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पूरे इलाक़े के लिए चुनौती बन जाने वाला इस्राईल चुनौतियों में कैसे घिर गया

फ़िलिस्तीनी संगठनों द्वारा छोड़े जा रहे ज्वलनशील ग़ुब्बारों से इस्राईल पहले ही काफ़ी परेशान था और अब जब फ़िलिस्तीनियों ने गज़्ज़ा के इलाक़े से मिसाइल फ़ायर करके मिशमिरित नामक ज़ायोनी बस्ती को निशाना बनाया है तो इससे पूरे इस्राईल हिल गया। इस्राईली प्रधानमंत्री नेतनयाहू को अपनी अमरीका यात्रा बीच में ही छोड़ कर तेल अबीब लौटना पड़ा। कारण यह है कि ग़ज़्ज़ा से जो मिसाइल फ़ायर किया गया
इस्राईल बड़ी गंभीर चुनौती के सामने है। शुरू से अब तक तो इस्राईल पश्चिमी एशिया के पूरे इलाक़े, इस इलाक़े की सरकारों और जनता के लिए चुनौती बना रहा।

इस्राईल के गठन की कल्पना को फ़िलिस्तीन की धरती पर व्यवहारिक कर दिया गया जो इस्लामी जगत के केन्द्र में स्थित है। इस इलाक़े में यहूदियों को बसाना और इस्राईल का गठन करना बहुत कठिन काम था मगर ब्रिटेन और अमरीका ने इस योजना में साथ दिया और संयुक्त राष्ट्र संघ जैसी संस्थाओं को इस लक्ष्य के लिए प्रयोग किया। इन अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं ने कुछ घंटों और कुछ दिनों की समय सीमा पर प्रस्ताव पारित किए। इस तरह इस्राईल को अस्तित्व मिला। क्षेत्र के देशों ने इस अस्तित्व को अवैध माना और उसके ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया तो पूरी पश्चिमी दुनिया ने इस्राईल का साथ दिया अरब सरकारों के मोर्चे में सेंध लगाई कैंप डेविड और ओस्लो जैसे समझौते करवाए। 1967 के छह दिवसीय युद्ध में कई अरब देशों को इस्राईल के हाथों पराजित करवाया।

इन घटनाओं ने इस्राईल का मनोबल बहुत बढ़ा दिया। इस्राईल अपनी सेना को अजेय सेना कहने लगा, इस्राईली इंटेलीजेन्स को दुनिया की अति शक्तिशाली इंटैलीजेन्स माना जाने लगा। इस इंटेलीजेन्स ने फ़िलिस्तीन सहित इस्लामी जगत और अरब जगत में बड़े बड़े नेताओं की मजबूरियां एकत्रित कर लीं, महत्वपूर्ण राज़ जमा कर लिए। यहां तक कहा गया कि कोई किसी अंधेरी कोठरी में भी छिप गया हो तब भी वह इस्राईली इंटैलीजेन्स की नज़रों से बच नहीं सकता।

मगर इस समय हालात में एक बड़ा बदलाव दिखाई दे रहा है। अब यह देखने में आ रहा है कि इस्राईल अपने अस्तित्व को लेकर काफ़ी चिंता में है। इस्राईली प्रशासन ने मिस्र से मदद मांगी है कि वह फ़िलिस्तीनियों से जारी विवाद में मध्यस्थता करे। इस्राईल के अनुरोध पर बुधवार को एक मिस्री प्रतिनिधिमंडल ग़ज़्ज़ा पट्टी गया है। फ़िलिस्तीनी संगठनों के सामने इस प्रतिनिधिमंडल ने प्रस्ताव रखा है कि गज़्ज़ा पट्टी के लिए वहां ज़रूरत की चीज़ें की सप्लाई की जाएगी और ग़ज़्ज़ा वासियों को भूमध्यसागर में अधिक विस्तृत इलाक़े में मछली का शिकार करने की अनुमति दी जाएगी। प्रतिनिधिमंडल ने हमास संगठन तथा अन्य फ़िलिस्तीनी संगठनों के सामने प्रस्ता रखा है कि करम अबू सालिम पास से गुज़र कर ग़ज़्ज़ा जाने वाले ट्रकों की संख्या बढ़ाई जाएगी, ग़ज़्ज़ा पट्टी में काम करने वाली संयुक्त राष्ट्र संघ की संस्था अनरवा में काम करने वाले फ़िलिस्तीनियों की संख्या बढ़ाकर 40 हज़ार कर दी जाएगी। ग़ज़्ज़ा वासियों को यह अनुमति होगी कि वह भूमध्य सागर में अपने तट से 12 मील की दूरी तक मछली का शिकार कर सकेंगे।

इसके बदले में इस्राईल ने फ़िलिस्तीनी संगठनों से मांग की है कि वह रात के समय होने  वाले प्रदर्शन रोक दें तथा हर प्रकार के हिंसक प्रदर्शन पर पूरी तरह रोक लगा दें। उनसे यह भी मांग की गई है कि वह ग़ुब्बारे छोडना बंद कर दें जिनमें आग लगी होती है और वह ज़ायोनी बस्तियों पर गिरकर आग लगा देते हैं।

