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सहीफ़-ए-सज्जदिया और दुआ की तालीम

इमाम सज्जाद अ.स. दुआ और अल्लाह से ख़िताब और उसकी बारगाह में दुआ करने के सिलसिले में सारे मुसलमानों के उस्ताद थे, इसलिए कि अगर इमाम अ.स. न होते तो मुसलमान यह नहीं जान पाते कि कैसे अल्लाह से बातें करें कैसे अपनी हाजतें तलब करे और यह हज़रत ने ही मुसलमानों को सिखाया है कि अगर तौबा करो तो ऐसे करो, अगर बारिश होने की दुआ करो तो ऐसे करो और अगर दुश्मन का ख़तरा हो तो यह कहो

विलायत पोर्टलः  सहीफ़ा की दुआओं ने जहां दुआ की अज़मत और अहमियत दुनिया के सामने पेश की वहां दुआ का तरीक़ा और सलीक़ा भी बयान किया कि अल्लाह से सवाल करने और मांगने के समय क्या अंदाज़ अपनाना चाहिए और किन किन तरीक़ों और सलीक़ों से दुआ मांगना चाहिए, जैसे यह कि बीमार हो तो शिफ़ा के लिए किस तरह दुआ मांगे, क़र्ज़ के अदा होने के लिए कैसे दुआ मांगे, अपनी मुराद हासिल करने के लिए कैसे दामन फैलाए, तौबा और इस्तेग़फ़ार के लिए किस तरह उसके सामने गिड़गिड़ाए, मुसीबतों और परेशानियों से छुटकारा पाने के लिए किस तरह उसको पुकारे, जैसाकि इब्ने जौज़ी नक़्ल करते हैं कि उन्होंने कहा कि: इमाम सज्जाद अ.स. दुआ और अल्लाह से ख़िताब और उसकी बारगाह में दुआ करने के सिलसिले में सारे मुसलमानों के उस्ताद थे, इसलिए कि अगर इमाम अ.स. न होते तो मुसलमान यह नहीं जान पाते कि कैसे अल्लाह से बातें करें कैसे अपनी हाजतें तलब करे और यह हज़रत ने ही मुसलमानों को सिखाया है कि अगर तौबा करो तो ऐसे करो, अगर बारिश होने की दुआ करो तो ऐसे करो और अगर दुश्मन का ख़तरा हो तो यह कहो...। (मोक़द्दम-ए-सहीफ़-ए-सज्जदिया, आयतुल्लाह मरअशी नजफ़ी)

इसके अलावा इमाम की दुआओं में यह भी तालीम मिलती है कि किन किन समय में दुआ मांगी जाए ताकि क़बूल हो सके, जैसाकि सहीफ़ा की वह दुआएं जो ख़ास दिनों के लिए तालीम दी गईं हैं, जैसे दुआए अरफ़ा, दुआए नमाज़े शब, दुआए रोज़े जुमा वग़ैरा, इन दुआओं में जहां दुआ के क़बूल होने के समय का ख़्याल रखा गया है वहां इंसान के ख़ाली समय को अनदेखा नहीं किया गया है, जैसे सुबह और शाम, दोपहर और रात का समय जिसमें बंदा पूरे ध्यान के साथ अपने अल्लाह से राज़ और नियाज़ की बातें करता है और मुनाजात करता है, और अगर ऐसा हो इन ख़ास समय में पूरे दिल के साथ और पूरा ध्यान लगा कर दुआ न कर सके तो सहीफ़ा में ऐसी भी दुआएं हैं जो किसी ख़ास समय और ज़माने के लिए नहीं हैं ताकि इंसान समय और ज़माने का पाबंद हुए बिना जब भी अल्लाह से नज़दीक होना चाहे उसकी बारगाह में हाज़िर होना चाहे वह नज़दीक हो सके हाज़िर हो सके और जिस मक़सद के लिए उसे पुकारना चाहे पुकार सके, जैसाकि हर मक़सद और हर हाजत के लिए उसमें दुआ मौजूद है, हर दर्द और दुख का इलाज, हर बेचैनी का सुकून और हर मुसीबत और परेशानी का हल पाया जाता है, वह कौन सी मुश्किल है जिसके लिए यह ढाल न हों और वह कौन सी मुसीबत है जिसके दूर करने का इलाज मौजूद न हो, वह दुश्मन का ख़तरा हो या क़र्ज़ की मुश्किल, रिज़्क़ की तंगी हो या ग़मों का अंबार, दुख और दर्द के तूफ़ान हों या बड़ी से बड़ी बीमारी, दुनिया की भागदौड़ हो या आख़ेरत में अंजाम का ख़ौफ़, सबका इलाज और सबका हल सहीफ़ा में मौजूद है।

इतने अहम और अज़ीम ख़ज़ाने के होते हुए अगर कोई अपनी बेचारगी और परेशानी का इलाज न करे तो वह ख़ुद अपनी महरूमी और नाकामी का कारण होगा, और अगर कोई अपनी फ़क़ीरी को दूर करने के लिए करीम परवरदिगार के दरवाज़े पर दस्तक न दे तो वह ख़ुद फ़क़ीरी को अपने घर दावत दे रहा है, उसके करीम दरवाज़े पर कंजूसी नहीं है मांगने वाले में कमी और टाल मटोल पाई जाती है।

क्योंकि अल्लाह ने बहुत सारी नेमतों को दुआ से जोड़ रखा है और यह उसका करम और एहसान है कि उसने न केवल दुआ की तरफ़ रहनुमाई की बल्कि दुआ का हुक्म दिया ताकि उसके बंदे उसके करम से महरूम न रहें और वह उसके करम और लुत्फ़ से अपने दामन को भरते रहें, जैसाकि क़ुर्आन, हदीस और मासूमीन अ.स. के अक़वाल में दुआ को लेकर बहुत ताकीद की है और हर तरह उसकी तरफ़ ध्यान दिलाया है।

लगभग 5 आयतें क़ुर्आन में ऐसी हैं जिसमें साफ़ तौर से दुआ का हुक्म दिया गया है उसके अलावा सैकड़ों हदीसों में इस विषय पर ज़ोर देते हुए सारे मुसलमानों को उभारा गया है ताकि वह अपनी हर समस्या और मुश्किल का हल इसी दुआ के ज़रिए हासिल कर सकें।

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