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बहरैन में आले ख़लीफ़ा को सत्ता कैसे मिली

आले ख़लीफ़ा की जड़ें और उसका वंश अल-अतूब नामी ख़ानदान से जुड़ता है, जिसका संबंध सऊदी में नज्द के अल-अफ़लाज नामी जगह से है, वहां से फारस की खाड़ी की ओर हिजरत की, पहले यह लोग क़तर में रहे फिर कुवैत में कूत नामी जगह पर पहुंचे।

विलायत पोर्टलः  जबकि बहरैन एक छोटा सा देश है लेकिन 14 फ़रवरी 2011 की वहां पर आई क्रांति की पूरी दुनिया गवाह बनी, और अभी भी वहां आम जनता का अत्याचारी शासन के विरुध्द संघर्ष जारी है।
इस लेख में आपके सामने यह विस्तार से बताया जाएगा कि किस प्रकार बहरैन में आले ख़लीफ़ा सत्ता में आए।
बहरैन के बारे और जानें
बहरैन, फ़ारस की खाड़ी में बसने वाला एक ऐसा देश है जो छोटे छोटे द्वीप से मिलकर बना है, जहां राजशाही है, जिसकी राजधानी मनामा और ज़बान अरबी है, लेकिन इंगलिश, फ़ारसी और उर्दू बोलने वाले भी बहुत हैं।
बहरैन 5 राज्यों में बटा हुआ है, और यह देश 32 द्वीप से मिलकर बना है, और विकीपीडिया के अनुसार 3 जुलाई 2002 तक यहां 14 शहर थे।
पुराने समय में बहरैन, फ़ारस की खाड़ी के दक्षिणी किनारे तक शामिल था जिसमें सऊदी का अल-हासा शहर भी शामिल था।
सासानियान के समय से पहले बहरैन ईरानी क्षेत्र में शामिल था, 1522 ईस्वी से 1602 ईस्वी तक पुर्तगाल देश के क़ब्ज़े में रहा, फिर 1602 ईस्वी में शाह अब्बास नाम के बादशाह ने पुर्तगाल को फ़ारस की खाड़ी से बाहर निगाल भगाया, और बहरैन द्वीप सफ़वी हुकूमत के क़ब्ज़े में आ गया, और फिर बहरैन पर 1783 ईस्वी तक ईरानी हुकूमत चली, यह और बात है बीच में कुछ छिटपुट हमले उम्मानियों की ओर से भी हुए।
1783 ईस्वी से बहरैन आले ख़लीफ़ा जोकि अरब प्रायद्वीप से थे उनके हाथ में आ गया, और वह उन्नीसवीं सदी के शुरू से 1971 ईस्वी तक ब्रिटिश की देख रेख में था।
बहरैन का क्षेत्रफल 706 वर्ग किलोमीटर है, जिसमें से 400 वर्ग किलोमीटर केवल जंगल है।
बहरैन खजूरों वाले द्वीप के नाम से भी मशहूर था, जिसमें तीन सबसे मशहूर द्वीप थे, मनामा, मोहरिक़ और सितरा, यहां गांव भी अच्छी ख़ासी तादाद में हैं जो कि कम दूरी पर बसे हुए हैं।
इस छोटे से देश के कम क्षेत्र की वजह से बहरैनी अधिकारियों ने समुद्र को भरने का प्रयास किया और उनके देश के आकार में वृद्धि की है।
आले ख़लीफ़ा की जड़ें और वंश
आले ख़लीफ़ा की जड़ें और उसका वंश अल-अतूब नामी ख़ानदान से जुड़ता है, जिसका संबंध सऊदी में नज्द के अल-अफ़लाज नामी जगह से है, वहां से फारस की खाड़ी की ओर हिजरत की, पहले यह लोग क़तर में रहे फिर कुवैत में कूत नामी जगह पर पहुंचे।
जब 1795 ईस्वी में बनी ख़ालिद को सऊदी ने हुकूमत से हटाया उसी समय अल-अतूब धीरे धीरे सत्ता में आना शुरू हुए।
