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वहाबियों के काले कारनामे (2)

1341 हिजरी में इन वहाबियों ने बिल्कुल ही निहत्थे यमनी हाजियों से उलझ गए, वह पहले हाजियों की भीड़ मे छिप गए, लेकिन बाद में यही यमनी हाजी जब एक पहाड़ी के पास पहुंचे तो ऊपर पहाड़ी पर पहले ही से वहाबी तोप और दूसरे हथियारों के साथ मौजूद थे, उन्होंने उन सभी 1000 हाजियों को तोप से उड़ा दिया, केवल 2 लोग थे जो उस समय वहां से भागने में कामयाब रहे जिन्होंने वहाबियों के इस क्रूरता और बेरहमी से क़त्ल किए जाने को सारी दुनिया तक पहुंचाया।

विलायत पोर्टलः 

ताएफ़ में अत्याचार

ज़ीक़ादा 1217 हिजरी में ताएफ़ के रहने वालों और इन अत्याचारी वहाबी सिपाहियों के बीच कई बार झड़पें हुईं, अंत में ताएफ़ वालों ने आत्मसमर्पण करते हुए माफ़ी मांग कर शांति की अपील की, लेकिन वहाबियों ने पाखंड और अत्याचार को नमूना दिखाते हुए ताएफ़ के क़िले में घुस कर हर सामने दिखने वाले को मार दिया, यहां तक कि पूरे क़िले की ज़मीन बूढ़े, जवान और बच्चों के ख़ून से रंगीन हो गई थी, इस आतंकी टोले ने उन बच्चों पर भी रहम नहीं किया जो अभी झूले में थे, हद तो यह हो गई इन वहाबियों ने मां की गोद से बच्चों को छीन कर उनके सर भी उड़ा दिए, जो ताएफ़ छेड़ जान बचा कर भाग गए थे उनका पीछा करके उन्हें पकड़ कर मार कर उन बेचारों के जिस्मों को जंगली जानवरों के आगे डाल दिया, ताएफ़ को लोगों की सारी दौलत लूट ली, और फिर तीन दिन बाद घर में छिपे बैठे हुए लोगों से पनाह का वादा करते हुए उन्हें बाहर बुलाया, लेकिन इन वहाबियों इस बार फिर विश्वासघात किया, और इन लोगों जिन में अधिकतर बच्चे और औरतें थीं उन्हें नंगा करके एक टीले पर 12 दिन तक बिना खाना पानी के रखा, बीच में कभी उनपर कोड़े भी बरसाए जाते तो कभी दूर से उनपर पत्थर फेके जाते, अंत में 12 दिन बाद ताएफ़ की ओर से प्रतिरोध करने वाले भी खाने पीने का सामान ख़त्म होने के कारण बाहर निकल आए, और वहाबियों के वादों पर एक बार फिर यक़ीन करते हुए बिना असलहे के बाहर निकल आए, वहाबियों ने इन्हें भी पकड़ के साथ उन लोगों के साथ उसी तरह टीले पर बिठा दिया, और फिर बड़ी क्रूरता से एक एक कर के सब को जान से मार दिया, और 16 दिनों तक उनके बदन को परिंदों और जानवरों के नोचने के लिए उसी टीले पर छोड़ दिया।


 
इस क़त्ले आम के बाद इन वहाबियों ने हर घर की तलाशी लेते हुए जो कुछ भी मिला उसे लूट लिया, पूरे शहर और वहां की हर चीज़ को लूटते गए, शौचालय खोद डाले, हस्तलिखित क़ीमती किताबें जैसे क़ुर्आन, तफ़सीर, हदीस, और भी बहुत से क़ुर्आनी और इस्लामी उलूम की किताबों को फ़ौजियों ने जूतों से रौंद कर उनकी क़ीमती जिल्दों (जो उस समय के हुनरमंदों की उपलब्धि थी) तक को बर्बाद कर दिया।

वहाबियों ने ताएफ़ के लोगों का बेरहमी और क्रूरता से क़त्लेआम करने और उनका सब कुछ लूटने के बाद अपने बातिल अक़ाएद की बुनियाद पर मस्जिदों, मदरसों और यहां तक कि बहुत सारे सहाबा और मशहूर उलेमा की पाक क़ब्रों उनके गुंबदों को वीरान कर दिया, और यहां तक कि कुछ सहाबियों और उलेमा क़ब्रों को खोद कर लाश की बे हुरमती की।

1343 हिजरी में एक बार फिर वहाबियों ने ताएफ़ को घेर कर ज़बर्दस्ती अंदर घुस आए और न केवल आम बूढ़ों बच्चों और औरतों मर्दों का क़त्लेआम किया बल्कि कई उलेमा और अल्लाह के नेक बंदों को भी क़त्ल किया कि जिनकी तादाद दो हज़ार तक बयान हुई है, लोगों के घरों को बर्बाद करने के अलावा ऐसे घिनावने काम किए कि जिस के सुन कर रोएं खड़े हो जाते और दिल रो देता है।

सीरिया में अत्याचार

1225 हिजरी में वहाबियों ने सीरिया पर हमला किया, वहां भी ख़ूब लूटमार मचाई, घरों को उजाड़ दिया, बे गुनाहों का क़त्ल किया, राशन के भंडारों में आग लगा दी, औरतों को क़ैदी बना लिया, बच्चों तक को भी क़त्ल कर दिया।

