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यज़ीद के बारे में वहाबियों के विचार और उसका रद्द

इब्ने तैमिया ने यज़ीद की गरिमा को बचाने के लिए कहीं लोगों के ध्यान भटका कर अच्छे और कहीं उस से बुरे और बदतर हाकिमों और बादशाहों से उसकी जुलना की है, ताकि यज़ीद के अत्याचार, पाखंड, पाप और क्रूरता उसके आगे छिप जाएं

विलायत पोर्टलः: इब्ने तैमिया की पैरवी करते हुए वहाबियों ने भी इतिहास में हेरफेर कर के यज़ीद को उसके द्वारा तीन साल की हुकूमत में किए जाने वाले घोर अत्याचार, पाप और क्रूरता से बरी कर दिया, इस टोले ने यज़ीद को उसके कर्बला के दिल दहला देने वाले जुर्म, पैग़म्बर की औलाद को क़ैदी बनाने, हर्रा की बर्बरता और काबे में आग लगा देने वाली घटना में बेगुनाह साबित करने में इब्ने तैमिया की पैरवी की है।
जैसे इब्ने तैमिया ने माविया और यज़ीद को फ़टकार लगाने वाले इब्ने जौज़ी के क़ौल को नक़ली बताते हुए झुठला दिया है, और वह हदीसें जो माविया और यज़ीद के इस्लाम, जेहाद, नमाज़ और रोज़े के बारे में मौजूद हैं उनको उन हदीसों के बराबर बताया है जो इमाम अली अ.स. के बारे मौजूद हैं। (मिनहाजुस सुन्नह, जिल्द 4, पेज 220)
इब्ने तैमिया ने यज़ीद की गरिमा को बचाने के लिए कहीं लोगों के ध्यान भटका कर अच्छे और कहीं उस से बुरे और बदतर हाकिमों और बादशाहों से उसकी जुलना की है, ताकि यज़ीद के अत्याचार, पाखंड, पाप और क्रूरता उसके आगे छिप जाएं, वह यज़ीद के अत्याचारों को छिपाने के लिए जनाब मुख़तार की हस्ती को दाग़दार करते हुए कहता है कि, यज़ीद दूसरों से बेहतर था, यज़ीद, इराक़ के हाकिम मुख़तार जिसने (इमाम) हुसैन (अ.स.) के क़ातिलों से बदला लेने के बहाना किया उस से बेहतर था, मुख़तार का दावा था कि जिबरील उस पर नाज़िल होते हैं, इसी तरह उसने यज़ीद की हज्जाज इब्ने यूसुफ़ से तुलना करते हुए कहता है कि यज़ीद, हज्जाज से बेहतर था क्योंकि हज्जाज के अत्याचार यज़ीद से अधिक होने के बारे में उलेमा एकमत हैं, और फिर कहता है कि इन सब के अलावा दूसरे हाकिम और बादशाह यज़ीद की तुलना में फ़ासिक़ और बे दीन थे। (मिनहाजुस सुन्नह, जिल्द 4, पेज 343)
हालांकि शिया और सुन्नी दोनों फ़िरक़ों के इतिहासकारों ने यज़ीद के अपराध और घोर अपराध का जो उस ने इस्लामी ख़िलाफ़त का नक़ाब पहन कर किए थे उनका ज़िक्र किया है, और यज़ीद के अत्याचार, पाप, पाखंड और क्रूरता को फ़िरऔन से बढ़ कर जाना है, जैसाकि इतिहासकार मसऊदी ने लिखा है कि, जब यज़ीद के काले कारनामे सबके सामने ज़ाहिर हो गए, उसने पैग़म्बर के नवासे को उनके सभी असहाब के साथ बेरहमी से क़त्ल किया, शराब के नशे में चूर रहने लगा, उस समय वह फ़िरऔन की सीरत पर चल पड़ा, बल्कि फ़िरऔन से बदतर, क्योंकि फ़िरऔन का आम जनता के साथ व्यवहार यज़ीद से बहुत ठीक था। (मुरव्वजुज़ ज़हब, जिल्द 3, पेज 69)
