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रमज़ान और हमारी ज़िम्मेदारी

रमज़ान दुआ और मुनाजात का बेहतरीन मौसम है, जिस समय रोज़ा रखने वाला इंसान अल्लाह की बारगाह में दुआ के लिए हाथ उठाता है यह उसके जीवन के सबसे प्यारे क्षणों में से एक होता है, पैग़म्बर इस मुबारक महीने में दुआ करने के बारे में फ़रमाते हैं, ऐ लोगों रमज़ान के महीने और नमाज़ के समय अपने हाथों को दुआ के लिए उसकी बारगाह में फैलाओ क्योंकि यह तुम्हारे जीवन के सबसे महत्वपूर्ण क्षण हैं, जिसमें अल्लाह मुहब्बत भरी निगाहों से अपने बंदों की ओर देखता है।

विलायत पोर्टलः 
1.    दुआ और मुनाजात: दुआ का मतलब अल्लाह को पुकारना और उस से मदद माँगना है, यानी जीवन के हर मोड़ दुख, सुख, आराम, कठिनाई हर मौक़े पर उस को याद करना, अल्लाह इस बात को पसंद करता है कि उसका बंदा उसे पुकारे और वह उसकी समस्या को हल करे, उसने ख़ुद क़ुर्आन में फ़रमाया, ऐ पैग़म्बर इन से कह दो कि अगर दुआ नहीं करोगे तो मेरा परवरदिगार तुम्हारी ओर कोई तवज्जोह नहीं देगा। (सूरए फ़ुरक़ान, आयत 77)
अहले बैत अ.स. द्वारा रमज़ान के दिन और रात की बताई गई दुआएँ और मुनाजातें रमज़ान की महत्वपूर्णता को सही प्रकार बताती हैं, और अल्लाह की नेमतों और उसके जलाल व जमाल को लोगों के सामने ज़ाहिर करती हैं, जिनको किसी दूसरे धर्म में नही देखआ जा सकता।
रमज़ान दुआ और मुनाजात का बेहतरीन मौसम है, जिस समय रोज़ा रखने वाला इंसान अल्लाह की बारगाह में दुआ के लिए हाथ उठाता है यह उसके जीवन के सबसे प्यारे क्षणों में से एक होता है, पैग़म्बर इस मुबारक महीने में दुआ करने के बारे में फ़रमाते हैं, ऐ लोगों रमज़ान के महीने और नमाज़ के समय अपने हाथों को दुआ के लिए उसकी बारगाह में फैलाओ क्योंकि यह तुम्हारे जीवन के सबसे महत्वपूर्ण क्षण हैं, जिसमें अल्लाह मुहब्बत भरी निगाहों से अपने बंदों की ओर देखता है।
इसी प्रकार इमाम अली अ.स. फ़रमाते हैं, रमज़ान के महीने में अधिक दुआएँ और इस्तेग़फ़ार करो, क्योंकि तुम्हारी दुआएँ तुम्हारी परेशानियों और तुम्हारा इस्तेग़फ़ार करना तुम्हारे गुनाहों को ख़त्म करेगा।
2.    गुनाहों से तौबा: रमज़ान गुनाहों से तौबा करके अल्लाह की बारगाह में वापिस आने का महीना है, बेशक हर इंसान अपने जीवन को गुनाहों से दूषित कर लेता है, रमज़ान सबसे सही समय है जब तौबा, इस्तेग़फ़ार और रातों को ख़ुदा की याद में जाग कर इंसान अपनी रूह और अपने जीवन को पवित्र कर सकता है, जो भी इस महीने केवल अल्लाह की ख़ातिर रोज़ा रखे और अपने किए पर शर्मिंदा हो कर तौबा कर ले उसे ख़ुदा की मग़फ़िरत हासिल हो जाएगी।
जैसा कि पैग़म्बर का फ़रमान है, ऐ लोगों तुम्हारी निजात तुम्हारे अमल में है, इसलिए तौबा और इस्तेग़फ़ार के द्वारा उसे हासिल करो।
3.    क़ुर्आन की तिलावत: क़ुर्आन अल्लाह की ओर से इंसानों के लिए हिदायत का पैग़ाम है, और उसके ख़ास बंदे क़ुर्आन द्वारा उस से बातें करते हैं, क़ुर्आन के आशिक़ इसके द्वारा अपनी रूह और अपने वुजूद को ताज़ा करते हैं।
जैसे कि पैग़म्बर फ़रमाते हैं कि, अगर कोई रमज़ान में क़ुर्आन की एक आयत की तिलावत करता है तो उसको दूसरे महीने पूरा क़ुर्आन ख़त्म करने का सवाब मिलता है।
आप एक दूसरी जगह फ़रमाते हैं, रमज़ान का महीना अल्लाह का महीना है, इस महीने में हर प्रकार के गुनाह से बचो और ज़्यादा से ज़्यादा क़ुर्आन की तिलावत करो।
