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माहे रमज़ान और क़ुरआन की तिलावत

माहे रमज़ान क़ुरआन की ख़ास बहार है, जैसाकि इमाम बाक़िर अ.स. फ़रमाते हैं: हर चीज़ की बहार होती है और क़ुरआन की बहार माहे रमज़ान है

विलायत पोर्टलः क़ुरआन की तिलावत अल्लाह से बातचीत का ज़रिया है, जैसाकि पैग़म्बर स.अ. ने फ़रमाया: तुमसे जो शख़्स भी अपने परवरदिगार से बात करना चाहता है उसे चाहिए कि क़ुरआन की तिलावत करे। (कंज़ुल-उम्माल, जिल्द 1, पेज 510)

क़ुरआन की तिलावत घर का नूर है, जैसाकि हदीस में आया है कि पैग़म्बर स.अ. ने फ़रमाया: अपने घरों को क़ुरआन की तिलावत से नूरानी बनाओ उन्हें मक़बरा मत बनाओ, बेशक जिन घरों में क़ुरआन की तिलावत ज़्यादा होती है उनमें ख़ैर और बरकत भी ज़्यादा होती है और घर वाले उस बरकत और ख़ैर से फ़ायदा उठाते हैं और आसमान वालों के लिए ऐसे घर इस तरह चमकते हैं जैसे ज़मीन वालों के लिए सितारे। (उसूले काफ़ी, जिल्द 2, पेज 627, बिहारुल अनवार, जिल्द 92, पेज पेज 200)

माहे रमज़ान क़ुरआन की ख़ास बहार है, जैसाकि इमाम बाक़िर अ.स. फ़रमाते हैं: हर चीज़ की बहार होती है और क़ुरआन की बहार माहे रमज़ान है। (वसाएलुश-शिया, जिल्द 7, पेज 218)

माहे रमज़ान का स्वागत क़ुरआन की तिलावत से करो, जैसाकि इमाम सादिक़ अ.स. फ़रमाते हैं: माहे रमज़ान का स्वागत क़ुरआन की तिलावत से करो। (वसाएलुश-शिया, जिल्द 7, पेज 225)

क़ुरआन की तिलावत बेहतरीन अमल है, शैख़ अब्बास क़ुम्मी लिखते हैं कि माहे रमज़ान के दिन रात में सबसे बेहतरीन अमल क़ुरआन की तिलावत है, इसलिए ज़्यादा से ज़्यादा तिलावत की जानी चाहिए। (मफ़ातीहुल जेनान)

तिलावत के आदाब

तिलावत के पहले के आदाब:

** तहारत: क़ुरआन की तिलावत करने वाले का ज़ाहिरी और बातिनी नजासत से पाक होना ज़रूरी है, जैसाकि क़ुरआन का हुक्म है कि क़ुरआन को केवल पाक लोग ही छू सकते हैं। (सूरए वाक़ेआ, आयत 79)

** मिसवाक: पैग़म्बर स.अ. ने फ़रमाया: क़ुरआन की तिलावत करने का रास्ता पाक कर लो, किसी ने सवाल किया यह क्या है? आपने फ़रमाया: मिसवाक करना।

** इस्तेआज़ा: यानी तिलावत शुरू करने से पहले अऊज़ो बिल्लाहे मिनश शैतानिर रजीम कहना। (सूरए नहेल, आयत 98)

तिलावत के दौरान के आदाब:

** विनम्रता से पढ़ा जाए: तिलावत के दौरान हंसी मज़ाक़, बातचीत, खाने पीने और टहलने से परहेज़ करना चाहिए, क्योंकि ऐसा करना मकरूह है।

** क़ुरआन देख कर पढ़ा जाए: पैग़म्बर स.अ. ने फ़रमाया: देख कर क़ुरआन पढ़ना मेरी उम्मत की बेहतरीन इबादत है।

** क़ुरआन की आयतों पर ध्यान दिया जाए: क़ुरआन और हदीस में इस बात पर बहुत ज़ोर दिया गया है, जैसाकि अल्लाह का इरशाद है: क्या तुम क़ुरआन में ग़ौर नहीं करते या तुम्हारे दिलों पर ताले पड़ गए हैं। (सूरए मोहम्मद, आयत 24)

एक बच्चे पर क़ुरआन की तिलावत का असर

अल्लामा ज़मख़्शरी ने नक़्ल किया है कि एक शख़्स ने अपने बच्चे को पढ़ने के लिए मकतब भेजा, वह बच्चा अभी बालिग़ नहीं हुआ था, मगर क़ुरआन की तिलावत का असर उसपर इतना गहरा हुआ कि जब सुबह सवेरे मकतब गया था तो सहीह सालिम और तंदुरुस्त था लेकिन जब वह शाम को वापस पलटा तो देखा बच्चे का रंग उड़ा हुआ है हाव भाव बदले हुए हैं और बदन बुख़ार से जल रहा है, बेटे से वजह मालूम की तो वह रोते हुए कहने लगा कि आज मैंने क़ुरआन की एक आयत ऐसी पढ़ी जिसे बर्दाश्त नहीं कर सका और यह आयत यह है कि, इरशाद होता है: फिर तुम भी कुफ़्र अपनाओगे तो उस दिन किस तरह बचोगे जो बच्चों को बूढ़ा बना देगा। (सूरए मुज़म्मिल, आयत 17)

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