याक़ूबी ने भी अपनी इतिहास की किताब में यज़ीद की हुकूमत के सब से बुरे सालों की ओर इशारा करते हुए लिखा है कि, सईद इब्ने मुसय्यब ने यज़ीद की हुकूमत को इतिहास के सबसे बुरे दौर का नाम दिया है, क्योंकि उसकी हुकूमत के पहले साल में पैग़म्बर के नवासे और उनके घर वालों को शहीद किया गया, दूसरे साल में पैग़म्बर के पवित्र शहर को अपने सिपाहियों के लिए हलाल कर दिया, (जिसके कारण यज़ीद के नजिस सिपाहियों ने आप लोगों के घरों में घुस कर मर्यादा को लांघते हुए इंसानियत को ऐसा शर्मसार किया जिसे आज भी इतिहासकार लिखते हुए कांप जाता है) तीसरे साल में अल्लाह के घर काबा को आग लगा कर (ऐसी जगह जिसे अल्लाह ने क़ुर्आन में शांति की सबसे बड़ा प्रतीक कहा है) वहां लोगों का ख़ून बेदर्दी से बहाया। (तारीख़े याक़ूबी, जिल्द 2, पेज 253)
यज़ीद के अपराध और अत्याचार के लिए यही काफ़ी है कि जो इब्ने जौज़ी ने अब्दुल्लाह इब्ने हंज़ला से नक़्ल करते हुए लिखा है कि, ख़ुदा की क़सम हम यज़ीद से उस समय अलग हुए जब (उसके घोर अपराध के चलते) हमें लगने लगा कि अब कहीं आसमान से हमारे सरों पत्थर न बरसने लगे, वह ऐसा हैवान है जिस ने मां, बेटी, बहन और बीवी में कोई फ़र्क़ नहीं रखा, वह एक शराबी था, वह नमाज़ नहीं पढ़ता था। (अल-मुंतज़िम, जिल्द 4, पेज 179)
अब्दुल्लाह इब्ने हंज़ला के साथियों ने शआम से यज़ीद से मुलाक़ात कर पलटने के बाद उसकी प्रशंसा इस तरह की, हम एक ऐसे शख़्स के पास से वापिस आ रहे हैं कि जिस का कोई दीन नहीं है, वह शराब पीता है, गाने बाजे का शौक़ीन है, हर समय गाना गाने वाले उसके पास ही रहते हैं, कुत्तों से खेल करता है, और कुछ लुटेरों के साथ रात रात भर गप्पें लड़ाता है। (अल-कामिल फ़ित-तारीख़, इब्ने असीर, जिल्द 4, पेज 103)
ज़हबी ने भी यज़ीद और उसकी जुर्म की दुनिया के बारे में इस प्रकार लिखा है कि, अपने घिनौने जुर्म जो मदीने में उसने किए और जो कर्बला में इमाम हुसैन अ.स. और आपके भाईयों, बेटों और साथियों को क़त्ल किया, और उसके शराब पीने और हर प्रकार के घटिया कामों के करने के कारण लोगों के उसकी तरफ़ से नफ़रत बैठ गई, बहुत से लोगों ने उसके विरुध्द बग़ावत की और आख़िरकार ज़िंदगी ने साथ नहीं दिया। (तारीख़ुल-इस्लाम, जिल्द 5, पेज 30)
वहाबियों ने न केवल यह कि यज़ीद को बेगुनाह कहा बल्कि उसको मुसलमानों के ख़ुल्फ़ा के बराबर कहा, जैसाकि इब्ने तैमिया यज़ीद की ख़िलाफ़त के बारे में कहता है कि, अहले सुन्नत यज़ीद जैसे दूसरे लोगों की ख़िलाफ़त को मानते हैं, और जो भी यज़ीद की इमामत  का इंकार करे उसने समझो अबू बक्र, उमर, उस्मान की विलायत और किसरा, क़ैसर और नज्जाशी की हुकूमत का इंकार किया। (मिनहाजुस सुन्नह, जिल्द 4, पेज 311)
अब फैसला आप पढ़ने वालों पर है, अहले सुन्नत के भी बड़े बड़े उलेमा यज़ीद के काले कारनामों के कारण उसे ख़िलाफ़त तो दूर इस्लाम के क़रीब भी नहीं समझते, फिर यह वहाबी टोला क्यों इतना अधिक यज़ीद को सम्मान देना चाहता है, उसके नाम पर सड़क और मदरसे बनवाता है, एक शराबी और अय्याश इंसान से ऐसी क्या मोहब्बत है, कहीं यह सोंची समझी साज़िश तो नहीं, जिस के कारण वह मुसलमानों में फूट डाल कर साम्राज्यवादी शक्तियों के सपनों को पूरा कर रहे हों।
हर मुसलमान को चाहिए आंखे खोल कर पूरी दुनिया में देखे, आज किस के इशारे पर और किस के द्वारा इंसानियत शर्म से पानी पानी हो रही है, यही टोला दिखाई देगा जिसको पहले तो साम्राज्यवादी ताक़ते इस्तेमाल करके अपने सपनों को पूरा करती हैं और फिर पूरी दुनिया में मुसलमान आतंकवादी हैं का नारा उठाती हैं।


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