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वहाबियत और मैं

मेरे लिए शिया मज़हब को सही जानते हुए भी क़बूल करना बहुत बड़ा चैलेंज था, कभी कभी तो पूरी पूरी रात नींद नहीं आती थी, और मैं हर समय शिया होने के बाद आने वाली मुश्किलों के बारे में ही सोंचता रहता, मैंने शिया मज़हब के हक़ होने को समझ चुका था, लेकिन मैं अपनी कट्टरता के कारण उसे अपनाने से हिचकिचा रहा था, दिन ऐसे ही गुज़रते गए और फिर मैंने शिया मज़हब क़बूल कर लिया

विलायत पोर्टलः मेरा नाम सलमान हद्दादी है, मैं 1982 में सनन्दज में पैदा हुआ, मेरे वालिद ने मेरी मां से कहा कोई अच्छा सा दीनी नाम इसका रख दो, मेरी मां सीरिया में शिया घराने में पैदा हुई थीं, इमाम अली अ.स. से बहुत मोहब्बत करती थीं, उन्होंने मेरा नाम सलमान रख दिया।

मैं अपने इसी नाम के साथ बड़ा हुआ लेकिन मैं अपने इस नाम को पसंद नहीं करता था, न जानें क्यों मुझे इस नाम से शर्मिंदगी महसूस होती थी, और अपनी वालिदा के शिया होने की वजह से बहुत बुरा महसूस करता था, अपने वालिद की नसीहत पर अमल करते हुए मैंने स्कूल के साथ मदरसे की किताबें भी पढ़ना शुरू कर दीं, हाई स्कूल करने के बाद मैं मदरसे की पढ़ाई पूरी करने के लिए ज़ाहेदान शहर और मक्की नामी मस्जिद गया, मोलवी बनने के बाद पाकिस्तान में 4 महीने की क्लासेज़ के लिए गया जिसका विषय यह था कि तबलीग़ में लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया जाए, वहां से लौटने के बाद मैं ने किरमान शाह शहर की यूनिवर्सिटी में दाख़िला लिया और आगे की पढ़ाई करने लगा, पाकिस्तान में हमें इब्राहीम नेजाद द्वारा 20 क्लासेज़ पर आधरित विशेष ट्रेनिंग दी गई थी कि किस तरह हम 5 मिनट में सामने वाले को वहाबियत की ओर आकर्षित करें।

मुझे वहां एक शिया दोस्त महदी रेज़ाई नाम का मिला, वह बहुत हंसमुख मिलनसार और अक़ीदे का पक्का इंसान था, मैं हमेशा उस से कहा करता था तुमको अफ़सोस नहीं होता इतने अच्छे अख़लाक़ के बावजूद तुम शिया हो? वह कभी थोड़ा नाराज़ होता कभी नहीं, और कभी पलट के बस इतना कहता कि तुम को अपने वहाबी होने पर अफ़सोस नहीं होता?

शिया होने से पहले इमाम अली अ.स. को एक आम इंसान ही समझता था, और मेरी निगाह में वह एक ऐसे इंसान थे जिन्होंने आएशा और माविया के विरुध्द जंग की थी, लेकिन शिया होने के बाद उनकी शख़्सियत ऐसी हो गई कि जो कुछ भी उनकी फ़ज़ीलत में कहा जाए सुनना अच्छा लगता है, और इतनी मोहब्बत है उनसे कि उनकी हर बात पर अमल करता हूं।

मेरी उस शिया लड़के से दोस्ती को 4 महीने हो गए थे, वह हमेशा कहा करता था कि कम से कम एक दिन इमाम हुसैन अ.स. की मजलिस में आओ, मैं वहाबियों की तरह लंबी दाढ़ी और वही वहाबी उलमा के हुलिये में था इसलिए मेरे जाना बहुत सख़्त था, मैंने उस से कहा यह क्या कुफ़्र बक रहे हो? उसने कहा कि एक बार आ के क़रीब से देखे तो, उसके बार बार आग्रह करने पर एक बार मैं इमाम हुसैन अ.स. की मजलिस में चला गया।

