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राष्ट्रपति पद के परिणाम आयतुल्लाह ख़ामेनई की ज़ुबानी

मैं ख़ुद अपने दूसरे राष्ट्रपति कार्यकाल के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं था, पहले दौरे में तो हम मजबूर थे उसकी कोई बात ही नहीं लेकिन दूसरी बार राष्ट्रपति पद के लिए मेरा चुनाव में उम्मीदवार होने का बिल्कुल भी इरादा नहीं था, मैंने सख़्ती के साथ मना कर दिया था कि मैं उम्मीदवार नहीं बनूंगा, लेकिन...

विलायत पोर्टलः इस्लामी जगत के महान मरजा और ईरानी सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह ख़ामेनई अपने ख़ारिज के क्लास से पहले क्लास में आने वालों के लिए मासूमीन अ.स. की हदीस की तफ़सीर बयान करते हैं, इसी सिलसिले की एक हदीस की तफ़सीर को बयान करते हुए आपने राष्ट्रपति पद या किसी भी ऊंचे पद के परिणाम की तरफ़ उसी हदीस की रौशनी में इशारा करते हुए कुछ दिलचस्प और सीख हासिल करने वाली बातें बयान कीं।

आपने अपने क्लास से पहले पैग़म्बर स.अ. की हदीस बयान की जिसमें पैग़म्बर स.अ. फ़रमाते हैं कि कोई भी शख़्स ऐसा नहीं है जिसने दस या उस से ज़्यादा लोगों पर हुक्ल चलाया हो मगर यह कि उसे क़यामत के दिन इस हालत में पेश किया जाएगा कि उसके हाथ उसकी गर्दन से बंधे होंगे, अगर वह नेक किरदार रहा होगा और अपनी ओर से कमी नहीं की होगी तो उसे आज़ाद कर दिया जाएगा लेकिन अगर बुरे किरदार वाला और गुनहगार हुआ तो उसकी ज़ंजीरों को बढ़ा दिया जाएगा। (अमाली-ए-शैख़ तूसी र.ह., पेज 246)

आप ने हदीस की तिलावत के बाद कहा कि यह हदीस मुझ जैसे लोगों के लिए है, और हदीस में तो दस लोगों पर हुकूमत की बात कही गई है, सत्तर अस्सी मिलियन लोगों पर हुकूमत करने वाले का हाल क्या होगा, और वह राष्ट्रपति या किसी इदारे या ट्रस्ट का बॉस जो दुनिया में इतनी इज़्ज़त और सम्मान के साथ रहता है उसे जब क़यामत में पेश किया जाएगा तो उसके हाथ ज़ंजीरों से गर्दन के पीछे बंधे होंगे, और उन्हीं बंधे हाथों के साथ वह महशर में लाया जाएगा, इसलिए विभाग का मुखिया होना, लोगों का हाकिम होना इन सब के कुछ परिणाम और नतीजे हैं जिन्हें एक न एक दिन सामने आना है।

दुनिया में बहुत से विभाग होते हैं जिनकी ज़िम्मेदारी हमको सौंपी जाती है हम किसी डिपार्टमेंट के हेड बनते हैं किसी बड़े पद पर होते हैं तो बहुत से काम जो हो रहे होते हैं उन्हें हम रोक सकते हैं लेकिन नहीं रोकते, चाहे वह ग़फ़लत की वजह से हो या अपनी सुस्ती की वजह से हो, कोई काम हमारी निगरानी और हमारी ज़िम्मेदारी के तहत अंजाम पाया तो अब चूंकि हम ज़िम्मेदार हैं इसलिए उस काम पर नज़र रखना हमारी ज़िम्मेदारी थी...., या इसी तरह किसी काम का होना बहुत ज़रूरी था लेकिन हमारी ज़िम्मेदारी होते हुए वह नहीं हुआ, अब चाहे हम समझ न पाएं हों या कोशिश न की हो, या मशविरा न किया हो या सवाल जवाब न किया हो, या इनमें से कोई वजह नहीं थी बल्कि हमें काम की अहमियत मालूम थी लेकिन हमने आलस किया और आज कल पर टालते रहे जिसके नतीजे में उस काम का समय निकल गया....., तो अगर हमारे पास अक़्ल है तो हमें किसी बड़े और ऊंचे पद की तरफ़ नहीं भागना चाहिए, यह हक़ीक़त है कि किसी पद के पीछे नहीं भागना चाहिए क्योंकि ज़िम्मेदारी कोई भी हो उसका नतीजा, अंजाम और परिणाम सामने ज़रूर आता है, कुछ लोग ऊंचे ऊंचे पदों के पीछे भागते हैं लेकिन उन्हें उसका अंजाम नहीं मालूम होता वह इन ऊंचे पदों और बड़ी बड़ी पोस्ट के पीछे के ख़तरों को नहीं जानते कि क़यामत में जब इन लोगों को लाया जाएगा तब इनके हाथ बंधे हुए होंगे।

