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माहे रमज़ान बरकत, रहमत और मग़फ़ेरत का महीना है

माहे रमज़ान चूंकि अल्लाह का महीना है इसलिए इस महीने में अल्लाह अपनी नेमतों को बढ़ा देता है, उसकी दी हुई नेमतों में बढ़ोतरी होती है और यह बढ़ोतरी केवल ज़ाहिरी नेमतों में नहीं बल्कि मानवी नेमतों में भी होती है इसीलिए इस महीने को माहे मुबारक यानी बरकत और नेमतों के ज़्यादा होने वाला महीना कहा जाता है

विलायत पोर्टलः यह बयान पैग़म्बर स.अ. के उस ऐतिहासिक ख़ुत्बे का हिस्सा है जिसे आपने माहे शाबान के आख़िरी दिनों में लोगों के बीच इरशाद फ़रमाया था।

नेमत के अधिक होने को बरकत कहते हैं, चाहे नेमत कुछ भी हो, जान माल हो या औलाद, मरना जीना हो रोज़ी रोज़गार, खाने पीने का सामान और कपड़े हों या खेत की फ़सल, रुपया पैसा हो या गाय भेड़ बकरी, इनके अलावा और भी बहुत सी चीज़ें हैं जिनको नेमत कहा जा सकता है।

माहे रमज़ान चूंकि अल्लाह का महीना है इसलिए इस महीने में अल्लाह अपनी नेमतों को बढ़ा देता है, उसकी दी हुई नेमतों में बढ़ोतरी होती है और यह बढ़ोतरी केवल ज़ाहिरी नेमतों में नहीं बल्कि मानवी नेमतों में भी होती है इसीलिए इस महीने को माहे मुबारक यानी बरकत और नेमतों के ज़्यादा होने वाला महीना कहा जाता है, पैग़म्बर स.अ. ने भी अपने ऐतिहासिक और सुधार के लिए दिए जाने वाले ख़ुत्बे में सबसे पहले माहे रमज़ान को बरकतों वाला महीना कहा और इरशाद फ़रमाया कि अल्लाह का महीना बरकतों के साथ आने वाला है।

माहे रमज़ान रहमतों का दरिया:

पैग़म्बर स.अ. ने अपने ख़ुत्बे में माहे रमज़ान को रहमतों का महीना भी फ़रमाया है, रहमत का मतलब करम और मेहरबानी के हैं और करम और मेहरबानी करना अल्लाह की सिफ़ात और विशेषताओं में से एक सिफ़त और विशेषता है, इसी सिफ़त की बिना पर अल्लाह को रहमान और रहीम कहा जाता है और हर सूरे के शुरू में उसकी इस सिफ़त का एलान भी किया जाता है, रहमान का मतलब यह है कि अल्लाह की रहमत, आख़ेरत में केवल मोमेनीन के लिए है और रहीम का मतलब यह है कि अल्लाह की रहमत दुनिया में सबके लिए है और अल्लाह की पैदा की गई हर मख़लूक़ उसकी रहमत से फ़ायदा हासिल करती है।

इसी रहमत का ज़िक्र करते हुए पैग़म्बर स.अ. ने इस ख़ुत्ब-ए-शाबानिया में इरशाद फ़रमाया: ऎ लोगों तुम्हारी तरफ़ अल्लाह का वह महीना बढ़ रहा है जो बरकत, रहमत और मग़फ़ेरत को साथ लेकर आ रहा है।

मग़फ़ेरत का महीना:

माहे रमज़ान की बरकत और रहमत की तरफ़ इशारे के बाद पैग़म्बर स.अ. ने मग़फ़ेरत का ज़िक्र किया, मग़फ़ेरत का मतलब यह है कि बंदा ख़ुद को अल्लाह के अज़ाब से बचाने के लिए उसकी बारगाह में अपने गुनाहों का इक़रार करे और उसकी अल्लाह से माफ़ी मांगे और यह बात साफ़ ज़ाहिर है कि इस काम के लिए सबसे बेहतरीन मौसम माहे रमज़ान है।

मग़फ़ेरत के बारे में अनेक हदीसें और रिवायतें बयान हुई हैं उसके अलावा ख़ुद क़ुर्आन में लगभग 250 आयतें मौजूद हैं जिनमें अलग अलग तरह से मग़फ़ेरत का ज़िक्र हुआ है, अगर देखा जाए तो उन आयतों को इस तरह बांटा जा सकता है:

1- वह आयतें जिनमें कहा गया है कि अल्लाह बिल्कुल माफ़ नहीं करेगा:

यह आयतें उन कुफ़्फ़ार, मुशरेकीन और मुनाफ़ेक़ीन से संबंधित है जो अपने उसी शिर्क, कुफ़्र और नेफ़ाक़ पर मर मिटने के लिए अड़े रहते हैं और तौबा करने का इरादा भी नहीं रखते, अल्लाह ऐसे लोगों को कभी माफ़ नहीं करेगा, जैसाकि सूरए निसा में इरशाद होता है अल्लाह शिर्क वालों को कभी माफ़ नहीं करेगा।

2- वह आयतें जो उन लोगों के बारे में नाज़िल हुई हैं कि जिन्होंने शिर्क तो नहीं किया लेकिन दूसरे गुनाह अंजाम दिए और तौबा भी नहीं की, ऐसे लोगों की मग़फ़ेरत और उनके गुनाहों को माफ़ करने हक़ अल्लाह को है, चाहे उन्हें माफ़ कर दे या माफ़ न करे, जैसाकि सूरए निसा में है: शिर्क के अलावा अल्लाह जिसे चाहे माफ़ कर देगा।

3- वह आयतें जिनमें कहा गया है कि अल्लाह बंदों के गुनाहों को ज़रूर माफ़ करेगा।

यह आयतें उन मोमेनीन और तौबा करने वालों की हैं जो कुफ़्र की हालत पर थे और अपने पुराने अक़ीदे से दूर हो कर तौबा कर चुके और अब कुफ़्र की तरफ़ वापसी का इरादा नहीं रखते, बेशक ऐसे लोगों की ज़रूर मग़फ़ेरत होगी, जैसाकि सूरए अंफ़ाल में इरशाद हुआ कि: रसूल कह दीजिए कि अगर यह लोग कुफ़्र से बचे रहें तो उनके पिछले गुनाह माफ़ कर दिए जाएंगे।

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