मैं अपने दोस्त के साथ शबे आशूर की मजलिस में गया, और थोड़ी हिचकिचाहट के साथ एक किनारे बैठ गया, फिर देखा एक बुज़ुर्ग सैय्यद मिंबर पर गए (जो उस समय किरमान शाह शहर में आयतुल्लाह ख़ामेनई के वकील थे) उन्होंने अपनी तक़रीर के बीच में कहा कि तुम में से कौन यह जानते हुए कि उसके मरने के बाद उसके बीवी बच्चे क़ैद कर लिए जाएंगे अल्लाह की राह में शहीद हो सकता है? उस समय इमाम हुसैन अ.स. ने ऐसा क्या देखा जो सब कुछ जानते हुए भी ख़ानदान वालों को क़ैद होने का यक़ीन रखते हुए भी अल्लाह की राह में कुर्बानी देने का फ़ैसला किया?

मैंने बहुत सोंचा, ध्यान दिया लेकिन इतिहास में मुझे इमाम हुसैन अ.स. के अलावा कोई दूसरा नाम नज़र नहीं आया, और अब यही सवाल बन कर मेरे दिमाग़ में घूमने लगा।

मैं उसी समय से केवल यही सोंच रहा था कि क्यों किसी ने इमाम हुसैन अ.स. के मिशन को नहीं समझा और उनका साथ नहीं दिया, उनके मजलिस पढ़ने के बाद अंधेरे ही में सब मातम करने लगे लेकिन मैं मातम नहीं कर रहा था, मुझ से रहा नहीं गया मैं वहीं बैठ कर इमाम हुसैन अ.स. पर किए गए ज़ुल्म को याद कर के बहुत रोया, फिर मुझे अपने फ़िर्क़े वालों (वहाबियत) पर बहुत ग़ुस्सा आया कि वह क्यों हमें इमाम हुसैन अ.स. को सही तरीक़े से पहचानने से रोकते हैं, मुझे बहुत हताशा हो रही थी, ख़ुद पर भी बहुत ग़ुस्सा आ रहा था कि क्यों अभी तक मैंने इमाम हुसैन अ.स. को सही से नहीं पहचाना, लेकिन क्योंकि हम लोगों से कहा गया था कि शिया अपने मज़हब को सच साबित करने के लिए झूठ को भी सच बता देते हैं इसलिए शिया और उनके मज़हब से दूर ही रहता था, मैं शिया मज़हब के अलावा हर मज़हब क़बूल करने को तैय्यार था।

इमाम हुसैन अ.स. की मजलिस में जाकर मेरे दिमाग़ मे जो सवाल और विचार पैदा हुए उन्ही के कारण मैंने सभी फ़िर्क़ों हनफ़ी, हूबली, मालिकी और शाफ़ेई के विचारों को बहुत ध्यान दे कर पढ़ा, इन सबके विचारों को पढ़ कर मुझे क़रीब सभी एक जैसे ही लगे, फिर मैंने मसीहियत के विचारों पर ध्यान दिया उसमें भी मुझे कुछ ख़ास नहीं दिखाई दिया, Zoroastrianism के विचारों को भी पढ़ा वहां से भी मेरे सवालों के जवाब नहीं मिले, यहां तक शैतान परस्तों की किताबों को भी पढ़ डाला लेकिन मेरे सवालों के जवाब कहीं नहीं मिले, जिस मज़हब को भी पढ़ रहा था उसके आलिमों से बातचीत भी कर रहा था ताकि किताबों की लिखी बातों का सही मतलब समझ सकूं, और किताब और उलमा दोनों की बातों में टकराव न दिखाई दे, मुझे हर दीन और मज़हब की किताबों और उनके आलिमों की बातों में टकराव नज़र आया। (मुझे इस तलाश में 4 साल लग गए थे)

मैं बहुत सावधानी से शिया फ़िर्क़े के विचारों और किताबों को पढ़ रहा था, यहां तक कि मैं बहुत सारे सवाल ले कर क़ुम शहर की ओर चल पड़ा, वहां मैं आयतुल्लाब बहजत के दफ़्तर गया और अपने दिल में मौजूद बहुत सारे सवाल और संदेह को वहां बयान किया, उन लोगों ने भी पूरे हौसले और बड़ी विनम्रता से सभी सवालों के जवाब दिए।

