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मस्जिदुल अक़्सा को लेकर अवैध राष्ट्र की साज़िश

फ़िलिस्तीन के वरिष्ठ पत्रकार सैफ़ुद्दीन नूफ़ेल का कहना है कि ज़ायोनी शासन ने अपनी स्थापना के शुरु से ही अपनी विस्तारवादी योजनाओं को पूरा करने के लिए युद्ध और रक्तपात के साथ ही तथ्यों में हेरफेर की नीति भी अपनाई। ऐसी ही नीति मस्जिदुल अक़्सा के बारे में भी अपनाई गई। मस्जिदुल अक़्सा के नाम से क़ुब्बतुस्सख़रह का प्रचार किया गया जो वास्तव में मस्जिदे अक़्सा का एक छोटा सा भाग है। खेद की बात यह है कि बहुत से मुसलमान उसी क़ुब्बतुस्सख़रह को मस्जिदुल अक़्सा समझ लेते हैं।

विलायत पोर्टलः  फ़िलिस्तीन के विशेषज्ञों का कहना है कि ज़ायोनी शासन ने बड़े योजनाबद्ध ढंग से मस्जिदुल अक़्सा की जगह क़ुब्बतुस्सख़रह का प्रचार किया है ताकि लोग मस्जिदुल अक़्सा को भूल जाएं।

मस्जिदुल अक़्सा और क़ुब्बतुस्सख़रह का फ़र्क़ः

फ़िलिस्तीन के वरिष्ठ पत्रकार सैफ़ुद्दीन नूफ़ेल का कहना है कि ज़ायोनी शासन ने अपनी स्थापना के शुरु से ही अपनी विस्तारवादी योजनाओं को पूरा करने के लिए युद्ध और रक्तपात के साथ ही तथ्यों में हेरफेर की नीति भी अपनाई। ऐसी ही नीति मस्जिदुल अक़्सा के बारे में भी अपनाई गई। मस्जिदुल अक़्सा के नाम से क़ुब्बतुस्सख़रह का प्रचार किया गया जो वास्तव में मस्जिदे अक़्सा का एक छोटा सा भाग है। खेद की बात यह है कि बहुत से मुसलमान उसी क़ुब्बतुस्सख़रह को मस्जिदुल अक़्सा समझ लेते हैं।

फ़िलिस्तीनी नेता ख़ालिद अल अज़बत ने मस्जिदुल अक़्सा और क़ुब्बतुस्सख़रह के फ़र्क़ के बारे में बताया कि अरब व इस्लामी जगत बहुत बड़ी ग़लत फ़हमी में है और इसके पीछे इस्राईल का हाथ है, इस्राईल ने तथ्यों में उलटफेर करने की बड़ी योजनबद्ध कोशिश की है।

सच्चाई यह है कि सुनहरे गुंबद वाली जो मस्जिद मस्जिदुल अक़्सा के नाम से दिखाई जाती है वह मस्जिदुल अक़्सा का एक भाग है और वह मस्जिदे क़ुब्बतुस्सख़रह है जिसे ख़लीफ़ए दुव्वम उमर बिन ख़त्ताब ने बनाया था। 

बैतुल मुक़द्दस के मामलों के विशेषज्ञ शुऐब अबू सनीना ने कहा कि मुसलमानों में फैली इस ग़लत फ़हमी के दो कारण हैं। एक तो यह कि मस्जिदुल अक़्सा को ज़ायोनी शासन ने अपने घेरे में ले रखा है और यह घेराबंदी 1967 से चली आ रही है।

दूसरा कारण यह है कि ज़ायोनी शासन बार बार अफ़वाहें फैलाते हैं जिसका नतीजा यह है कि लोगों से मस्जिदुल अक़्सा को पहचानने में ग़लती हो जाती है। जैसे कि जब वर्ष 2000 में ज़ायोनी प्रधानमंत्री एरियल शेरोन ने 3000 सैनिकों के साथ मस्जिदुल अक़्सा पर हमला किया तो वहां मौजूद नमाज़ियों ने मेज़ और कुर्सी की मदद से उनका मुक़ाबला किया और उसे मस्जिद के प्रांगड़ से बाहर निकाला। एरियल शेरोन ने कहा कि मैं शांति का संदेश लाया हूं मेरा मस्जिदुल अक़्सा में प्रवेश करने का कोई इरादा नहीं है। मैं तो केवल प्रांगड़ में आया हूं। इस तरह शेरोन ने यह कहने का प्रयास किया कि प्रांगड़ मस्जिद का भाग नहीं है।

फ़िलिस्तीन के जेहादे इस्लामी संगठन के नेता फ़ुआद अर्राज़िम ने कहा कि सब को पता होना चाहिए कि मस्जिदुल अक़्सा में क़ुब्बतुस्सख़रह भी शामिल है, मस्जिदे क़िब्ला भी शामिल है इसी प्रकार इससे लगे सभी प्रांगड़ मस्जिदुल अक़्सा का हिस्सा हैं। इसके अलावा 200 से अधिक प्राचीन अवशेष भी हैं जो मस्जिदुल अक़्सा से ही संबंधित हैं।

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