जार्डन में अत्याचार

1343 हिजरी में वहाबियों के टोले ने जार्डन के उम्मुल अमद और उस के आस पास के इलाक़े पर अचानक हमला कर दिया, वहां भी न जाने कितने बे गुनाह लोगों को बे रहमी से क़त्ल किया, और घरों को लूटा, फिर कुछ ही दिनों बाद लोगों के प्रतिरोध के द्वारा कुछ भाग खड़े हुए और कुछ गिरफ़्तार कर दिए, लेकिन गिरफ़्तार किए गए वहाबियों को ब्रिटिश की सिफ़ारिश के कारण आज़ाद करना पड़ा और वह अपने अड्डों पर वापिस चले गए।

1346 हिजरी में एक बार फिर वहाबियों ने 30 हज़ार की फ़ौज के साथ जार्डन पर हमला करके क़त्ल तबाही और वीरानी मचा दी।

यमन में अत्याचार

1341 हिजरी में इन्हीं वहाबियों ने बिल्कुल ही निहत्थे यमनी हाजियों से उलझ गए, वह पहले हाजियों की भीड़ मे छिप गए, लेकिन बाद में यही यमनी हाजी जब एक पहाड़ी के पास पहुंचे तो ऊपर पहाड़ी पर पहले ही से वहाबी तोप और दूसरे हथियारों के साथ मौजूद थे, उन्होंने उन सभी 1000 हाजियों को तोप से उड़ा दिया, केवल 2 लोग थे जो उस समय वहां से भागने में कामयाब रहे जिन्होंने वहाबियों के इस क्रूरता और बेरहमी से क़त्ल किए जाने को सारी दुनिया तक पहुंचाया।

वहाबियों का हज के दौरान अत्याचार और हाजियों का हज तर्क करना

1219 हिजरी में वहाबियों द्वारा हाजियों के रास्ते और अरफ़ात में बाधाएं पैदा कीं, और इन वहाबियों ने मक्के को इस प्रकार घेर लिया कि कोई भी मुसलमान काबे की ज़ियारत तक नहीं कर सका, 1220 हिजरी में जब वहाबियों ने मक्का शहर पर क़ब्ज़ा कर लिया तो इराक़ के मुसलमानों पर हज और अल्लाह के घर और उसके रसूल की क़ब्र की ज़ियारत पर पाबंदी लगा दी।

1221 हिजरी में वहाबियों के एक दूत ने सीरिया के हाजियों के टूर लीडर के पास आया और कहा कि क्योंकि तुम्हारे ऊंटों पर महमिल हैं इसलिए तुम न ही मक्का में दाख़िल नहीं हो सकते हो और न ही हज कर सकते हो, जिसके कारण सीरिया के हाजी उस साल बिना हज किए वापिस चले गए।

1221 हिजरी में सऊदी के वहाबी बादशाहों ने मिस्र के लोगों की महमिलों में आग लगवा दी थी, और हज ख़त्म होने के बाद सऊदी बादशाहों ने अपने लोगों से ऐलान करवा दिया कि अब से जो दाढ़ी कटवाएगा उसे हज नहीं करने दिया जाएगा, और फिर क़ुर्आन की आयत की ग़लत तफ़सीर करते हुए सभी मुसलमानों को मुशरिक और नजिस कहा, उसी साल से सीरिया और मिस्र के हाजियों के ऊपर शिर्क का आरोप लगा कर हज अंजाम देने और अल्लाह के घर की ज़ियारत करने से रोक दिया।

इस प्रकार से 1220 हिजरी से इराक़ के हाजी, 1221 से सीरिया के हाजी और 1222 से मिस्र के हाजियों का हज रुक गया, इसके बाद 4 साल तक इराक़, 3 साल तक सीरिया और 2 साल तक मिस्र के मुसलमान हज करने से वंचित रहे, और फिर 1224 हिजरी में सऊदी की पहली वहाबी हुकूमत का पतन हुआ जिस से मक्का और मदीना जैसे पवित्र शहर इन नजिस वहाबियों के चंगुल से आज़ाद हो गए और एक बार फिर पहले की तरह हज करने की आज़ादी मिल गई।

कुछ सालों बाद फिर ब्रिटिश के हस्तक्षेप से एक बार फिर सन 1924 ईस्वी में वहाबी हुकूमत के नजिस वजूद से मक्का और मदीना जैसे पाक शहरों में आतंक का सिलसिला शुरू हो गया, और हाजियों पर इनके अत्याचार चलते रहे और एक बार फिर विश्व के सभी मुस्लिमों को दुखी कर देने वाली घटना घटती है, और वह यह कि 1407 हिजरी में इन्हीं वहाबियों ने अपने आक़ाओं अमरीका और ब्रिटिश के इशारों पर ईरानी, सीरियाई और लेबनानियों पर हज ही के समय में मुशरिकों और काफ़िरों से दूरी के ऐलान के जुर्म में हमला कर देते हैं, और उन हाजियों का हज के लेबास (एहराम) में ही ख़ून बहा कर मक्का जैसे पवित्र शहर की शांति भंग कर देते हैं, और इन देशों के मुसलमानों के दिलों को ज़ख़्मी कर दिया, जिसके बाद 3 साल तक इरानी हज से वंचित रहे।    

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