फिर मैंने उन लोगों से कुछ ऐसी किताबों के बारे में पूछा जिनसे मुझे शिया मज़हब के बारे में और ज़्यादा मालूमात हो सके, उन लोगों ने अल-मुराजेआत और शबहाए पेशावर के नाम बताए, मैंने उन किताबों को ले कर उन्हें पढ़ना शुरू कर दिया।

मैं उन दोनों किताबों को पढ़ रहा था और जहां भी किसी सुन्नी किताब के हवाले से बात लिखी होती मैं तुरंत उस सुन्नी किताब को देखता, मुझे हैरत हो रही थी कि शिया किताबों में नक़्ल की गई सभी हदीसें और रिवायतें सही निकल रही थी, अब मेरे दिमाग़ में यह सवाल घूम रहा था कि जब यह हदीसें रिवायतें सुन्नी किताबों में भी हैं तो अब तक क्यों इन्हें हमारी निगाहों से दूर रखा गया।

मैं इन किताबों को पढ़ कर बहुत प्रभावित हुआ, 6 महीने इन किताबों को बहुत ध्यान से पढ़ कर सोंच रहा था कि जिन शियों को पिछले इतने सालों से काफ़िर कह रहा था क्या इन किताबों को पढ़ने के बाद इनको काफ़िर कहने का कोई बहाना रह जाता है? मतलब यह कि 20 साल से ज़्यादा हम ग़लत रास्ते पर चल रहा थे?

मेरे लिए शिया मज़हब को सही जानते हुए भी क़बूल करना बहुत बड़ा चैलेंज था, कभी कभी तो पूरी पूरी रात नींद नहीं आती थी, और मैं हर समय शिया होने के बाद आने वाली मुश्किलों के बारे में ही सोंचता रहता, मैंने शिया मज़हब के हक़ होने को समझ चुका था, लेकिन मैं अपनी कट्टरता के कारण उसे अपनाने से हिचकिचा रहा था, दिन ऐसे ही गुज़रते गए और फिर मैंने शिया मज़हब क़बूल कर लिया, फिर मैंने एक किताब क्या शिया मज़हब हक़ है? के नाम से लिख कर छपवाई, जिस में मैंने सुन्नी किताबों से शिया मज़हब के हक़ होने को साबित किया है, उस की एक कॉपी किसी ने मेरे वालिद को यह कह कर दी कि यह तुम्हारे बेटे ने लिख कर छपवाया है।

मेरे वालिद ने मुझ से पूछा क्या शिया हो गए हो?

मेरी हां कहने की हिम्मत नहीं हो पा रही थी और तक़िय्यह के बारे में ज़्यादा कुछ पता नहीं था।

इसलिए मैंने बहुत धीरे से अपने वालिद के जवाब में कहा कि अगर अल्लाह ने क़बूल किया तो।

मेरे वालिद ने कहा कि तुम को धोका दिया गया है।

मैंने ने जवाब में कहा, मैंने ने कई साल तक यही लोगों से कहा है कि शियों के धोके में मत आना, आज अब यह मुझ से कह रहे हैं कि धोका खा गया हूं?

मैं वहीं बैठ कर अपने वालिद से बहस करने लगा, अहले बैत अ.स. की मदद से सहीह बुख़ारी और सहीह मुस्लिम की हदीसों से उनके सवालों के जवाब देने में कामयाब हो गया, उसी समय मेरे वालिद के कुछ दोस्त भी आए हुए थे उनसे भी मैंने बहस की और अल्लाह को शुक्र मुझे ही कामयाबी मिली।

फिर मैंने कहा कि मैं कुर्दिस्तान और सनन्दज ही में तो था, मैंने किसी शिया से यह बातें नहीं सीखीं, यह सब आपकी अपनी किताबों से हैं, मैंने 6 महीने में अहले बैत अ.स. की मदद से 18 लोगों से बहस की और उनमें से अधिकतर शिया हो गए।