अब हिसाब किताब के समय वह नेक इंसान निकला अपने काम को पूरी ज़िम्मेदारी के साथ निभाने वाला हुआ और उसके काम में किसी तरह की सुस्ती और गुनाह नहीं हुआ तो उसे रिहा कर दिया जाएगा, ज़ाहिर सी बात है कि अल्लाह के अपने नियम हैं उसका अपना मज़बूत सिस्टम है, मुमकिन है किसी मौक़े पर किसी वजह से इंसान की कमी हो लेकिन उसकी यह कमी सुस्ती और आलस की वजह से न हो, हम कभी कभी किसी काम में ख़ुद जानबूझ कर सुस्ती करते हैं आज कल पर टालते हैं और कभी अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश करते हैं लेकिन कुछ कमी रह जाती है तो ज़ाहिर है ऐसी सूरत में इस कमी को अल्लाह माफ़ कर देगा क्योंकि हमने अपनी तरफ़ से पूरी कोशिश की।

लेकिन अगर इंसान ने आलस से काम लिया और कोशिश में ही कमी रखी और ख़ुद भी बद किरदार और बे अमल रहा तो यही वह सूरत है जहां उसके हाथों को गर्दन के पीछे ज़ंजीर से बांध कर क़यामत के दिन महशर के मैदान में लाया जाएगा।

इन सारी बातों को हमें समझना चाहिए, इन सब बातों पर ध्यान देना चाहिए, ऊंचे ऊंचे पदों और कुर्सी चाहे वह प्रशासनिक मामलों में हो चाहे राजनीतिक मैदान में हो इन सब में आप देख सकते हैं कोई पार्लियामेंट में कुर्सी पाने के पीछे ख़ुद को हलाक किए है तो कोई सत्ता पाने के लिए किसी हद तक जाने को तैयार है, और अगर जीत हासिल न कर सका तो आगज़नी, पथराव और न जाने कैसे कैसे काम करता है....., यह बिल्कुल अक़्लमंदी नहीं है, यह सोंचा समझा क़दम नहीं है..., ग़ौर किया आपने? ज़ाहिर है अगर इस सत्ता और कुर्सी में ऐसी चिंताओं और चुनौतियों का सामना है तो इंसान को इसे छोड़ देना चाहिए, हां यह और बात है कि सत्ता, कुर्सी, पद और ज़िम्मेदारी को ख़ुद ज़रूरत हो उस इंसान की और उस इंसान के लिए उस ज़िम्मेदारी का क़ुबूल करना वाजिब हो तो ऐसी सूरत में इंसान का उस कुर्सी पर बैठना और उस ज़िम्मेदारी का संभालना ज़रूरी हो जाता है।

मैं ख़ुद अपने दूसरे राष्ट्रपति कार्यकाल के लिए बिल्कुल भी तैयार नहीं था, पहले दौरे में तो हम मजबूर थे उसकी कोई बात ही नहीं लेकिन दूसरी बार राष्ट्रपति पद के लिए मेरा चुनाव में उम्मीदवार होने का बिल्कुल भी इरादा नहीं था, मैंने सख़्ती के साथ मना कर दिया था कि मैं उम्मीदवार नहीं बनूंगा, लेकिन इमाम ख़ुमैनी र.ह. ने मुझ से कहा कि तुम्हारे लिए चुनाव में आना वाजिबे ऐनी (यानी जिस तरह जिस शख़्स के ऊपर नमाज़ वाजिब हो तो किसी और के पढ़ने से अदा नहीं होती उसी तरह इस चुनाव में आपका उम्मीदवार बन कर आना वाजिब है किसी और के आने से आपकी ज़िम्मेदारी अदा नहीं होगी) और वाजिबे ताईनी (यानी जिस तरह सुबह दोपहर और शाम की नमाज़ की जगह आप कुछ और नहीं कर सकते उसी तरह इस चुनाव में उम्मीदवार बन कर आने के अलावा कोई और आपशन नहीं है) दोनों है, अब इमाम ख़ुमैनी र.ह. के इस हुक्म के बाद मैंने न चाहते हुए भी इस ज़िम्मेदारी को क़ुबूल किया, हालांकि सही बात यही है कि अगर इंसान के लिए इस तरह के हालात नहीं हैं तो इंसान को दुनियावी पदों और सत्ता की कुर्सी के पीछे नहीं भागना चाहिए, लेकिन अगर किसी मजबूरी या समय की ज़रूरत की वजह से वह ज़िम्मेदारी क़ुबूल करता है तो उसे पूरी शिद्दत, मेहनत और लगन के साथ उस ज़िम्मेदारी को पूरा करना होगा।


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