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हक़ के रास्ते में हंसी उड़ाए जाने के समय क्या करें?

क़ुर्आन में सूरए मोतफ़्फ़ेफ़ीन की आयत नंबर 29 से 32 में ज़िक्र है कि मुजरिम और गुनहगार लोग अलग अलग प्रकार से मोमेनीन पर हंसते उनका मज़ाक़ उड़ाते और उनका अपमान करते।

विलायत पोर्टलः एक आदमी ने क़ाहिरा से अब्बासिया तक की यात्रा के लिए एक ऊँट किराए पर लिया, वह ऊँट पर बैठ गया और और ऊँट का रखवाला उसकी रस्सी को पकड़े हुए चल दिया, बीच रास्ते में ऊँट का रखवाला कभी धीरे धीरे बड़बड़ाते हुए कभी ज़ोर से उस मुसाफ़िर को अजनबी समझते हुए उसका मज़ाक उड़ाने लगा, जैसे जैसे ऊँट आगे बढ़ता वह बुरा भला कहता जाता और मज़ाक़ उड़ाता जाता, अचानक रास्ते में एक आदमी इस घटना को देख कर उस मुसाफ़िर से कहता है, क्या जानते हो यह ऊँट का रखवाला तुम को क्या कह रहा है? वह कहता है हाँ मैं सब सुन और समझ रहा हूँ, वह कहता है फ़िर कोई प्रतिक्रिया क्यों नही दे रहे? 

वह कहता है कि अगर वह मुझे मेरी मंज़िल अब्बासिया तक पहुँचा दे रहा है तो यह सब बातें महत्वपूर्ण नहीं रह जातीं। वह जो चाहे कहता रहे मेरा सारा ध्यान मेरी मंज़िल की ओर है।

क़ुर्आन में सूरए मोतफ़्फ़ेफ़ीन की आयत नंबर 29 से 32 में ज़िक्र है कि मुजरिम और गुनहगार लोग अलग अलग प्रकार से मोमेनीन पर हंसते उनका मज़ाक़ उड़ाते और उनका अपमान करते।

इन आयतों से मुजरिमों के अपराध को इस प्रकार बयान किया गया है।

  1. मोमिनों पर हमेशा हंसते थे। 
  2. जब कभी मोमिनों की ओर आते जाते उन्हें चिढ़ाते और आंखों के इशारों से मज़ाक़ उड़ाते।
  3. जब अपने वालों के पास वापस आते तो मोमेनीन की ओर पीठ कर के ताना देते।
  4. जब मोमेनीन को देखते तो उनको गुमराह कहते।

लेकिन मोमेनीन ने अपने रास्ते को न बदलते हुए प्रतिरोध किया, क़ुर्आन इस बारे में कहता है, एक दिन आएगा जब मोमेनीन इन गुनहगारों और काफ़िरों पर हंसेगें। (सूरए मोतफ़्फ़ेफ़ीन, आयत 34)


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