मैं केवल उनकी किताबों से वही हदीस और रिवायत पढ़ रहा था जो सनद के एतेबार से सही हों, उन लोगों के पास जब जवाब नहीं होता तो या वह आरोप लगाते या गालियां देते थे, मुझे हंसी आ रही थी क्योंकि उन्हीं लोगों ने सालों मुझे यही सिखाया था कि जब देखना जवाब नहीं बन पा रहा तो या ख़ुद उन्हीं पर आरोप लगा देना या गालियां दे देना लेकिन उनको अपने ऊपर हावी मत होने देना, आज वह वही तरीक़ा मेरे साथ अपना रहे थे।

जब देखा बातचीत और बहस और यहां तक कि आरोप और गालियों से काम नहीं चला तो मेरे वालिद ने मुझे लालच दे कर मुझ से कहा कि तुम्हारे कौन सी गाड़ी है, मैंने कहा XANTIA तो उन्होंने कहा इसे किनारे रख दो मैं तुम्हारे लिए MAXIMA ख़रीद दूंगा लेकिन अब यह शिया शब्द तुम्हारे मुंह से न निकले, उनका मतलब यह था कि शिया रहो, जो चाहे करो लेकिन शिया मज़हब को फैलाओ मत। 

मैंने हंस कर अपने वालिद से कहा मुझे MAXIMA नहीं चाहिए।

वह 6 महीने तक मुझे परेशान करते रहे, बहुत तकलीफ़ें दीं लेकिन मेरे पास बर्दाश्त करने के अलावा कोई चारा नहीं था, मेरी ज़िंदगी बहुत दुख भरी हो गई थी, मैंने अपनी बीवी जोकि सुन्नी थी जल्दी ही शिया हुई थी और प्रेगनेंट थी उस से कहा कि ऐसे ज़िंदगी नहीं गुज़ारी जा सकती, मैं तेहरान कोई काम ढ़ूंढ़ने जा रहा हूं, वहां जा कर कोई घर तलाश करूंगा फिर तुम को आ कर ले जाऊंगा।

मैं घर से बाहर निकला, मैंने देखा कि मेरे वालिद कुछ लोगों के साथ गली की मोड़ पर खड़े हैं, वह समझ चुके थे कि मैं अब यह शहर छोड़ने वाला हूं, मेरी बीवी ने कहां मैं गली तक आपके साथ आना चाहती हूं, मैंने मना किया, लेकिन देखा जब उसका इसरार है तो मैंने अनुमति दे दी, मैं जब उन लोगों तक पहुंचा तो उन्होंने मेरा रास्ता रोका, और फिर वह 5-6 लोग एक साथ मुझे मारने लगे, उनमें से एक के हाथ में एक डंडा था जैसे ही उसने मेरे सर पर मारा मैं बेहोश हो गया।

मेरी बीवी मुझे बचाने के लिए उन्हें रोक रही थी तभी उनमें से एक ने उसको एक लात मार दी जिसके कारण मेरा 4 महीने का बच्चा पेट में ही मर गया, अल्लाह का शुक्र मैंने ने वह मंज़र अपनी आंखों से नहीं देखा।

मेरे लिए चैलेंज बढ़ते ही जा रहे थे कि शिया मज़हब को सच मानते हुए कैसे उसे क़बूल करें, रातों की मेरी नींदें उड़ चुकी थीं, पूरी पूरी रात केवल उन कठिनाइयों के बारे में सोंचा करता था जो शिया होने के बाद आ रही थीं, शिया मज़हब को हक़ समझ चुका था लेकिन लोगों की कट्टरता उसको अपनाने से रोक रही थीं।

उस हादसे के बाद लोगों ने पुलिस को फ़ोन किया फिर एमंबुलेंस आई......

