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मोमिन और दुनिया की मुसीबतें

मुसीबत इंसान के गुनाहों का कफ़्फ़ारा बन जाती है और इंसान को बिना हिसाब किताब के जन्नत तक पहुंचाती है और इससे बढ़िया और अच्छा कोई शरफ़ नहीं कि इंसान बिना हिसाब किताब के जन्नत में दाख़िल हो जाए

विलायत पोर्टलः आमतौर से यह ख़्याल किया जाता है कि अल्लाह के ख़ास बंदों को दुनिया की मुसीबतों और परेशानियों से हर समय और पूरी तरह से महफ़ूज़ और अल्लाह की पनाह में रहना चाहिए और सारी आफ़तों, मुसीबतों और परेशानियों का रुख़ कुफ़्फ़ार और मुशरेकीन की तरफ़ होना चाहिए लेकिन इस्लामी रिवायात ने साफ़ तौर से बयान कर दिया कि अल्लाह इंसान के मर्तबे और दर्जे के हिसाब से इम्तेहान लेता है और इंसान को दर्जे और मर्तबे भी इम्तेहान के हिसाब से देता है।

हज़रत इब्राहीम को इमामत जैसा अज़ीम पद उस समय तक नहीं मिला जब तक ख़ुल्लत के इम्तेहान में पूरी तरह कामयाबी हासिल नहीं कर ली और ज़िंदगी के हर मोड़ पर होने वाले इम्तेहान को सब्र, सुकून और शुक्र के साथ तय नहीं कर लिया।

मोमिन की ज़िंदगी में मुसीबत और परेशानी अल्लाह की तरफ़ से तोहफ़ा उसकी अज़मत की दलील है, और उन्हीं मुसीबतों और परेशानियों पर सब्र कर के इंसान इस क़ाबिल बन जाता है कि उसे पूरी दुनिया में किसी की मदद की ज़रूरत नहीं पड़ती।

मोमिन और मुसीबतों के आपसी रिश्ते के सिलसिले में कुछ हदीसें ध्यान देने के लायक़ हैं:

इरशाद होता है कि मोमिन के साथ मुसीबतें और परेशानियां उस समय तक रहती हैं जब तक उसके गुनाहों का ख़ात्मा न हो जाए।

या इसी तरह इमाम जाफ़र सादिक़ अ.स. फ़रमाते हैं कि जितना इंसान के ईमान में इज़ाफ़ा होता है उतनी ही माली तंगी बढ़ती जाती हैं।

इमाम बाक़िर अ.स. फ़रमाते हैं कि मोमिन को मुसीबतों और परेशानियों का सामना ख़ुद के ईमान के हिसाब से करना पड़ता है।

इमाम जाफ़र सादिक़ अ.स. का इरशाद है कि मोमिन हर चालीस दिन बाद किसी न किसी तकलीफ़ और परेशानी का सामना ज़रूर करता है ताकि वह उस परेशानी द्वारा अल्लाह को याद कर सके।

एक और हदीस है जिस से आप मोमिन का मुसीबतों से कितना गहरा संबंध है अच्छी तरह अंदाज़ा लगा सकते हैं, इरशाद होता है कि मोमिन किसी जानवर के बिल में ही क्यों न हो उसपर कोई न कोई तकलीफ़ देने वाला मुसल्लत (थोप) कर दिया जाएगा।

और किसी को मोमिन होने के बावजूद मुसीबतों में घिरे रहने को लेकर कोई ग़लत शंका न पैदा हो इसलिए इरशाद होता है कि अल्लाह का मोमिन बंदे को परेशानियों में डालना बिल्कुल वैसे ही है जैसे एक डॉक्टर का अपने मरीज़ का इलाज करना, यानी अल्लाह परेशानियों और मुश्किलों द्वारा अपने बंदे के ईमान को और मज़बूती देता है और उसमें और ज़्यादा निखार पैदा करता है।