तभी से आले ख़लीफ़ा बहरैन और आले सबाह कुबैत में सत्ता में आ गए, उन्होंने आपस में मिल कर यह योजना बनाई कि आले सबाह सत्ता औप आले ख़लीफ़ा व्यापार संभालें।
लेकिन अल-अतूब के परिवार में मतभेद होने के कारण आले ख़लीफ़ा मोहम्मद इब्ने ख़लीफ़ा की सरपरस्ती में कुवैत से निकल कर क़तर के पश्चिमी किनारे पर अल-ज़ुबारह नाम की जगह पर गए ताकि वहां आप पास के इलाक़े के लोगों को आले ख़लीफ़ा की ओर किया सके, अल-जहालेमा क़बीले के लोग जो क़तर के अल-रोयेस नामी जगह रह रहे थे उन्होंने आले ख़लीफ़ा का साथ देने का ऐलान किया और उनकी सत्ता के बढ़ाने के लिए उनकी मदद की ताकि बहरैन में अधिक से अधिक इलाक़ों में उनकी सत्ता आ सके, अठ्ठारहवीं सदी के अंत तक यही होता रहा।
अल-ज़ुबारह उस समय व्यापार का गढ़ था जो मोती के व्यवपार की सबसे बड़ी बंदरगाह था, और यह आले मुस्लिम की देख रेख और उन्हीं के नियम अनुसार था, और वह भी बनी ख़ालिद की पैरवी कर रहे थे।
मोहम्मद इब्ने ख़लीफ़ा ने अल-ज़ुबारह में क़दम रखते ही ख़ुद को आले मुस्लिम का मुरीद बताते हुए ज़ोर देकर कहा कि वह सत्ता हासिल करने के कारण नहीं आया बल्कि व्यापार करने आया है, लेकिन धीरे धारे उनका व्यापार और प्रभाव दोनों ही फैलता गया जिसके कारण मोहम्मद इब्ने ख़लीफ़ा को उस जगह का हाकिम चुन लिया गया, सत्ता में आने के कुछ साल बाद अठ्ठआरहवीं सदी ही में मर गया।
ख़लीफ़ा इब्ने मोहम्मद इब्ने ख़लीफ़ा की अल-ज़ुबारह पर हुकूमत
मोहम्मद इब्ने ख़लीफ़ा के बाद उसके बेटे ने 7 साल अल-ज़ुबारह पर हुकूमत की, उसके बाद दूसरा बेटे सत्ता में आया, यही वह समय था जब आले खलीफ़ा ने अल-ज़ुबारह पर क़ब्ज़े का अधिकारिक ऐलान किया, जबकि उस समय यह लोग मोतीयों के व्यापार में लगे हुए थे, लेकिन इन सब परिस्तिथियों के बावजूद बहरैन पर ईरान ही की हुकूमत थी, और शैख़ नस्र आले मज़कूर बहरैन में ईरान के प्रतिनिधि थे।
कहा जाता है कि आले ख़लीफ़ा का आले मज़कूर से मतभेद शुरू हो गया, और धीरे धीरे टकराव और हिंसा में बदल गया, इस लड़ाई में आले मज़कूर हार गए, और आले ख़लीफ़ा की हुकूमत अल-ज़ुबारह के साथ साथ पूरे बहरैन पर फैल गई।
इन्हीं कारण और परिस्तिथियों के बाद बहरैन में आले ख़लीफ़ा सत्ता में आ गए।
सलमान इब्ने अहमद इब्ने मोहम्मद इब्ने ख़लीफ़ा और आले सऊद
अहमद इब्ने मोहम्मद इब्ने ख़लीफ़ा की मौत के बाद उसका बेटा सलमान इब्ने अहमद इब्ने मोहम्मद इब्ने ख़लीफ़ा 1821 ईस्वी में आले ख़लीफ़ा का उत्तराधिकारी बना, यह और आले सऊद के बादशाह अब्दुल अज़ीज़ इब्ने मोहम्मद इब्ने मसऊद समकालीन बादशाह थे, उसी समय अब्दुल अज़ीज़ ने अल-हासा पर क़ब्ज़ा कर लिया, और आले सऊद की फौज ने इब्राहीम इब्ने अफ़ीसान के नेतृत्व में अल-ज़ुबारह को घेर लिया और आले ख़लीफ़ा के बादशाह सलमान को वहां से बहरैन भागने पर मजबूर कर दिया, वहां पर भी आले सऊद का भय सताने लगा जिस के कारण आले ख़लीफ़ा ने आले सऊद से मुक़ाबला करने के लिए उम्मान की बादशाही का सहारा लिया।