मुझे जब होश आया और पता चला मेरा बच्चा पेट में ही मार डाला गया मुझे उसी समय इमाम अली अ.स. की मज़लूमी जो कुछ ही समय पहले पढ़ी थी याद आ गई, कि उनकी आंखों के सामने हज़रत ज़हरा स.अ. का अपमान किया जा रहा था और वह इतने मज़लूम थे कि ज़ालिमों को अपमान से रोक नहीं पा रहे थे, कोई सोंच भी नहीं सकता कि उन पर क्या गुज़री होगी, बेशक वह दुनिया के सबसे पहले मज़लूम थे।

मेरे सर पर इतनी ज़ोर से चोट लगी थी कि 3 दिन बाद होश आने पर भी बोल नहीं पा रहा था। (आज तक मैं उसके लिए दवा खा रहा हूं)

हम दोनों रात में अस्पताल से भाग गए, और किसी तरह से हम लोग उरूमिया शहर पहुंचे, वहां हम अपने एक दोस्त के घर गए, सारी घटना उसको बता दी, आख़िर में मैंने कहा कि जो कुछ था सब छोड़ कर हम लोग तुम्हारे पास आए हैं, हमारी मदद करो और एक घर किराए पर मेरे लिए ले लो।

सबसे से आश्चर्य की बात यह कि उसको सुन्नी मज़हब तक के बारे में कुछ नहीं पता था, अबू बक्र और उमर को जानता तक नहीं था, इमाम अली अ.स. के बारे में भी कुछ नहीं जानता था, यहां तक कि नमाज़ कितने रकअत है यह भी उसको नहीं मालूम था लेकिन वहाबियत का ज़हर इस हद तक उसके दिमाग़ में घोला जा चुका था कि वह मुझ से कहता है कि तुम ने 1 हज़ार क़त्ल किए होते या और कोई भी बड़ा जुर्म किया होता तो मैं तुम्हारी मदद कर देता, लेकिन तुम शिया हो गए हो इसलिए मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता।

यही वह समय था जब ज़िंदगी में पहली बार बीमार बीवी जिसका बच्चा उसके पेट में मार दिया गया था उसके साथ रोड के किनारे फुटपाथ पर सोया।

थोड़े बहुत पैसे जो जेब में थे उसके द्वारा मैं क़ुम पहुंचा, वहां चूंकि न किसी को जानता था न ही कोई रहने की जगह थी इसलिए 45 दिन जमकरान मस्जिद में रहा, भूख प्यास परेशान कर रही थी लेकिन जब इमाम हुसैन अ.स. और आपके बच्चों की प्यास और उनका नंगे पांव चलना याद कर लेता था अपनी भूख, प्यास और कठिनाइयां भूल जाता था।

2006 में अभी मैं जमकरान ही में था, हालात ऐसे हो गए थे कि मेरे जूते भी फट चुके थे और जेब मे कहीं जाने के लिए किराए तक के पैसे नहीं बचे थे, मैंने काग़ज़ क़लम उठाया और एक ख़त इमाम ज़माना अ.स. को लिखा कि मौला बहुत परेशान हूं, आप ही के लिए सब कुछ छोड़ कर चला आया हूं।

इमाम ज़माना अ.स. के दर पर था इसलिए खाने का कहीं न कहीं से इन्तेज़ाम हो जाता था, कभी किसी की तरफ़ से नज़्र का इन्तेज़ाम रहता कभी किसी मजलिस में खाने का तबर्रुक कभी कोई और दूसरा इन्तेज़ाम, लेकिन इमाम के दर पर भूखा नहीं था।

रातों मे अख़बार बिछा कर सोते थे, एक दिन जमकरान की security जो कई दिन से मेरे ऊपर निगाह रखे हुए था मेरे पास आया और कहा, अपना identification card दिखाओ, कौन हो तुम?

मैंने अपना कार्ड दिखाया उसने कार्ड पर सनन्दज का पता देख कर कहा तुम यहां क्या कर रहे हो?

मेरी ज़बान अभी भी लुकनत कर रही थी उसी लुकनत करती ज़बान से कहा हम शिया हुए हैं।

उसने कहा तुम ने कोई ग़लत काम नहीं किया, क़ुम में रहने का कोई इन्तेज़म है?

मुझे मना करते हुए शर्म आई, मैंने कहा हां एक जगह है, वह गया और 20 मिनट बाद वापस आ कर 30 हज़ार तूमान (ईरानी करंसी) देते हुए पूछने लगा कि इतने में अपने घर पहुंच जाओगे?

