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रमज़ान और इमाम ख़ुमैनी

इमाम ख़ुमैनी रमज़ान को विशेष दर्जा देते थे, इसी कारण से वह रमज़ान के मुबारक महीने में किसी से भी मुलाक़ात नहीं करते, और सारा समय केवल दुआ, मुनाजात और क़ुर्आन की तिलावत में गुज़ार देते और कहते कि रमज़ान ख़ुद एक काम है।

विलायत पोर्टलः हर समय में अल्लाह के क़रीबी उलेमा रहे हैं जो इल्म और अमल के आसमान के चमकते सितारे होते हैं, और वह रिसालत और इमामत के सूरज की रौशनी से फ़ायदा उठाते हुए ज़मीन वालों के लिए उसे अपने अमल से समझाते हैं, और उनको अल्लाह के नूर से लाभित कराने के लिए उनकी सही दिशा में हिदायत करते।

इन्हीं अल्लाह के बहुत क़रीब मक़ाम रखने वालों में इस सदी का सबसे पसंदीदा चेहरा, फ़क़ीह, फ़्लॉस्फ़र, राजनितिक, अल्लाह की सच्ची मारेफ़त रखने वाले और इस्लामी रिवाल्यूशन की बुनियाद रखने वाले आयतुल्लाहिल उज़्मा इमाम ख़ुमैनी रहमतुल्लाह अलैह थे, क्योंकि उनकी उम्र का हर हर मिनट और सेकेंड अपने नफ़्स की देख भाल और उसके हिसाब किताब में बीत जाता, आपने सैकड़ों आयतों को अपने जीवन में उतार कर के दिखाया, और यहाँ आपके जीवन में रमज़ान की अहमियत और रमज़ान में आपकी सीरत को संक्षेप में बयान किया जाएगा।

इमाम ख़ुमैनी रमज़ान को विशेष दर्जा देते थे, इसी कारण से वह रमज़ान के मुबारक महीने में किसी से भी मुलाक़ात नहीं करते, और सारा समय केवल दुआ, मुनाजात और क़ुर्आन की तिलावत में गुज़ार देते और कहते कि रमज़ान ख़ुद एक काम है। ( पा बे पाए आफ़ताब, जिल्द 1, पेज 286)

इमाम ख़ुमैनी के इक बहुत क़रीबी का बयान है कि, आप रमज़ान के महीने में न ही शेर कहते न ही पढ़ते और न ही सुनते थे, आप में इस महीने एक अजीब हालत दिखाई देती थी, आप इस महीने केवल दुआ, मुनाजात, क़ुर्आन की तिलावत और मुसतहब अमल अंजाम देते थे। (बर्दाशतहाई अज़ सीरए इमाम ख़ुमैनी, जिल्द 3, पेज 90)

आप सहर और इफ़तार में इतना कम खाते कि आपका ख़ादिम सोंच में पड़ जाता कि कुछ खाया भी है या नहीं। (बर्दाशतहाई अज़ सीरए इमाम ख़ुमैनी, जिल्द 3, पेज 89)

रमज़ान में इबादत का अंदाज़

आप रमज़ान के महीने में अल्लाह की इबादत और नमाज़े शब पर विशेष ध्यान देते थे, आप इबादत को इश्क़े इलाही तक पहुँचने का कारण समझते थे, और हमेशा कहा करते थे कि कभी भी अल्लाह की इबादत को केवल जन्नत में जाने का कारण मत समझो। (रोज़नामए जमहूरिए इस्लामी, 21 जनवरी 1986)

इमाम ख़ुमैनी के साथ रहने वाले लोग अधिकतर बताते कि नमाज़े शब आप की रोज़ की आदत थी, आप के बहुत क़रीबी लोगों में से कुछ का बयान है कि जब कभी रात के अंधेरे में आप के कमरे में जाना हुआ, बहुत धीरे से कमरे जाता तो आप का ख़ुदा से किए जाने वाले दर्दे दिल सुनाई देता, आप ध्यानपूर्वक और पूरी विनम्रता के साथ क़ेयाम, रुकूअ और सजदे को इस तरह अंजाम देते कि जिसे शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता, मुझे आप की हर रात की इबादत देख कर लगता कि आज ही शबे क़द्र है। (इमाम दर संगरे नमाज़, पेज 83, हज़ार व इक नुक्ते, हुसैन दैलमी, नुक्ता न. 129)

आप के दफ़्तर के एक कर्मचारी का बयान है कि पचास साल में आप की नमाज़े शब एक बार भी नहीं छूटी, आप बीमारी हो या जेल या जिला वतन का जीवन, यहाँ तक बीमारी की हालत में हॉस्पिटल की बेड पर भी नमाज़े शब नहीं छोड़ी। (सीमाये फ़रज़ानेगान, पेज 180)

