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रोज़े को रोज़ा ही रहने दीजिए साहब

कहने का मतलब यह है कि अगर रोज़ा इस्लाम द्वारा बताए गए आदाब का ख़्याल रखते हुए रखा जाए तो यह एक ऐसी इबादत है जो अल्लाह से क़रीब करने के साथ साथ जिस्मानी बीमारी से भी बचाता है और रोज़ेदार को सेहतमंद रखता है, रोज़ा अगर इस्लामी आदाब के तहत रखा जाए तो रोज़ा इबादत भी है, दवा भी है और इंसान के दिल को मज़बूत और ताक़तवर बनाने का स्रोत भी, बस शर्त यही है कि रोज़ेदार अपने आस पास के माहौल की गंदगी से अपने रोज़े को बचा कर रखे और रोज़े में सुस्ती और टाल मटोल न पाया जाए

विलायत पोर्टलः यह इंसान कमज़ोर और अपने इरादों में ढ़ीला ढ़ाला है, आप अपनी ज़िंदगी में रोज़ाना यह तमाशा देखते होंगे कि एक काम ज़रूरी होने के बावजूद इरादों की कमज़ोरी के कारण टाल मटोल किया करता है और आख़िर वह काम हो नहीं पाता है, पक्का इरादा भी कोई चीज़ है साहब....., यह तो दुनिया के कामों का हाल है, हदीस में आया है कि जो दुनिया के कामों में सुस्ती करेगा वह आख़ेरत के कामों में और ज़्यादा सुस्ती करेगा, रोज़ा उन गिनी चुनी अहम इबादतों से संबंधित है कि अगर इंसान उसे इबादत न समझ कर भी अंजाम दे तब भी उसके फ़ायदे से आनंदित हो सकता है, लगभग पांच साल पहले किसी अंग्रेज़ लेखक कि एक किताब पढ़ी जिसमें रोज़े के चिकित्सीय फ़ायदे बयान किए गए थे वह लेखक साल के 6 महीने ख़ुद रोज़ा रखता है और उसके रोज़े भी हिंदुस्तान पाकिस्तान के मुसलमानों की तरह नहीं कि जिसमें तरह तरह के खाने पीने का सामान सहरी में हो और फिर इफ़्तार में चटपटी डिशें हों बल्कि वह चौबीस घंटे बिना कुछ खाए केवल पानी पर गुज़ारा करता है, यहां तक कि उनके इस नुस्ख़े के इस्तेमाल करने वालों के इंटरव्यू भी उनकी किताब में मौजूद थे जिन्होंने कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी से रोज़े के कारण छुटकारा पाया था।

कहने का मतलब यह है कि अगर रोज़ा इस्लाम द्वारा बताए गए आदाब का ख़्याल रखते हुए रखा जाए तो यह एक ऐसी इबादत है जो अल्लाह से क़रीब करने के साथ साथ जिस्मानी बीमारी से भी बचाता है और रोज़ेदार को सेहतमंद रखता है, रोज़ा अगर इस्लामी आदाब के तहत रखा जाए तो रोज़ा इबादत भी है, दवा भी है और इंसान के दिल को मज़बूत और ताक़तवर बनाने का स्रोत भी, बस शर्त यही है कि रोज़ेदार अपने आस पास के माहौल की गंदगी से अपने रोज़े को बचा कर रखे और रोज़े में सुस्ती और टाल मटोल न पाया जाए।

इस्लामी आदाब के रौशनी में रोज़ा

पहले तो रोज़े की नीयत कीजिए ताकि वह इबादत ही रहे फिर सहरी में उठिए और सहरी खाईए क्योंकि सहरी खाना मुसतहब अमल है और सहरी में शहद, दूध, रोटी, सूप जैसी ताक़त देने वाली चीज़ें खाईए और ऐसे फलों को खाईए जिसमें पानी अधिक पाया जाता है जैसे सेब, संतरा, मुसम्मी और अनानास वग़ैरह...., हालांकि नमकीन और तली हुई चीज़ों से दूरी बनाएं रखें वरना दिन के किसी हिस्से में प्यास हावी हो सकती है और डर है कि अपनी इस ग़लती का आरोप आप सीधा इस्लाम पर न लगा दें।

