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वहाबियत और दाइश के बीच समानता और मतभेद

उस्मान इब्ने बशर अल-नज्दी (सऊदी की हुकूमत का इतिहासकार) वहाबियों द्वारा कर्बला में किए गए हमलों की आलोचना करने वालों के जवाब में गर्व से कहता है कि, अल्लाह का शुक्र अदा करो कि हम ने कर्बला पर क़ब्ज़ा कर लिया, वहां के लोगों की गर्दनें काट दीं, और कुछ लोगों को गिरफ़्तार कर लिया, और हमें अपने इस काम पर किसी तरह की कोई शर्मिंदगी नहीं जिसके लिए हम माफ़ी मांगें।

विलायत पोर्टलः  कट्टरता और अतिवाद को नज्द (रियाज़ शहर के आस पास के इलाक़ों) में ढ़ूंढ़ना चाहिए, क्योंकि पैग़म्बरे इस्लाम स.अ. की वफ़ात के बाद इस जगह को राजनिती, कट्टरता और अतिवाद का गढ़ कहा जाता था, और ऐसा इसलिए क्योंकि पैग़म्बर के जीवन ही में बहुत से नज्दियों ने दीन छोड़ दिया था और मुरतद हो गए थे, और उनका दीन का छोड़ देना और दीन से दुश्मनी इस हद तक पहुंच गई थी कि इन लोगों ने इमाम अली अ.स. के विरुध्द भी विद्रोह किया और ख़्वारिज के नाम से मशहूर हुए, और अपनी इस कट्टरता को छिपाने के लिए ला हुक्मा इल्ला लिल्लाह (हुकूमत केवल अल्लाह का हक़ है) का नारा लगाया, और इसी नारे की आड़ में इराक़ और ईरान के मुसलमानों का बेरहमी से ख़ून बहाया, और उनकी जान लेने को जाएज़ ऐलान किया, और इस प्रकार कुछ लोगों के द्वारा उनकी हिंसा में कट्टरता दीन और मज़हब से जोड़ कर देखी जाने लगी, और इन लोगों की पहचान कट्टरता, हिंसा और अतिवाद के नाम से होने लगी।
कुछ समय बाद नज्द के लोगों ने अपने विद्रोह और क्रांति को दूसरी जगहों पर फैलाना शुरू कर दिया, और इस कारण इराक़ और सीरिया पर इन लोगों ने हमले किए और मिस्र के बार्डर तक पहुंच गए, इनकी कट्टरता और बर्बरता का हाल यह था कि अल्लाह का घर काबा भी उनके हाथों से नहीं बच सका, फिर यह बालाबक्क नामी शहर की ओर गए, वहां जिसे भी बनी हाशिम के ख़ानदान से पाते उसे क़त्ल कर देते थे।
समय गुज़रता रहा, यह लोग इसी तरह हिंसा और कट्टरता दिखाते रहे, यहां तक कि मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब अपने जैसी ही सोंच और विचार रखने वाले इब्ने सऊद के हाथ में हाथ दे कर मैदान में आ गया, इन दोनो की पहचान और इनका नारा ख़ून बहाओ, लूटो, सर काट लो इनकी पहचान के लिए काफ़ी है।
यही कारण बना कि आले सऊद के द्वारा किए जाने वाले हर अत्याचार, पाप, क्रूरता, लूटपाट और पाखंड को मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब यह कह के जाएज़ कह देता कि यह सब मुसलमान नहीं काफ़िर और मुरतद हैं इनकी जान ले लेना ही दीन और मज़हब का हुक्म है, और मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब इस हद तक इस काम मे लग गया था कि लगता था कि इसका केवल यही काम हो।
इस तरह देखा जा सकता है कि नौजवानों की मानसिकता को किस प्रकार बदला जा रहा है, वहाबी उलेमा ने भी कोई कसर नहीं छोड़ी और तरह तरह के फ़तवे दे कर मुसलमानों में मतभेद को बढ़ावा दिया, जैसे यह कि जो भी वहाबी नही है उसका क़त्ल जाएज़ है, क्योंकि मुसलमान केवल वहाबी है उसके अलावा सब मुशरिक और काफ़िर हैं।
वहाबियत और दाइश में समानताएं
उस्मान इब्ने बशर अल-नज्दी (सऊदी की हुकूमत का इतिहासकार) वहाबियों द्वारा कर्बला में किए गए हमलों की आलोचना करने वालों के जवाब में गर्व से कहता है कि, अल्लाह का शुक्र अदा करो कि हम ने कर्बला पर क़ब्ज़ा कर लिया, वहां के लोगों की गर्दनें काट दीं, और कुछ लोगों को गिरफ़्तार कर लिया, और हमें अपने इस काम पर किसी तरह की कोई शर्मिंदगी नहीं जिसके लिए हम माफ़ी मांगें।