इमाम ख़ुमैनी मुसतहब नमाज़ों पर विशेष ध्यान देते, और कभी नवाफ़िल को नहीं छोड़ते थे, आप के बारे में बयान किया गया है कि, आप अपने बुढ़ापे में भी नजफ़ (इराक़) की सख़्त गर्मी में रमज़ान के रोज़े रखते और मग़रिब और इशा की नमाज़ पढ़े बग़ैर रोज़ा इफ़्तार नहीं करते थे, आप पूरी रात सुबह तक नमाज़ और दुआ में गुज़ारते और सुबह की नमाज़ के बाद थोड़ा आराम करके घर के कामों में व्यस्त हो जाते थे। ( सीमाए फ़रज़ानेगान, पेज 159, बर्दाशतहाई अज़ सीरए इमाम ख़ुमैनी, जिल्द 3, पेज 99)

ख़ानुम ज़हरा मुसतफ़वी का बयान है कि, इमाम ख़ुमैनी के रात में अल्लाह की याद में बहाने वाले आँसुओं का हाल यह था कि जो भी देख लेता बेक़ाबू हो कर रो देता था। (बर्दाशतहाई अज़ सीरए इमाम ख़ुमैनी, जिल्द 3, पेज 132)

क़ुम के हौज़े के एक उस्ताद का बयान है कि, एक रात इमाम ख़ुमैनी के बेटे आग़ा मुस्तफ़ा के घर मेहमान था, इनके पास अपना अलग घर नहीं था बल्कि इमाम ख़ुमैनी के साथ ही एक घर में रहते थे, मुझे आधी रात रोने की आवाज़ सुनाई दी, मेरी आँख खुल गई, मैंने परेशान होकर आग़ा मुस्तफ़ा को जगाया कि जाकर देखें कहीं कोई हादसा तो नहीं हो गया, आग़ा मुस्तफ़ा उठे और थोड़ी देर बाद वह आवाज़ सुनने के बाद कहा यह इमाम ख़ुमैनी के नमाज़े शब के समय आँसू बहाने की आवाज़ है। (बर्दाशतहाई अज़ सीरए इमाम ख़ुमैनी, जिल्द 3, पेज 286)

इमाम ख़ुमैनी के जीवन के अंतिम रमज़ान में आप की हालत घर वालों के बयान के अनुसार पहले के रमज़ान से काफ़ी अलग थी, और वह इस प्रकार कि आप अल्लाह की इबादत के समय जब भी आँसू बहाते उसे पोछने के लिए रूमाल का प्रयोग करते लेकिन आप जीवन के अंतिम रमज़ान में आँसू पोछने के लिए तौलिया का प्रयोग करते थे। (बर्दाशतहाई अज़ सीरए इमाम ख़ुमैनी, जिल्द 3, पेज 126)

रमज़ान में क़ुर्आन की तिलावत का अंदाज़

इमाम ख़ुमैनी अपने जीवन में क़ुर्आन की तिलावत पर विशेष ध्यान देते थे, जैसे ही थोड़ा समय भी आप को मिलता आप क़ुर्आन की तिलावत शुरू कर देते थे, यहाँ तक कि दस्तरख़ान लगने से लेकर खाना और इफ़्तार लगने तक के बीच जो थोड़ा समय होता आप इसमें भी क़ुर्आन की तिलावत करते थे। (पा बे पाए आफ़ताब, जिल्द 1, पेज 270)

आप नमाज़े शब के बाद से सुबह की नमाज़ के बीच के समय में भी क़ुर्आन की तिलावत करते थे। (बर्दाशतहाई अज़ सीरए इमाम ख़ुमैनी, जिल्द 3, पेज 198)

आप के साथ ही रहने वालों में से एक का बयान है कि, नजफ़ (इराक़) में आपकी आँख में अधिक तकलीफ़ बढ़ गई थी जिसके कारण डॉक्टर ने आपकी आँख चेक करने के बाद आपसे क़ुर्आन देर तक पढ़ने के लिए मना करते हुए आँखों को आराम देने के लिए कहा, इमाम ख़ुमैनी ने मुस्कुराते हुए कहा मैं आँख, क़ुर्आन पढ़ने के लिए तो दिखाने आया हूँ, ऐसी आँख का फ़ायदा ही क्या जिसके होते हुए क़ुर्आन न पढ़ सकूँ, आप ने डॉक्टर से कहा कि आप कुछ ऐसा कर दें कि मैं क़ुर्आन पढ़ सकूँ। (बर्दाशतहाई अज़ सीरए इमाम ख़ुमैनी, जिल्द 3, पेज 7)

नजफ़ में आप के एक क़रीबी का कहना है कि, इमाम ख़ुमैनी रमज़ान के मुबारक महीने में हर दिन क़ुर्आन के दस पारे पढ़ते थे यानी हर तीन दिन में एक क़ुर्आन ख़त्म करते थे। (बर्दाशतहाई अज़ सीरए इमाम ख़ुमैनी, जिल्द 3, पेज 7)



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