इफ़्तार में एहतियात

इफ़्तार के समय भूखे शेर की तरह इफ़्तारी पर न टूटिए, ठंडा पानी तुरंत न पीजिए, अगर भूख प्यास में शिद्दत ज़्यादा है तो सब्र और धीरज रखिए क्योंकि रोज़ा सब्र धैर्य और धीरज ही का नाम है, पहले गर्म पानी या नमक से मुंह नमकीन कीजिए, सस्ती मिल जाए तो दो चार खजूरें ले लीजिए और अगर आपकी जेब अनुमति दे और असली शहद मिल जाए तो शहद और गर्म पानी का शर्बत पीजिए फिर देखिए थोड़ी सी एहतियात का आपके मुबारक जिस्म पर क्या बेहतरीन असर पड़ता है और रोज़ा कितना फ़ायदेमंद नुस्ख़ा साबित होता है, हक़ीक़त में एक रोज़ेदार को इफ़्तार के समय खाने पीने में बढ़ चढ़ कर जो मज़ा मिलता है वह दिन भर खाने वालों को नहीं मिलता क्योंकि मज़े का छोड़ देना ख़ुद मज़े का कारण है, हालांकि इफ़्तार में तले भुने पकवान को ज़रा दूर ही रखिए क्योंकि यही तो मेदे को बीमारी तक पहुंचाता है और रोज़े के नेचुरल असर को रोक देता है, अल्लाह का वास्ता रोज़े को रोज़ा ही रहने दीजिए और अपने नर्म और नाज़ुक जिस्म पर तरस खाईए।

दिल की नूरानियत

रोज़ा रखिए तो चुप रहना भी सीखिए और झूठ से दूरी बनाए रखने की आदत डालिए आप अपने इस अभ्यास और प्रेक्टिस से जगमगाने लगिएगा आपकी ज़बान से इल्म और मारेफ़त के मोती झड़ने लगेंगे इस शर्त के साथ कि आपके पास पहले से कुछ इल्म भी हो, फ़ुर्सत मिले तो क़ुर्आन को जुज़दान से निकाल कर कुछ आयतों की तिलावत भी कर लें और समय मिले तो उनका तर्जुमा भी ज़रूर पढ़ें ऐसा मज़ा मिलेगा जिसे बयान नहीं किया जा सकता।

यही रोज़ा जिस्म और रूह का इलाज और रूहानियत और नूरानियत का कारण है “मानो को देव वरना पत्थर” इस्लाम तो हर तरह से ईमान वालों को फ़ायदा पहुंचाने के लिए तैयार है लेकिन फ़ारसी की कहावत है कि अगर मांगने वाला फ़क़ीर काहिल और सुस्त तो इसमें देने वाले की क्या ग़लती...।

ख़ैर... माहे रमज़ान कोई मामूली महीना नहीं है जिसे आसानी से गिनवा दिया जाए यह महीना रोज़े से पहचाना जाता है अगर आप किसी मजबूरी के कारण रोज़ा न रख सकें तो रोज़ेदार की तरह ही रहें इसमें भी आपकी ही भलाई है।

रोज़ेदारों के लिए इफ़्तार का इंतेज़ाम करें।

मस्जिदों को आबाद रखें।

सदक़ा और ख़ैरात दें।

मुत्तक़ी और परहेज़गारों का सम्मान करें।

मोमिन का ख़्याल रखें।

नेक कामों में आगे आगे रहें।

बच्चों को सलाम करें।

हुज्जतुल इस्लाम आलीजनाब मौलाना मुशाहिद आलम रिज़वी (तंज़ानिया)


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