गुरुवार की रात मिस्री प्रतिनिधिमंडल फ़िलिस्तीनियों से बातचीत पूरी करके मिस्र लौटेगा और नतीजे से इस्राईल को सूचित किया जाएगा।

क्या कारण है कि फ़िलिस्तीनी संगठनों के सामने इस्राईल इतना मजबूर हो गया है? इसका जवाब बिल्कुल साफ़ है कि इस्राईल अपनी दमनकारी नीतियों से न तो फ़िलिस्तीनियों का प्रतिरोधक ख़त्म कर पाया है और न ही फ़िलिस्तीनी संगठनों की बढ़ती ताक़त पर अंकुश लगा सका है। इसमें कोई संदेह नहीं कि कई वर्षों से जारी इस्राईली नाकाबंदी की वजह से ग़ज़्ज़ा पट्टी में आम लोगों का जीवन कठिन हो गया है मगर यह भी सच्चाई है कि फ़िलिस्तीनियों के प्रतिरोध के जज़्बे तथा प्रतिरोध के साधनों में विस्तार हुआ है। प्रतिरोध की भावना केवल ग़ज़्ज़ा पट्टी तक सीमित नहीं है बल्कि पश्चिमी तट और बैतुल मुक़द्दस में बसे फ़िलिस्तीनियों के भीतर भी परवान चढ़ रही है।

फ़िलिस्तीनी संगठनों द्वारा छोड़े जा रहे ज्वलनशील ग़ुब्बारों से इस्राईल पहले ही काफ़ी परेशान था और अब जब फ़िलिस्तीनियों ने गज़्ज़ा के इलाक़े से मिसाइल फ़ायर करके मिशमिरित नामक ज़ायोनी बस्ती को निशाना बनाया है तो इससे पूरे इस्राईल हिल गया। इस्राईली प्रधानमंत्री नेतनयाहू को अपनी अमरीका यात्रा बीच में ही छोड़ कर तेल अबीब लौटना पड़ा। कारण यह है कि ग़ज़्ज़ा से जो मिसाइल फ़ायर किया गया वह इस्राईल की राजधानी तेल अबीब के ऊपर से गुज़रकर शहर के उत्तर में स्थित मिशमिरित बस्ती में गिरा। इसका मतलब यह हुआ कि आयरन डोम के नाम का इस्राईल का मिसाइल ढाल सिस्टम इस मिसाइल के आगे पूरी तरह फ़ेल हो गया। 120 किलोमीटर दूरी तय करके अपने निशाने पर लगने वाले इस मिसाइल ने इस्राईल को बहुत कड़ा संदेश दिया है।

इस्राईल को हिज़्बुल्लाह लेबनान का ख़ौफ़ पहले से ही परेशान किए हुए है। हिज़्बुल्लाह के मिसाइलों की चर्चा इस्राईल में हर सतह पर हो रही है। सीरिया में ईरान की सैनिक उपस्थिति इस्राईल के लिए डरावना सपना बन चुका है। लेबनान की सीमा के निकट तैनात ज़ायोनी सैनिकों के भय की यह हालत है कि उन्होंने आम नागरिकों के आवासीय इलाक़े के बीच में अपनी छावनियां बनाई हैं। अर्थात ज़ायोनी सेना आम लोगों को मानव ढाल के रूप में प्रयोग कर रही है।

सवाल यह है कि समीकरणों का यह बदलाव कैसे आया कि पूरे इलाक़े के लिए चुनौती बन जाने वाले इस्राईल आज अनगिनत चुनौतियों में घिर गया है? इसका जवाब यही है कि इस्राईल ने अब तक अरब सरकारों से मुक़ाबला किया जिनके अमरीका और ब्रिटेन जैसे पश्चिमी देशों से गहरे स्ट्रैटेजिक संबंध रहे हैं और इन संबंधों का फ़ायदा उठाकर इस्राईल ने अरब सरकारों पर अपनी इच्छाएं थोपी हैं। मगर इस बीच पश्चिमी एशिया के इलाक़े में जन प्रतिरोध की लहर उठी और इसके नतीजे में प्रतिरोधक संगठन बन गए बल्कि एक बड़ा इस्लामी प्रतिरोध मोर्चा तैयार हो गया है जिसने सारी समीकरणों को उलट पलट कर रख दिया है। इस मोर्चे पर न तो पश्चिमी सरकारों का कोई प्रभाव है और न इस मोर्चे को पश्चिमी देशों से किसी प्रकार की कोई आशा है। इसी चीज़ ने सारा दृष्य बदल दिया है और हालात का रुख़ कुछ और हो गया है। इस्राईल और उसके घटक बड़ी मेहनत कर रहे हैं कि हालात का रुख़ बदल जाए लेकिन इस्लामी जनप्रतिरोध की जड़े बहुत गहरी हैं।


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