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बच्चों में हृदय रोग के लक्षण।

अब बच्चे भी हृदय रोग से अछूते नहीं रहे। आम तौर पर बच्चों में होने वाले हृदय रोगों को पहचानना कठिन होता है क्यों‌कि इसके लक्षण बहुत सामान्य होते है। माता-पिता भी बच्चों में हृदय रोगों के लक्षणों की पहचान नहीं कर पाते और समय पर इसकी पहचान नहीं होने के कारण ये रोग गंभीर हो जाते है। कभी-कभी तो अनदेखी के कारण ही ये बीमारियां जीवन के लिए भी खतरा बन जाती है।

अब बच्चे भी हृदय रोग से अछूते नहीं रहे। आम तौर पर बच्चों में होने वाले हृदय रोगों को पहचानना कठिन होता है क्यों‌कि इसके लक्षण बहुत सामान्य होते है। माता-पिता भी बच्चों में हृदय रोगों के लक्षणों की पहचान नहीं कर पाते और समय पर इसकी पहचान नहीं होने के कारण ये रोग गंभीर हो जाते है। कभी-कभी तो अनदेखी के कारण ही ये बीमारियां जीवन के लिए भी खतरा बन जाती है।

अनदेखी करना जीवन के लिए घातक
नोएडा स्थित मेट्रो हास्पीटल एंड हार्ट इंस्टीट्यट के हृदय रोग विशेषज्ञ डॉक्टर पुरुषोत्तम लाल बताते हैं कि देश में हर साल 1.75 लाख बच्चे हृदय रोग से ग्रस्त पैदा होते है। ऐसे अधिकतर बच्चों में से कुछ को तो जन्म के एक सप्ताह के भीतर उपचार करवाने की जरूरत होती है तो कुछ बच्चों को तीन-चार माह में उपचार देने की जरूरत होती है। लेकिन ऐसे बच्चों के लक्षणों की समय पर पहचान नहीं होने के कारण ये बच्चे बिना उपचार के ही मौत के मुह में चले जाते है। अब तो गर्भ में पल रहे 18 सप्ताह के बच्चे की हृदय की बामारी का पता लगाकर ऐसी मौतों को रोका जा सकता है।

बच्चों में हृदय रोग के लक्षण
डा. लाल बताते हैं कि बच्चों में दो तरह के जन्मजात हृदय रोग के लक्षण होते हैं। पहले तरह का हृदय रोग होने पर बच्चा नीला पड़ जाता है। चेहरे और शरीर के साथ जीभ, नाखून और होंठ भी नीले हो जाते हैं। इसके साथ ही बच्चा अक्सर बेहोश हो जाता है। इस स्थिति में शिशु को जल्द अस्पताल ले जाने की ज़रूरत होती है। ऐसे बच्चों का जिंदगी के पहले साल में ही ऑपरेशन करना जरूरी होता है। दूसरे तरह के हृदय रोग में शिशु को दूध पीने में परेशानी होती है, दूध पीते हुए पसीना आता है और वजन कम हो जाता है साथ ही थकान भी होती है। इस तरह की परेशानी में बच्चे के जन्म के पहले कुछ महीनों में चिकित्सा आवश्यक है। जन्म के बाद तुरंत चिकित्सा करा देने से ये लक्षण हमेशा के लिए खत्म हो जाते है।

कम सक्रिय बच्‍चों में सीवीडी खतरा
डा. लाल के अनुसार बच्चों में हृदय रोग बाद में भी विकसित हो सकते है। आम तौर पर स्वस्थ दिखने वाले बच्चे अगर सक्रिय नहीं हैं तो उन्हें आगे चलकर हृदय की बीमारियों के चपेट में आने का खतरा होता है। शारीरिक रूप से अधिक सक्रिय बच्चों में कार्डियोवैस्कुलर डिजीज (सीवीडी) का कम खतरा होता है लेकिन जो बच्चे कम सक्रिय हैं उनके सीवीडी से ग्रस्त होने का खतरा अधिक होता है। यही नहीं बचपन में व्यायाम और शारीरिक गतिविधियों के अभाव में प्रौढ़ावस्था में दिल का दौरा पड़ने का खतरा भी बढ़ सकता है।

7 साल की उम्र तक दिखाई देने लगता है लक्षण
बचपन में शारीरिक गतिविधियों का अभाव, मधुमह, उच्च रक्तचाप और रक्त में कोलेस्ट्रॉल के स्तर का बढ़ना मोटापे का कारण बन सकता है। इस सभी लक्षणों को चिकित्सा विज्ञान की भाषा में मेटाबोलिक सिंड्राम कहा जाता है। इसके कारण उम्र बढ़ने के साथ-साथ हृदय संबधी समस्याएं पैदा होने की संभावना काफी अधिक हो जाती है। शारीरिक गतिविधियों में भाग नहीं लेने वाले 50 फीसदी बच्चों में सात साल की उम्र तक मेटाबोलिक सिंड्राम का कम से कम एक लक्षण जरूर दिखाई देने लगता है। यह अलग बात है कि माता-पिता इन लक्षणों की पहचान नहीं कर पाते और बच्चा हृदय रोग से ग्रस्त हो जाता है।

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