हर आदमी से मेरी वसीयत यह है कि अपने घर परिवार और रिश्तेदारों के साथ मिलना जुलना रखें, चाहे वह उससे एक साल की दूरी के फ़ासले पर क्यों न रहते हों क्योंकि यह दीन का हिस्सा है।


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