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माहे रमज़ान करामत और दुआ के क़बूल होने का महीना

आमाल का क़बूल होना एक बहुत बड़ी नेमत है जिसे अल्लाह रमज़ान के मुबारक महीने में हमें अता करता है, वरना अगर देखा जाए तो हमारा कौन सा अमल है जो केवल अल्लाह की मर्ज़ी और उसकी ख़ुशनूदी हासिल करने के लिए अंजाम दिया जाता हो?

विलायत पोर्टलः पैग़म्बर स.अ. फ़रमाते हैं कि: माहे रमज़ान में तुम्हें अल्लाह की मेहमानी में बुलाया गया है और तुम्हें करामत वाले लोगों यानी बड़ाई वाले और बुज़ुर्गों में शुमार किया गया है, यह केवल अल्लाह ही का काम है कि वह अपने मामूली मेहमान को अपने ख़ास मेहमान में बुला कर उसे सम्मान और इज़्ज़त देता है और अपने एहसान और करम की बारिश करता है, हालांकि वह यह भी जानता है कि उसके मेहमानख़ाने में क़दम रखने वाला उसके हुक्म का विरोध करता है उसका कहना नहीं सुनता है, अगर नमाज़ का हुक्म दिया तो नमाज़ से मुंह मोड़ा, रोज़े का हुक्म दिया तो रोज़े के पास तक नहीं भटका, हज करने की हैसियत दी लेकिन हज करने नहीं गया, ज़कात देने भर का अनाज दिया लेकिन ज़कात नहीं अदा की, ख़ुम्स के लायक़ बनाया उसे भी अदा नहीं किया, अल्लाह की राह में जान क़ुर्बान करने का मौक़ा आया वहां भी रास्ता काट कर निकल गया, अहलेबैत अ.स. से मोहब्बत का दावा करता रहा लेकिन काम उनके दुश्मनों जैसा करता रहा, संक्षेप में इतना समझ लीजिए उसकी मेहमानी में आने वाला क़दम क़दम पर उसके हुक्म को अनदेखा करता रहा लेकिन जैसे ही उसकी मेहमानी में यह पहुंचता है करामतों का मालिक अपने मेहमान पर रहमत की बारिश कर रहा है, उसकी इज़्ज़त का ख़्याल रख रहा है, उसकी एक एक सांस पर तस्बीह का सवाब अता कर रहा है, उसके सोने को इबादत क़रार दे रहा है, उसके आमाल को क़बूल कर रहा है, उसकी दुआओं को क़बूल कर रहा है, उसके लिए अपनी बख़्शिश के दरवाज़े खोल रहा है, उसे अपनी ख़ास रहमत में शामिल कर रहा है।

क्या इतने इनाम और सम्मान के बाद भी उसका शुक्रिया अदा न करने का कोई बहाना रह जाता है? क्या उसकी मेहमानी में रह कर उसकी नेमतों, करामतों और मग़फेरत की उम्मीद रखते हुए उसके हुक्म का विरोध जारी रखा जा सकता है?

हक़ीक़त यह है कि ऐसा काम वही कर सकता है जिसने अपने ज़मीर को गिरवी रख दिया हो अपनी अक़्ल को बेच दिया हो, और अगर देखा जाए तो उसकी मेहमानी में ऐसे बंदे भी हैं जो उसकी दावत से पहले पूरी तैयारी के साथ हाज़िर होते हैं और जब उनको बुलाया जाता है तो अल्लाह की इनायत और करामत का ताज अपने सर पर रख कर ख़ुशी से फूले नहीं समाते।

ख़ुदाया इस मुबारक महीने में हम सबके सर पर अपनी इनायत और करामत का ताज अता फ़रमा!!

आमाल के क़बूल होने वाला महीना

पैग़म्बर स.अ. फ़रमाते हैं: माहे रमज़ान में अल्लाह तुम्हारे आमाल को क़बूल फ़रमाता है।

आमाल का क़बूल होना एक बहुत बड़ी नेमत है जिसे अल्लाह रमज़ान के मुबारक महीने में हमें अता करता है, वरना अगर देखा जाए तो हमारा कौन सा अमल है जो केवल अल्लाह की मर्ज़ी और उसकी ख़ुशनूदी हासिल करने के लिए अंजाम दिया जाता हो? हमारे किसी अमल में दिखावा तो किसी में रियाकारी पाई जाती है, किसी में ज़ाहिरी नजासत पाई जाती तो किसी में बातिनी, यानी हमारे अमल में कोई न कोई खोट ज़रूर पाया जाता है, और कोई अमल बिना किसी खोट के अंजाम पाया भी तो क़बूल होने के लायक़ नहीं होता, क्योंकि हम लगातार ऐसे गुनाहों में फसे रहते हैं जो हमारे आमाल के क़बूल होने में रुकावट बनते हैं और उन गुनाहों के कारण अल्लाह की बारगाह से धुतकार दिए जाने के क़ाबिल होते हैं, मगर यह अल्लाह का एहसान समझिए कि उसने हमें ऐसे मौक़े दिए जिनके कारण आमाल के क़बूल होने की सारी रुकावटें दूर हो जाती हैं, जैसे माहे रमज़ान को रहमत और बरकत वाला महीना क़रार दिया और पैग़म्बर स.अ. द्वारा हमारी इस बात की तरफ़ हिदायत की कि यह महीना आमाल के क़बूल होने का आलीशान मौक़ा है और बेहतरीन मौसम है, इस महीने में रहमत के दरवाज़े खोल दिए जाते हैं, बुरे आमाल वाले लोगों का इलाज किया जाता है और नेक आमाल वालों को बशारत सुनाई जाती है, बुरे आमाल नेक आमाल में बदल सकते हैं और अज़ाब, सवाब में तबदील हो सकता है।

इस जगह पर ध्यान रहे कि जिस तरह अल्लाह ने कुछ ख़ास दिनों को आमाल के क़बूल होने और गुनाहों के माफ़ होने का वसीला बनाया है और जिस तरह यह दिन अज़ीम हैं उसी तरह कुछ हस्तियां भी अज़ीम और वह वसीला हैं अल्लाह और बंदों के बीच, और वह मोहम्मद स.अ. और आले मोहम्मद अ.स. की हस्तियां हैं, इसलिए अगर इस मुबारक महीने में इन हस्तियों के वसीले से अल्लाह की बारगाह में दुआ मांगी जाए और इनके वसीले से अपने आमाल अल्लाह की बारगाह में पेश किए जाएं तो ज़रूर क़बूल होंगे।

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