उम्मान के बादशाह ने अपने बेटे के नेतृत्व में सेना को आले ख़लीफ़ा की सेना के साथ अल-ज़ुबारह भेजा ताकि उस पर वापिस क़ब्ज़ा कर सकें, इस संयुक्त सेना को अल-ज़ुबारह को आले सऊद के चंगुल से आज़ाद करना में सफ़लता मिली, लेकिन उम्मान के बादशाह और आले ख़लीफ़ा में भी जल्द ही अनबन शुरू हो गई, और उम्मानियों का बहरैन और अल-ज़ुबारह पर प्रभाव बढ़ता गया, इस बार आले ख़लीफ़ा ने अपनी सत्ता बचाने के लिए आले सऊद से मदद मांगी, अब्दुल अज़ीज़ ने अपने कमांडर इब्राहीम इब्ने अफ़ीसान के नेतृत्व में अपनी सेना को भेता ताकि बहरैन और अल-ज़ुबारह से उम्मानी सेना को खदेड़ सकें।
इब्राहीम इब्ने अफ़ीसान ने उम्मानी सेना को पीछे हटने पर तो मजबूर कर दिया लेकिन आले ख़लीफ़ा पर बहरैन में घुसने पर पाबंदी लगा दी, और उनको अल-ज़ुबारह में रुकने पर मजबूर कर दिया, इस प्रकार वह द्वीप जिस पर आले ख़लीफ़ा का क़ब्ज़ा था वह आले सऊद के पास चला गया।
अब्दुल अज़ीज़ आले सऊद और आले ख़लीफ़ा
आले ख़लीफ़ा सोंच रहे थे कि आले सऊद से इब्ने अफ़ीसान की शिकायत करेंगे, कि उनकी भेजी हुई सेना ने अर-ज़ुबारह पर भी क़ब्ज़ा कर के उनको अल-दरइय्या तक भागने पर मजबूर कर दिया।
आले ख़लीफ़ा सऊद इब्ने अब्दुल अज़ीज़ के सत्ता में आने तक अल-दरइय्या में रुके रहे, फिर 1809 ईस्वी में आले ख़लीफ़ा की 3 अहम और नामचीन हस्तियों के कहने पर अल-ज़ुबारह को उनके अपने घर वापिस आने की अनुमति दे दी गई, लेकिन आले ख़लीफ़ा को अल-दरइय्या मे ही क़ैद कर के रखा, उनको वापसी की अनुमति नहीं मिली।
बहरैन वापसी
इसी बीच शैख़ अबदुर् रहमान इब्ने राशिद आले फ़ाज़िल जो आले ख़लीफ़ा की बहन की औलाद में से था, उसने उम्मान के बादशाह की से मदद की गुहार लगाई, इस प्रकार उम्मान की माली और सैन्य मदद से बहरैन से इब्ने अफ़ीसान और उसकी सेना को बाहर निकाल कर 1810 ईस्वी में आले ख़लीफ़ा को फिर से वापिस बहरैन मिला।
बहरैन तो वापिस मिल गया लेकिन उनका बादशाह सलमान अभी भी सऊद इब्ने अब्दुल अज़ीज़ की जेल ही में था, उसी समय आले सऊद पर उस्मानी हुकूमत के इब्राहीम पाशा नाम के सैनिक ने हेज़ाज़ पर चढ़ाई कर दी, इसी दौरान आले ख़सीफ़ा ने बहरैन की व्यवस्था को असली हालत पर पलटा दिया, इस मौक़े का फ़ायदा उठाते हुए आले ख़लीफ़ा ने अल-रेफ़ाअ में दुश्मन के हमलों से बचने के लिए एक क़िला बनवा लिया, और यह घटना 1812 ईस्वी की है, इस प्रकार आले ख़लीफ़ा एक बार फिर से बहरैन वापिस आए।
1812 ईस्वी से 1821 ईस्वी तक कि जिस साल सलमान की मौत हुई और उसका भाई अबदुल्लाह सत्ता में आया, इन्हीं सालों के बीच आले ख़लीफ़ा ने आले सऊद के हर प्रकार के किए गए आक्रमण के असर में सुधार पैदा कर लिया।
सऊदी पर हलमा
