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यमन संकट का राजनीतिक समाधान हमारे बस की बात नहीः राष्ट्र संघ

यमन के मामलों में संयुक्त राष्ट्र संघ के दूत मार्टिन ग्रिफ़िथ्स ने सुरक्षा परिषद में यमन संकट का राजनीतिक समाधान न निकल पाने पर खेद जताया है।

विलायत पोर्टलः यमन युद्ध को शुरू हुए पांचवें वर्ष का तीसरा महीना समाप्त होने वाला है और इस युद्ध की समाप्ति का कोई चिन्ह दिखाई नहीं दे रहा है। दिसम्बर 2018 में संयुक्त राष्ट्र संघ की निगरानी में स्टॉकहोम में वार्ता हुई थी, जो व्यवहारिक रूप से विफल हो गई, इसलिए कि सऊदी अरब और संयुक्त अरब इमारात ने अल-हुदैदा में युद्ध विराम का पालन नहीं किया।

वास्तव में संयुक्त राष्ट्र ने यमन संकट के राजनीतिक समाधान खोजने में विफलता की घोषणा इसलिए की है कि सऊदी अरब और इमारात किसी भी समझौते या वादे का सम्मान नहीं करते हैं, हालांकि ग्रीफ़िथ्स ने सोमवार को सुरक्षा परिषद की बैठक में आक्रमणकारियों के इस रवैये का उल्लेख नहीं किया।

इसके बजाए राष्ट्र संघ के दूत ने सऊदी अरब के अबहा एयरपोर्ट पर यमनी सेना के हमलों की निंदा की। ग्रीफ़िथ्स को इस बात का भी उल्लेघ करना चाहिए था कि यमनी संकट, मानव इतिहास के सबसे भयानक संकट में परिवर्तित हो चुका है। हालांकि मानव सहायता के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव के प्रतिनिधि मार्क लोकुक ने सोमवार को कहा था कि यमन को मानव इतिहास के सबसे भयानक संकट का सामना है और यमन की आधी से ज़्यादा जनसंख्या को मानव सहायता की ज़रूरत है।

यूनिसेफ़ ने भी हाल ही में अपनी एक रिपोर्ट में उल्लेख किया था कि यमन युद्ध के कारण प्रति दो घटों में एक यमनी मां और 6 बच्चे अपनी जान से हाथ धो बैठते हैं।

हालिया दिनों में आक्रमणकारियों के ख़िलाफ़ यमनी सेना और स्वयं सेवी बलों के मुंहतोड़ जवाबी हमलों ने युद्ध का नक़्शा ही पलट दिया है और यह युद्ध अब नए चरण में प्रवेश कर गया है। आक्रमणकारी मजबूर होकर एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र संघ से मदद की गुहार लगा रहे हैं।

पारस टुडे

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