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वहाबी प्रोफ़ेसर का शिया होना

इस्लामी शिक्षा में अक़्ल का बहुत अहम किरदार है, लेकिन वहाबी किसी ऐसी शिक्षा को लेने या बढ़ावा देने को बिल्कुल भी तैयार नहीं हैं, तो ऐसी परिस्तिथि में इनमें सुधार कैसे लाया जा सकता है।

विलायत पोर्टलः 29 अप्रैल 2014 में jamejamonline.ir में छपी एक रिपोर्ट के आधार पर सऊदी में एक वहाबी विश्वविधालय के प्रोफ़ेसर ने शिया मज़हब को क़ुबूल करते हुए कहा कि, जब तक वहाबियत के सरगना मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब के विचारों को रद्द नहीं किया जाएगा तब तक वहाबियत में सुधार नामुमकिन है, चूंकि वही सबसे पहला शख़्स है जिसने आम इंसानों के क़त्ले आम का फ़तवा दिया था।
इस वेबसाइट के अनुसार डॉक्टर एसामुल एमाद जिनका संबंध वहाबी टोले से था वह शिया हो गए, वह सऊदी के मोहम्मद बिन सऊद नामी एक वहाबी विश्वविधालय के सबसे प्रमुख प्रोफ़ेसर थे, जिस समय उसी विश्वविधालय की ओर से शैख़ मुफ़ीद र.ह. की किताबों की रद्द लिखने को प्रोफ़ेसर से कहा गया तो प्रोफ़ेसर को शैख़ मुफ़ीद र.ह. और शियों के अक़ाएद और विचारों के बारे में जानकारी हासिल हुई, और उसके बाद ही आप को शिया फ़िरक़े और उसके विचारों में दिलचस्पी बढ़ी और फिर आप शिया हो गए।
28 अप्रैल 2014 की रात को क़ुर्आन व मआरिफ़ नामी चैनल के द्वारा प्रोफ़ेसर ने वहाबियत के कुछ अहम अक़ाएद और विचारों से पर्दा उठाते हुए कहा, मैं बचपन से ही वहाबियों के स्कूल में दाख़िल हुआ था, बचपन से ही वहाबियों के अक़ाएद की छांव मे पला बढ़ा, जिस के कारण मैं कह सकता हूं कि, वहाबियों की सबसे बुनियादी और बड़ी ग़लती यह है कि वह बचपन से ही बच्चों के दिमाग़ में क़ुर्आन में जंग की अहमियत को बिठाते हैं।
उन्होंने विस्तार से बताया कि, हम इसी अक़ीदे के साथ बड़े होते हैं कि जो जंग में शामिल नहीं हुआ वह वह काफ़िर हो कर मरेगा, जवान होते होते मेरा इस बारे में अक़ीदा इतना अधिक मज़बूत हो चुका था कि मैं सोंचा करता था कि मैंने इतना रोज़ा नमाज़ किया लेकिन किसी जंग में शामिल न होने के कारण मैं काफ़िर मरूंगा।
प्रोफ़ेसर एमाद ने आगे कहा कि, इन विचारों ने नौजवानी ही में मुझे एक शख़्स जो दूसरे ख़लीफ़ा को नहीं मानता था उसको जान से मारने के बारे में सोंचने पर मजबूर कर दिया था, लेकिन वह अभी ज़िंदा है और उसकी 105 साल की उम्र है, जबकि मैं उसे मार देना चाहता था।
फिर प्रोफ़ेसर ने कहा हम ने क़ुर्आन में जेहाद के विषय को सही तरीक़े से नहीं समझा था, जेहाद के विषय में इतना घुस गया था कि उसकी शर्तों और नियमों तक को ग़लत समझ बैठा।
प्रोफ़सर अल-एमाद ने ज़ोर देकर कहा कि, नज़ला ज़ुकाम का इलाज है, लेकिन कैंसर ला इलाज भी हो सकता है, वहाबियत कैंसर की तरह ही है जिसका इलज बहुत कठिन है, वहाबियों के दिमाग़ में आयतें और हदीसें भरी हुई हैं लेकिन वह इतनी अनियमित और बिखरी हुई हैं कि वह फ़ायदे के बजाए नुक़सान पहुंचा रही हैं।
उन्होंने कहा कि, इस्लामी शिक्षा में अक़्ल का बहुत अहम किरदार है, लेकिन वहाबी किसी ऐसी शिक्षा को लेने या बढ़ावा देने को बिल्कुल भी तैय्यार नहीं हैं, तो ऐसी परिस्तिथि में इनमें सुधार कैसे लाया जा सकता है।
प्रोफ़ेसर अल-एमाद ने कहा मोहम्मद इब्ने अबदुल वहाब के दौर में लगभग 300 साल पहले वहाबी समुदाय बहुत सिमटा हुआ था, लेकिन अब वह मजबूर हैं कि अपने विचारों और अक़ाएद अपने विशेष लोगों तक सीमित नहीं कर सकते, क्योंकि साइबरस्पेस और सोशल नेटवर्किंग की मदद से बैन की गई किताबें भी सभी वर्ग और फ़िर्क़े के लोगों तक पहुंच जाती हैं।
उन्होंने विस्तार से कहा कि, यह पहली बार है सऊदी के इतिहास में कि वहां के सभी विश्वविधालय में मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब की आलोचना हो रही है, और लोग कहते हैं कि जब तक मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब के विचार और अक़ाएद की आलोचना और उनको रद्द नहीं किया गया तब तक सऊदी समाज में सुधार नहीं लाया जा सकता, क्योंकि वहाबियत की बुनियाद रखने वाला वही है।
यह पूर्व वहाबी प्रोफ़ेसर जो अब शिया हो चुके हैं कहते हैं कि, जब तक मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब को पवित्र समझा जाता रहेगा सऊदी में इंसानियत की हत्या ऐसे ही जारी रहेगी, क्योंकि सबसे पहले जिसने सऊदी में लोगों के सर काटने और जान से मारने का फ़तवा दिया वह मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब ही था।
वह आख़िर में कहते हैं कि, आज का वहाबी समाज काफ़ी हद तक समझ चुका कि अब समाज में सुधार और लोगों के क़त्ले आम को रोकने के लिए मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब को पाक साफ़ और पवित्र नहीं कहा जा सकता।





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