आले ख़लीफ़ा के बादशाह अब्दुल्लाह इब्ने अहमद ने सत्ता में आते ही सऊदी के अल-क़तीफ़ शहर पर हमला कर के दारैन, तारूत और सीहात पर क़ब्ज़ा कर लिया, लेकिन उसके अपने 3 बेटों ने उसके विरुध्द विद्रोह कर दिया जिस से उसकी जीत देखते देखते ही हार में बदल गई।
अब्दुल्लाह के बाद 1867 ईस्वी में आले ख़लीफ़ा में से मोहम्मद इब्ने ख़लीफ़ा इब्ने सलमान सत्ता में आया, और 1842 के इसके विद्रोह के कारण आले ख़लीफ़ा में फ़ूट पड़ गई, और वह आले अब्दुल्लाह और आले सलमान 2 गुट में बट गए।
मोहम्मद ने आले ख़लीफ़ा से हट के आले सलमान की बुनियाद रखी, और आले अब्दुल्लाह के डर से वह सऊदी के शहर अल-दम्माम की ओर भाग गए, लेकिन फ़ैसल इब्ने तुर्की की मध्यस्थता के कारण आले सऊद और इस परिवार के बीच ज़ाहिरी एकता हो गई।
यही वह समय था कि क़तर बहरैन से अलग हो गया, और आले सानी इस देश में सत्ता में आ गए, उसके बाद फिर कुछ झड़प आले सलमान और क़ासिम इब्ने सानी के बाच हुई, क़ासिम इब्ने सानी ने आले सलमान के विरुध्द विद्रोह किया, लेकिन आले ख़लीफ़ा के बादशाह मोहम्मद इब्ने ख़लीफ़ा ने इस विद्रोह को कुचलने के लिए सेना भेजी, उसकी सेना ने उसके विद्रोह को कुचल कर दोहा में प्रवेश किया और क़ासिम को जेल में डाल दिया।
इस कांड ने क़तर की अनेक जनजाति में ग़ुस्सा फूट पड़ा, सबसे अधिक अल-नईम नामी क़बीले में देखने को मिला, जिसके कारण उन्होंने बहरैन पर हलमा करके आले ख़लीफ़ा को कुचल दिया।
ब्रिटिश का बीच में कूदना
इतिहास गवाह है कि ब्रिटिश ने आते ही बहरैन के आंतरिक मामलों में दख़ल देना शुरू कर दिया, मोहम्मद इब्ने ख़लीफ़ा ने ब्रिटिश के साथ एक रक्षा समझौता पर हस्ताक्षर किए कि बहरैन अपने सभी हथियार और सेना उनके हवाले कर दे उसके बदले ब्रिटेश उनकी हर प्रकार के खतरे से रक्षा करेगा, लेकिन जब क़तर के क़बीलों और उनके सरदारों ने विद्रोह किया तब मोहम्मद ने उनके विद्रोह को कुचल दिया, ब्रिटिश ने इसी बात का बहाना बना कर कि मोहम्मद ने समझौता को तोड़ दिया उसे हुकूमत से बेदख़ल कर दिया, और उसकी जगह उसके भाई ईसा ख़लीफ़ा इब्ने सलमान (वर्तमान बादशाह का बाप) को बादशाह बना दिया, और यही आले ख़लीफ़ा के बीच मतभेद शुरू होने का कारण बना।
हम्द इब्ने ईसा इब्ने सलमान का सत्ता में आना
यह 28 जनवरी 1950 ईस्वी को बहरैन में पैदा हुआ, प्राथमिक शिक्षा पूरी होने के बाद उच्च शिक्षा के लिए ब्रिटिश गया, ब्रिटिश के हैम्पशायर सिटी में लिज़ नामी कैडेट स्कूल में 1968 में पढ़ाई की, फिर अमेरिका के फोर्ट लीवेनवर्थ नामी विश्विधालय से 1972 में सैन्य शिक्षा में ग्रेजुएट कर के वापिस लौटा।
हम्द इब्ने ईसा 1964 ईस्वी में 14 साल की उम्र में बहरैन का उत्तराधिकारी बना, और 6 मार्च 1999 में अपने बाप के मरने के बाद बहरैन का बादशाह बना, इसने 4 शादियां की।




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