इनका इस प्रकार खुलेआम अपनी हैवानियत पर शर्मिंदा न होना दर्शाता है कि, वह केवल अपने आप को मुसलमान समझते हैं, और जो भी इनके सिध्दांत और विचारों का विरोध करे वह मुसलमान नहीं है, यही वह विषय था जिस पर मोहम्मद इब्ने अब्दुल वहाब अधिक ज़ोर देकर कहता था।
इब्ने अब्दुल वहाब ने सभी शियों के काफ़िर होने का फ़तवा दिया, और उनके बसने की जगहों को कुफ़्र और जंग की धरती ऐलान किया, वह ज़ोर देकर कहता था कि, बेशक वह भी अल्लाह की तौहीद और पैग़म्बर को नबी मानते हैं, और जुमे की नमाज़ और जमाअत से नमाज़ पढ़ते हैं, लेकिन शरीअत में हमारा उन से काफ़ी अंतर है, इसी कारण हम उनको काफ़िर समझते हैं और जंग का ऐलान करते हैं, हम उन से जंग करेंगे, इस प्रकार इसने सभी शियों को काफ़िर ठहरा कर उनके क़त्ल को जाएज़ ठहरा दिया।
इन तकफ़ीरी टोलों की एक और दृष्टि यह है कि, यह लोग वहाबियत की बुनियाद रखने वाले इब्ने अब्दुल वहाब की पैरवी करते हुए कहते हैं कि, जो कुछ क़ुर्आन और दीनी किताबों से हम समझ रहे हैं केवल वही सही है, इसीलिए जो भी उनके विचारों के अलावा कोई विचार पेश करे उसे यह लोग काफ़िर कह कर दीन से ख़ारिज कर देते हैं, यह केवल दावा नहीं है बल्कि उनकी सभी मज़हबी किताबों में ज़ोर दे कर कहा गया है कि जो भी मुसलमान उनके विचारों को न माने वह काफ़िर और दीन से ख़ारिज है, उसको सज़ा दी जानी चाहिए, और सज़ा यह है कि, उसका माल उसकी जान और मान मर्यादा सब हलाल हो जाती है।
ऐसी परिस्तिथि में न केवल इस्लाम का असली चेहरा दुनिया तक नहीं पहुंच पाता बल्कि इस्लाम को एक विशेष गुट और संगठन के कामों की रौशनी में देखा जाता है, जिसके कारण न तो इस्लाम की सही शिक्षा लोगों तक पहुंच पाती हैं और न ही इस्लाम के असली चेहरे को दुनिया वाले पहचान पाते हैं।
वहाबियों और दाइश में मतभेद
ऊपर बताई गई समानताओं के साथ साथ कुछ मतभेद भी इन गुटों में पाए जाते हैं, जैसे वहाबियों ने अपने प्रचार को केवल हेजाज़ की हदों तक सीमित कर रखा था यह और बात है कि हेजाज़ के बाहर के कुछ लोगों के प्रस्ताव को देखते हुए वहां पर भी अपना प्रचार किया, लेकिन इनका हेजाज़ के बाहर प्रचार करना दाइश के प्रचार को देखते हुए कुछ भी नहीं है, क्योंकि दाइश का अक़ीदा यह है कि जेहाद के द्वारा सभी देशों पर क़ब्ज़ा करना चाहिए और एक अलग हुकूमत बनानी चाहिए, और जितना अधिक हो सके हुकूमत को फैलाया जाए, वहाबी भी पूरी दुनिया पर राज करने का सपना रखते थे लेकिन कभी खुलेआम ज़ाहिर नहीं किया, लेकिन दाइश ने खुलेआम पूरी दुनिया पर क़ब्ज़ा करने की बात कही।
उनके अक़ाएद में भी मतभेद का देखा जा सकता है, वहाबियों के दिलों में काबे का सम्मान अभी कुछ बाक़ी है लेकिन दाइश काबे को भी ढ़हाने की बात करते हैं।
या इसी प्रकार दाइश अमेरिका और यूरोप से किसी प्रकार की बात चीत को स्वीकार नहीं करता, लेकिन वहाबी अमेरिका और यूरोप को अपना सबसे बड़ा सहयोगी समझते हैं।
ध्यान रहे भले ही दोनों के विचारों में कहीं पर मतभेद दिखाई दें लेकिन बुनियाद दोनों की एक ही है, एक गुट अमेरिका और यूरोप को अपना सहयोगी समझता है तो दूसरा न चाहते हुए उन्हीं के मक़सद को पूरा करता है, और वह यह कि मुसलमानों के बीच फूट डाल कर नफ़रतों को फैलाया जाए, इनके रोल को अमेरिका, ज़ायोनी और साम्राज्यवादी ताक़तें ही तय करती हैं।


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