और सब से अहम बात यह कि अल्लाह ने क़ुर्आन को लोगों की हिदायत के लिए अपने चहीते नबी पर इसी मुबारक महीने में नाज़िल किया जिस से इस महीने की महत्वपूर्णता का पता चलता है, तो क्या इस महीने इस हिदायत की किताब को ज़्यादा से ज़्यादा नहीं पढ़ना चाहिए....!!!
4.    सच्चे दिल से नमाज़ पढ़ना: रमज़ान सच्चे दिल और पूरी विनम्रता से अल्लाह की इबादत का महीना है, रोज़ेदारों से इस महीने पूरी विनम्रता और सच्चे दिल से नमाज़ पढ़ने को कहा गया है, और ज़्यादा से ज़्यादा मुस्तहब नमाज़ों की ओर भी तवज्जोह दिलाई गई है।
जैसा कि पैग़म्बर ने मुसतहब नमाज़ों की ओर तवज्जोह दिलाते हुए फ़रमाया, जो भी इस महीने में मुसतहब नमाज़ों को पढ़ेगा अल्लाह उसे जहन्नुम से आज़ाद कर देगा।
दूसरी एक हदीस में आप का इरशाद है, तुम में से जो भी इस महीने 2 रकत नमाज़ अल्लाह के लिए पढ़ेगा अल्लाह उसके गुनाहों को माफ़ कर देगा।
5.    रोज़ेदार को इफ़्तार कराना: इस महीने रोज़ेदारों और अल्लाह के बंदों को इफ़्तार कराना मुसलमानों की बहुत पुरानी परंपरा है, जिसमें सवाब भी बहुत है, और यह मुसलमानों में इत्तेहाद औक एकता को बाक़ी रखने में भी अहम भूमिका निभाती है।
जैसा कि अल्लाह के नबी इस बारे में फ़रमाते हैं, ऐ लोगों इस महीने में तुम में से जो भी किसी मोमिन को इफ़्तार कराएगा अल्लाह उसे एक ग़ुलाम आज़ाद करने का सवाब देगा और उसके सभी गुनाहों को माफ़ कर देगा।
किसी ने कहा, ऐ अल्लाह के रसूल हम में से सब के लिए यह संभव नहीं है, पैग़म्बर ने फ़रमाया, जहन्नुम की आग से डरो, (बहाना मत करो) मोमिन को इफ़्तार कराओ चाहे आधी खजूर या एक घूंट पानी से ही क्यों न हो।
6.    ग़रीबों की मदद: रोज़ा रखने का एक अहम फ़ायदा लोगों में हमदर्दी और गरीबों की मदद करना है, वह लोग जिन्होंने कभी जीवन में आर्थिक तंगी, ग़रीबी और भूख प्यास का सामना नहीं किया और वह ग़रीबों और आर्थिक तंगी के शिकार लोगों से बे ख़बर हैं उनके लिए जागने का यह सही समय है।
पैग़म्बरे इस्लाम स.अ. ने ग़रीबों और आर्थिक तंगी से जूझने वालों की मदद को रमज़ान के अहम लक्ष्यों में से एक बताया है, आप फ़रमाते हैं, इस महीने गरीब लोगों की मदद करो।
इमाम सादिक़ अ.स. फ़रमाते हैं, जो भी इस महीने ग़रीबों की मदद करेगा अल्लाह 70 प्रकार की कठिनाई और परेशानी को उस से दूर कर देगा।
इमाम रज़ा अ.स. से नक़्ल है, अगर इफ़्तार के समय कोई किसी ज़रूरतमंद को एक रोटी क़र्ज़ के तौर पर देगा अल्लाह उसके सारे गुनाहों को माफ़ कर देगा।
7.    गुनाहों से दूरी: गुनाहों से दूरी इंसान के जीवन में काफ़ी महत्व रखती है, तक़वा और परहेज़गारी जैसी महत्वपूर्ण नेमत तक पहुँचने के लिए सब से अच्छा महीना रमज़ान है।
पैग़म्बर से ख़ुतब-ए-शाबानिया के बीच किसी ने पूछा रमज़ान में सबसे अच्छा अमल क्आ है, आप ने फ़रमाया, गुनाहों से दूरी।
रमज़ान में गुनाहों से दूरी की एक मिसाल अपनी ज़ुबान को ग़लत बातों से बचाना है, पैग़म्बर फ़रमाते हैं, रमज़ान में मुसलमान उस समय तक अल्लाह की इबादत और बंदगी में व्यस्त रहता है जब तक वह किसी की बुराई (ग़ीबत) नहीं करता। फिर फ़रमाया, जो किसी मुसलमान की बुराई करेगा अल्लाह उसे रोज़े का सवाब नहीं देगा।



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