Code : 1509 214 Hit

वालेदैन के साथ नेकी इमाम रज़ा अ.स. की निगाह में

हर मुसलमान पर वाजिब है कि अपने वालेदैन के साथ नेकी करे उनसे अच्छा बर्ताव करे, अपनी पूरी कोशिश करे कि उनसे हमेशा मोहब्बत से मिले और उनसे हमेशा मोहब्बत करे, उनकी सेवा करने में किसी भी तरह की कमी करना सही नहीं है,

विलायत पोर्टलः इमाम रज़ा अ.स. फ़रमाते हैं: वालेदैन के साथ नेकी करना चाहे वह मुशरिक ही क्यों न हों वाजिब है, लेकिन अल्लाह की मासियत और गुनाह करने में उनकी पैरवी सही नहीं है। (उयूनो अख़बारिर रज़ा अ.स. जिल्द 2, पेज 132)

इस्लामी शिष्टाचार में से एक वालेदैन के साथ नेक बर्ताव करना है, वालेदैन के हुक़ूक़ का ख़्याल रखना इतना अहम फ़रीज़ा है कि अल्लाह ने क़ुरआन की आयात में तौहीद, अल्लाह की इबादत और शिर्क से दूरी के बाद इंसान को वालेदैन के साथ नेकी की दावत दी है, जैसाकि सूरए निसा में इरशाद होता है: और अल्लाह की इबादत करो और किसी चीज़ को उसका शरीक (साथी) क़रार मत दो और वालेदैन के साथ नेक बर्ताव करो। (सूरए निसा, आयत 36)

इसके अलावा और भी आयतें हैं जिनमें इसी बात की तरफ़ इशारा किया गया है।

हर मुसलमान पर वाजिब है कि अपने वालेदैन के साथ नेकी करे उनसे अच्छा बर्ताव करे, अपनी पूरी कोशिश करे कि उनसे हमेशा मोहब्बत से मिले और उनसे हमेशा मोहब्बत करे, उनकी सेवा करने में किसी भी तरह की कमी करना सही नहीं है, उनके हुक़ूक़ को पूरा करना इतना अहम है कि अगर वह दोनों काफ़िर और मुशरिक भी हों तो उनका सम्मान उनकी इज़्ज़त करना वाजिब है, इसी वजह से इमाम रज़ा अ.स. ने एक जुमले में दीन की इस अहम बात और नसीहत की तरफ़ अपनी हदीस में इशारा किया है।

वालेदैन के साथ नेकी करने के बारे में बहुत सारी अहम बातें हैं जिनका ख़्याल रखना इंसानी ज़िंदगी को अनेक दिशा में कामयाब बनाती हैं।

 क़ुरआन के चार अलग अलग सूरों में तौहीद, अल्लाह की वहदानियत और उसकी इबादत के बाद वालेदैन के साथ नेकी करने का हुक्म दिया है, जैसाकि इरशाद होता है:

उस समय को याद करो जब हमने बनी इस्राइल से अहद लिया कि ख़बरदार अल्लाह के अलावा किसी की इबादत न करना और माँ बाप के साथ नेक बर्ताव और अच्छा व्यवहार करना.....। (सूरए बक़रह, आयत 83)

इसके अलावा भी सूरए अनआम आयत 151, सूरए इसरा आयत 23 में भी इसी तरह का ज़िक्र मौजूद है।

अल्लाह की इबादत के बाद वालेदैन के साथ नेकी करने का हुक्म देना इस बात को ज़ाहिर करता है कि क़ुरआन किस हद तक वालेदैन के सम्मान, उनकी इज़्ज़त और उनकी अहमियत का ज़िक्र किया है।

 वालेदैन के साथ बातचीत के दौरान अपनी आवाज़ को उनकी आवाज़ से ऊंचा मत करो, यानी उनसे हमेशा धीमी आवाज़ में बात करो।

 उनसे आराम से बात करो, बातचीत में भी उनके सम्मान को ध्यान में रखो।

 ऊंची आवाज़ में बात करना, उनका अपमान करना, उन्हें झिड़कना, उनसे बदतमीज़ी करना या क़ुरआन के मुताबिक़ उफ़ कहना भी सही नहीं है।

 रास्ता चलने में ध्यान रहे कि उनसे आगे आगे न चलो और उनसे पहले किसी जगह पर न बैठो।

 वालेदैन की सेवा ख़ुद अपने हाथों से करो (यानी नौकर चाकर के भरोसे उन्हें मत छोड़ो)

 औलाद चाहे कितने ही ऊंचे पद पर क्यों न पहुंच जाए लेकिन वालेदैन के साथ विनम्रता से पेश आना चाहिए, अपने पद का उपयोग उनके सामने नहीं करना चाहिए, यहां तक कि यह भी कहा जा सकता है कि जो कुछ भी उनके पास है वह सब उसके मां बाप का ही दिया हुआ है और यह नहीं भूलना चाहिए कि वह उन्हीं के द्वारा इस दुनिया में आया है।

 इमाम रज़ा अ.स. ने जिस बात की तरफ़ इशारा किया है उसकी तरफ़ ध्यान देना ज़रूरी है कि वालेदैन के साथ नेक बर्ताव करने के लिए उनका मुसलमान या अच्छे अख़लाक़ वाला होने की शर्त नहीं है बल्कि अगर वह मुशरिक और बुरे अख़लाक़ वाले भी हों तब भी उनके साथ नेक बर्ताव करना ज़रूरी है।

 मां बाप के हुक्म पर अमल करना वाजिब है लेकिन अगर वह शिर्क और कुफ़्र की राह में कोई हुक्म दें या दीन के हुक्म के विरुद्ध कोई हुक्म दें तो उनकी पैरवी नहीं करनी चाहिए, जैसाकि इमाम रज़ा अ.स. ने फ़रमाया: अल्लाह की मासियत और गुनाह में उनकी पैरवी नहीं करनी है।

 मां बाप दोनों के हुक्म में कोई फ़र्क़ नहीं है यानी दोनों के हुक्म का वज़न एक जैसा है।

0
शेयर कीजिए
फॉलो अस
नवीनतम