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माहे रमज़ान और अल्लाह की मेहमानी

अल्लाह ने इंसान को अज़मत की बुलंदियों तक पहुंचने की ताक़त अता की है, उसे अक़्ल और सूझबूझ दी, और उस पर करामात की बारिश की और अब उसने अपने बंदों को दावत दी कि वह उसके मेहमानख़ाने में दाख़िल हों और उसके दस्तरख़्वान पर बैठ कर जितना हाथ और ज़ुबान से हो सके नेमत बटोर ले और उसकी हम्द और उसका शुक्र अदा करें।

विलायत पोर्टलः पैग़म्बर स.अ. ने रमज़ानुल मुबारक से पहले दिए जाने वाले ख़ुत्बे में माहे रमज़ान को इलाही मेहमान खाना क़रार दिया और फ़रमाया: इस महीने तुमको अल्लाह की मेहमानी में बुलाया गया है।

इसलिए इस महीने में दाख़िल होने से पहले कुछ बातों पर ध्यान देना ज़रूरी है।

- इस बात पर ध्यान रहे कि मेज़बान कौन है।

- यह नज़र में रहे कि मेहमान कौन है।

- यह बात दिमाग़ में रहे कि मेहमान को दावत देने वाला कौन है।

- इस बात पर भी ध्यान रहे कि दावत किस शान की दी गई है।

- इस पर नज़र रहे कि किस चीज़ के लिए दावत दी गई है।

अगर इन सारी बातों पर ध्यान रहा तो मालूम होगा कि मेज़बान इस पूरी दुनिया का मालिक है, जिसने सारी दुनिया को पैदा किया, जो करीम, रहीम, और सारे मालिकों का भी मालिक है, और मेहमान वह है जिसे अपनी ज़िंदगी तक पर भरोसा नहीं कि कब मौत आ जाए कब क़ब्र में चले जाएं।

ज़रा सोचिए इतना अज़ीम मेज़बान, एक फ़क़ीर, मजबूर और कमज़ोर मेहमान को किस शान से दावत दे रहा है: कि क़ुर्आन जैसा दावतनामा उस पाक और सच्चे नबी द्वारा भेज रहा है जो सारे नबियों का सरदार है उस दावतनामे द्वारा अपने दस्तरख़्वान पर बुला रहा है, इसलिए ऐ अल्लाह के मेहमानों! उसके मेहमानख़ाने में जाने से पहले अपने बारे में सोच लें कि कैसे इस मेहमानी वाले महीने का स्वागत करें ताकि अहले करामत में शामिल हो सकें।

अल्लाह की मेहमानी इमाम ख़ुमैनी र.अ. की निगाह में

इमाम ख़ुमैनी र.अ. ईरान के इस्लामी इंक़ेलाब की बुनियाद रखने वाले और इस्लामी उम्मत के अज़ीम रहबर थे, आपने किसी मौक़े पर माहे रमज़ान के आने से पहले "अल्लाह की मेहमानी" के विषय पर एक बयान दिया था जिसे आपकी किताब जेहादे अकबर में नक़्ल किया गया है, उसी का कुछ हिस्सा यहां संक्षेप में पेश किया जा रहा है:

1- आने वाले दिनों में ग़ौर करें और अपने अंदर सुधार ला कर अल्लाह की तरफ़ ध्यान लगाए रहें, अपने ग़ैर मुनासिब किरदार, ग़लत रवैये और बेतुकी बातों से तौबा और इस्तेग़फ़ार कर लें, अगर ख़ुदा न करे कोई गुनाह किया हो तो अभी से उसकी माफ़ी मांग लें और तौबा कर लें, रमज़ान से पहले ही अपनी ज़ुबान को मुनाजात का आदी बना लें, अल्लाह न करे कि माहे रमज़ान में आपसे ग़ीबत, तोहमत, इल्ज़ाम या कोई और गुनाह हो जाए और आप अल्लाह के दरबार और उसके मेहमानख़ाने में नेमतों के साथ साथ गुनाहों का बोझ भी लाद लें, आपको इस बरकत वाले महीने में अल्लाह की मेहमानी की दावत दी गई है इसलिए आप अल्लाह की शानदार मेहमानी के लिए तैयार रहें। (जेहादे अकबर, उर्दू तर्जुमा, पेज 77)

2- अगर माहे रमज़ान गुज़र गया और आप में कोई तब्दीली नहीं आई और आपका रवैया और बर्ताव वैसा ही रहा जैसा माहे रमज़ान से पहले था तो समझ लीजिए जैसा रोज़ा आपसे कहा गया था रखने के लिए वैसा अंजाम नहीं पाया।

इस पाक और मुबारक महीने में अल्लाह के घर दावत में बुला कर आपको सम्मान दिया गया है अगर आपको सही मारेफ़त हासिल नहीं हुई या उसमें कुछ बढ़ोतरी नहीं हुई तो तो समझ लीजिए कि आप सही तरीक़े से उसकी मेहमानी में शामिल नहीं हुए और मेहमानी का हक़ अदा नहीं कर सके। (जेहादे अकबर, उर्दू तर्जुमा, पेज 79)

3- अल्लाह ने इंसान को अज़मत की बुलंदियों तक पहुंचने की ताक़त अता की है, उसे अक़्ल और सूझबूझ दी, और उस पर करामात की बारिश की और अब उसने अपने बंदों को दावत दी कि वह उसके मेहमानख़ाने में दाख़िल हों और उसके दस्तरख़्वान पर बैठ कर जितना हाथ और ज़ुबान से हो सके नेमत बटोर ले और उसकी हम्द और उसका शुक्र अदा करें।

4- अल्लाह के मेहमान को चाहिए कि वह अल्लाह के मर्तबे को पहचानता हो जिसकी मारेफ़त के लिए नबियों और मासूम इमामों ने हमेशा कोशिश जारी रखी, उनकी कोशिश रहती थी कि वह नूर और अज़मत की बुलंदियों तक पहुंच सकें।

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