एक और हदीस में इरशाद होता है कि अल्लाह जब किसी बंदे से मोहब्बत करता है तो उसे परेशानियों में घेर देता है ताकि उसके रोने और गिड़गिड़ाने की आवाज़ को सुन सके।

पैग़म्बर स.अ. फ़रमाते हैं कि अल्लाह का इरशाद है कि मेरी इज़्ज़त और जलालत की क़सम, मैं किसी मोमिन बंदे पर मेहरबनी करता हूं तो उस समय तक उसे दुनिया से नहीं उठाता जब तक सारे गुनाहों का हिसाब न कर दूं, चाहे उसके जिस्म में कोई बीमारी पैदा हो जाए या रिज़्क़ में तंगी हो जाए या दुनिया में किसी ख़ौफ़ में पड़ जाए, उसके बाद भी अगर कोई चीज़ रह जाएगी तो वह मौत की सख़्ती का सामना करेगा ताकि कोई गुनाह बाक़ी न रह जाए और सीधे जन्नत में दाख़िल हो जाए।

या इसी तरह एक दूसरी हदीस में बयान होता है कि अल्लाह जब किसी बंदे के साथ भलाई करना चाहता है और वह गुनहगार हो जाता है तो अल्लाह उसे किसी परेशानी में डाल देता है ताकि उसे इस्तेग़फ़ार याद आ जाए और वह तौबा कर ले।

पैग़म्बर स.अ. की हदीस है कि जिस माल की ज़कात न निकाली जाए उस माल पर लानत और जिस बदन पर ज़कात न निकाली जाए उस बदन पर भी लानत! सवाल किया गया कि माल की ज़कात तो समझ में आती है बदन की ज़कात क्या है? फ़रमाया: बदन की ज़कात परेशानियों में घिरना है।

एक और जगह इरशाद होता है कि जिसकी दुनिया में मुसीबतें और मुश्किलें न हों उसका दीन मशकूक है।

इसी तरह एक और हदीस में इरशाद होता है कि दुनिया की सख़्ती आख़ेरत का आराम है और दुनिया में आराम आख़ेरत की सख़्ती है।

(इन हदीसों और इसके अलावा और हदीसों को भी अल-तकामुल फ़िल इस्लाम की तीसरी जिल्द में देखा जा सकता है)

ऊपर बयान की गई हदीसों से कुछ अहम नतीजे सामने आते हैं:

- मुसीबत अल्लाह की याद का बेहतरीन ज़रिया है और अल्लाह की याद सबसे अहम होने के एतेबार से इस मुसीबत को और भी महबूब बना देती है जिसके ज़रिए अल्लाह की याद हासिल होती है।

- मुसीबत इंसान को सब्र की तरफ़ बुलाती है और सब्र इंसान को इस क़ाबिल बना देता है कि इंसान को अल्लाह का साथ हासिल हो जाए और जिसके साथ अल्लाह होता है उससे अज़ीम इस दुनिया में कोई नहीं हो सकता।

- मुसीबत अल्लाह की याद में आंसू बहाने का ज़रिया है और आंसू मोमिन का वह बेहतरीन वसीला है जो अल्लाह के करम को खींच लेता है।

- मुसीबत इंसान के गुनाहों का कफ़्फ़ारा बन जाती है और इंसान को बिना हिसाब किताब के जन्नत तक पहुंचाती है और इससे बढ़िया और अच्छा कोई शरफ़ नहीं कि इंसान बिना हिसाब किताब के जन्नत में दाख़िल हो जाए।

- दुनिया में आराम की चाहत आख़ेरत से ग़ाफ़िल कर देती है इसलिए इंसान के लिए सबसे बेहतरीन रास्ता यही है कि वह मुश्किलों और परेशानियों का मुक़ाबला करे और आख़ेरत की हर तरह की मुश्किल और परेशानी से नजात हासिल करे।

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