मैंने कहा मुझे पैसे नहीं चाहिए।

उसने कहा हम शिया बे ग़ैरत नहीं हैं कि हमारे घर की औरतें सड़क पर सोएं।

मैंने वह पैसे ले लिए, 2 महीने से ज़्यादा हो चुके थे न मैं नहाया था और न ही बाल कटवाए थे, मैंने उन पैसे से बाल कटवाए नहा धो कर हज़रत मासूमा स.अ. के रौज़े पर जाने की तैय्यारी करने लगा, हम ने हज़रत मासूमा स.अ. के दर पर भी बहुत गिड़गिड़ा कर दुआ की, कि हमने आप और आपके अजदाद की ख़ातिर शिया हुए हैं और आपके दर पर फ़रियाद ले कर आए हैं कि न हमारे पास कोई जगह है न यहां के बारे में कुछ पता है हम केवल आपको जानते हैं।

हम उन पैसों से रोज़ बहुत मामूली खाना ले कर खाते रहे, कई दिन वहीं दुआ करते रहे, एक दिन मैंने रौज़े की security से मदद मांगी, कहा कि हम शिया हुए हैं लेकिन हमें नहीं मालूम क्या करें कहां जाएं।

हमारे पास थोड़े पैसे थे जिसकी वजह से क़ुम आ गए, क्योंकि क़ुम में न मेरा कोई जानने वाला था न ही मेरे पास घर था इसलिए 45 दिन जमकरान में गुज़ारे, मैंने पूरी घटना उसको बता दी।

उसने मुझे रोड की ओर इशारा करते हुए कहा इस तरफ़ चले जाओ उधर मराजे के दफ़्तर हैं वहां तुम्हारी मदद ज़रूर करेंगे।

मैं पहले आयतुल्लाह मकारिम के दफ़्तर गया, उसके बाद आयतुल्लाह ख़ामेनई के दफ़्तर गया, वहां एक साहब बैठे थे, मैंने पूरी घटना उको बताई जिससे मेरी बीवी भी रोने लगी थी।

उसने हमारी हालत को देख कर हम से बहुत प्यार और विनम्रता से बात की और कहा कि अगर तुम लोग क़ुम में रहना चाहते हो तो हम तुम्हारे लिए किसी घर का इन्तेज़ाम कर दें।

मैंने कहा नहीं हम लोग उरूमिया वापस जाना चाहते हैं और वहां के मदरसे में कोई नौकरी कर लेंगे।

उन्होंने कहा ठीक है, और फिर कुछ पैसे हमको दिए और हम वहां से चले आए।

बाहर निकल कर मैंने अपनी बीवी से कहा कि यहां तक आ गए तो चलो इमाम रज़ा अ.स. की ज़ियारत कर के फिर अपने वतन उरूमिया वापस चलेंगे।

हम लोग मशहद गए वहां ज़ियारत की और इमाम अ.स. की बारगाह में अपनी हालत बता कर बहुत रोए।

ध्यान देने की बात यह है कि मशहद में हम लोगों को 3-4 साल गुज़र गए और पता तक नहीं चला, हालांकि मेरी बीवी की तबियत ख़राबी और इन सब हालत की वतह से 14 किलो वज़न कम हो गया था, और वह बहुत depression में रहने लगी थी।

धीरे धीरे समय गुज़रता गया, अब मैं मशहद के मदरसे में पढ़ने लगा था, मैं ने शियों की क्लास में पढ़ाई जाने वाली किताबें पढ़नी शुरू कर दी, फिर कुछ समय बाद हम लोग क़ुम आ गए, और कुछ दोस्तों की मदद से एक घर रहने को मिल गया।

मेरे लिए जो सबसे यादगार है वह जमकरान में मुझे मिले हुए 30 हज़ार तूमान हैं, मैंने उस security जिस ने वह पैसे दिए थे बहुत तलाश किया लेकिन अभी तक वह साहब नहीं मिल सके। (क्योंकि मेरे लिए वह 30 हज़ार तूमान इतनी बरकत वाले थे कि अभी तक वह ख़त्म नहीं हुए)

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